Migrant Labour Mercilessly Abandoned by Modi Government

ALL INDIA CONGRESS COMMITTEE

24, AKBAR ROAD, NEW DELHI

COMMUNICATION DEPARTMENT

डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि आज हमारे प्रवासी श्रमिकों, प्रवासी मजदूरों के बारे में बात करने का उपयुक्त विषय है, क्योंकि आज 1 मई है, मजदूर दिवस है। हम मुख्य रुप से इसी मुद्दे के विषय में बात करेंगे। मैं आपके समक्ष यह मुद्दा उठा रहा हूं, क्या केन्द्र सरकार ने इस वर्ग से हाथ खिंच लिया है? क्या उन्होंने इस वर्ग को तिरस्कृत कर दिया है, दरकिनार कर दिया है?
प्रवासी मज़दूरों से सम्बंधित 29 अप्रैल को केंद्र सरकार के द्वारा जारी दस्तावेज से शुरुआत करें, जो कल शाम को आया है। यह अजीबो-गरीब दस्तावेज है। उसमें लिखा है कि ट्रांसपोर्ट को अनुमति दी गई है। यह आदेश नहीं, अनुमति है कि प्रवासी श्रमिक वापस जा सकते हैं। इसमें दूसरा आदेश है कि जाएं तो सिर्फ बस से जाएं। तीसरा आदेश है कि भेजने वाला प्रदेश और रिसीव करने वाला प्रदेश तथ्यों का आदान-प्रदान करें, नोडल ऑफिसर रखें, बातचीत करें, विचार-विमर्श करें। क्या यह भी जैसे कोई बताने वाली बात हो? चौथा है कि वहाँ जिस प्रदेश से जा रहे हैं, दूसरे प्रदेश में पहुंचने के बाद स्क्रीनिंग हो। मैं आपको यह दिखाना चाहता हूं कि किस प्रकार से यह तुगलकी सा फरमान है। एक अंजाने में, नासमझी के साथ निकाला हुआ दस्तावेज है और उसके साथ-साथ आज की स्थिति में एक क्रूर मजाक भी है, जिसे मैं विनम्रता के साथ इस वर्ग के विषय में एक अपमानजनक तमाचा कहूंगा।
गृहमंत्रालय का यह फरमान कैसा मजाक है, इसमें कैसी परिभाषा है, जो इस सरकार की अप्रोच को दर्शाता है, परिलक्षित करता है। इस बारे में मैं आपको 8-9 प्वाइंट बताऊंगा:-
पहला मुद्दा यह है कि कल जो दस्तावेज आया है, वह लगभग 45 दिन बाद आया है। 45 दिन बाद हम आशा करेंगे कि खोदा पहाड़, तो कम से कम कुछ तो निकले। परंतु इस दस्तावेज के अंदर से यहाँ तो कोई चूहा भी नहीं निकला है। दूसरा, इस दस्तावेज में केन्द्र सरकार की तरफ से बेचारा प्रवासी श्रमिको के लिए क्या कर रही है, इसके बारे में उसमें एक लाइन, एक शब्द नहीं है। प्रदेश, जो अभी से आर्थिक रुप से चकनाचूर हो गया, वही सब कुछ करे। उसको छोड़िए, लेकिन केन्द्र सरकार क्या करेगी। इसलिए मैं तुगलकी फरमान कह रहा हूं, क्योंकि केन्द्र सरकार की तरफ से क्या करुंगा, तो कुछ नहीं अर्थात जीरो।

दूसरा, केन्द्र सरकार को आभास भी नहीं है, ना सर्वे किया है, ना तथ्यों का ज्ञान- संज्ञान लेने का प्रयत्न किया है कि ऐसे वर्ग की, प्रवासी मजदूरों की संख्या क्या है, जो एक स्टेट से दूसरे स्टेट में जाना चाहते हैं। मैं आपको कुछ उदाहरण दूं, प्रकाशित हैं ये सब उदाहरण, आंकड़े, परंतु मुझे लगता है कि केन्द्र सरकार को उसका कोई आभास नहीं है। कहीं से भी सिर्फ इन दो प्रदेशो- उत्तर प्रदेश और बिहार में लगभग 42 लाख लोग, जो अन्य प्रांतों से आना चाहते हैं, मैं लगभग बोल रहा हूं, ऊपर-नीचे भी होगा। अंदाजा लगाया है कि सिर्फ महाराष्ट्र और तमिलनाडु से 25 से 27 लाख लोग बिहार आना चाहते हैं। तमिलनाडु याद रहे कि कितना दूर है बिहार से।
तीसरा, मेरा खुद का प्रदेश राजस्थान, वहाँ से लगभग 3 लाख या 2.8 लाख लोग बाहर हैं, जो राजस्थान आना चाहते हैं। गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, ये 4 बड़े प्रदेश हैं, वहाँ से अंदाजा लगाया जाता है कि 7 से 9 या 10 लाख लोग वापस जाना चाहते हैं। असम ने अंदाजा लगाया है कि डेढ़ लाख वापस आना चाहते हैं। ओडिशा के मुख्यमंत्री ने आंकड़ा दिया था कि लगभग 6 या 7 लाख लोग वापस आना चाहते हैं और इसकी पुष्टि एक बड़ी ही छोटी-सी बात से होती है कि अभी एक-दो दिन पहले जब हेल्प लाइन खोली गई, (27 अप्रैल का शायद ये आंकड़ा है), एक दिन में जो उत्तर प्रदेश की हेल्प लाइन है, उसमें 1 लाख कॉल आई हैं। हेल्प लाइन की बात कर रहा हूं, मैं लोगों की बात नहीं कर रहा हूं। इसके अलावा केरल में 4 लाख लोग वापस जाना चाहते हैं। दिल्ली में बहुत बड़ा आंकड़ा है, 10 लाख से ज्यादा, इत्यादि-इत्यादि। इसकी समझ, इसका अनुमान, इसकी साइज, इसकी बाउंडरी, क्या केन्द्र सरकार को मालूम है? मैं चार्ज लगा रहा हूं कि बिल्कुल नहीं और प्रयत्न भी नहीं किया है।
नंबर चार, इस आदेश का मतलब क्या है कि सिर्फ बसों में जा सकते हैं। मैंने आंकड़े इसलिए दिए कि इन आंकड़ों के प्रपोर्शन में इतने लोगों को वापस भेजने के लिए क्या आप 3 साल लेंगे? क्या यही कोई हल है, पागलपन है? कितनी सड़कें हैं, कितने सड़कें ब्लॉक हैं, कितने लोग हैं, कितनी बसें हैं और क्या साधन हैं? किसी के पास कितनी बसें, कितने इंधन, कितने लोजिस्टिस्क का साधन है, एक तो उसके लिए पैसा नहीं और प्रतिबंध है- के लिए सिर्फ बसें इस्तेमाल करें।
नंबर पांच, ट्रेन क्यों नहीं, इसका क्या औचित्य है, क्या लॉजिक है? स्पेशल आप प्लेन ला सकते हैं, स्पेशल ट्रेन क्यों नहीं? आप विशेष ट्रेन चलाइए, सोशल डिस्टेंसिंग मैंटेन रखना बड़ा आसान है, उसमें खाने का प्रबंध हो और इतने सैंकड़ों लोगों के लिए ट्रेन से बेहतर, जो स्पेशल होंगी, जो प्वाइंट- ए से प्वाइंट- बी तक जाएंगी, उसको मना करने का औचित्य क्या हो सकता है? पूर्व रेल मंत्रियों ने कहा है, विपक्ष की कई अलग-अलग पार्टियों ने ही कहा है। कांग्रेस ने तो कहा ही है, लेकिन औरों ने भी कहा है कि ये ज्यादा कारगर या ज्यादा एफिशिंयट हैं या ये कम समय लेता है, ज्यादा सहुलियत है या ज्यादा तकलीफ है इससे? ऑर्डर ऐसे किया गया फरमान के हिसाब से कि बस आपको बोल दिया, आपको अनुमति है कि सभी प्रदेशों को कि इनको वापस ले जाइए। क्या है ये जिद्द, क्या है ये नासमझी, क्या है ये मूर्खता या क्या है ये अवहेलना, मैं नहीं जानता, लेकिन एक बात पक्की है कि आप सबसे कारगर तरीके को छोड़कर अन्य तरीकों को अपनाने का जो प्रयत्न कर रहे हैं, उससे ये नोन स्टार्टर है। मैंने आपको विशेष प्लेन का उदाहरण दिया, कम से कम विशेष सीधी न्यूनतम मांग है, उसका कोई औचित्य नहीं, कोई लॉजिक नहीं, इसलिए मैंने कहा कि ये नासमझी में प्रकाशित किया दस्तावेज है।
नंबर छह, कम से कम आप 1000, मेरे हिसाब से 5,000 होना चाहिए, पर कम से कम ढाई हजार करोड़ सिर्फ प्रवासी वर्ग के लोगों को स्थानातंरण करने के लिए क्यों नहीं देते? क्या इसके लिए 2,000- 2,500 करोड़ बहुत ज्यादा है? आप आर्थिक सहायता और समर्थन प्रदेशों को एक पैसे का नहीं दे रहे हैं, एक फरमान द्वारा अनुमति दे रहे हैं, वो लागू कैसे होगी? क्या संघीय ढांचे की आपकी जो परिभाषा है, ये महत्वपूर्ण प्रश्न है कि संघीय ढांचे का मतलब है, क्योंकि अभी आप आपातकाल समझते हैं एक प्रकार का, संघीय ढांचे के अंतर्गत जो अधिकार क्षेत्र है केन्द्र का, वो बढ़ जाएगा, जो भी सत्ता और पॉवर है, वो बढ़ जाएगा, पर जहाँ पर उत्तरदायित्व और कर्तव्य का सवाल आएगा, वहाँ पर उनकी जिम्मेवारी नहीं बढ़ेगी, वो जीरो रहेगी? संघीय ढांचे में आप आदेश सब देंगे, डायरेक्शन सब देंगे, लेकिन उत्तरदायित्व कुछ नहीं निभाएंगे।
नंबर सात, जो खर्चे से संबंध रखता है, एक प्रकार से देखिए, मैं पहले प्रवासियों के बारे में बात खत्म कर दूं। प्रवासी के बारे में हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि देश में हमारा लगभग 80 प्रतिशत इनफोर्मल सेक्टर है। जहाँ तक श्रमिकों का सवाल है, काम करने वालों का सवाल है और इसमें सबसे ज्यादा कमजोर इस 80 प्रतिशत, सबसे ज्यादा वनरेबल अगर है, तो वो है प्रवासी श्रमिक, मजदूर। इन्हीं की पीठ पर बैठकर हम लोग देश के इन्फ्रास्ट्रक्चर का फायदा उठाते हैं, पर जब इनकी जरुरत आती है तो हम इनका तिरस्कार करते हैं, इन्हें भूल जाते हैं। आपने इनको लॉकडाउन का 3 से 4 घंटें का नोटिस दिया। केन्द्र सरकार ने गड़करी जी ने अभी दो हफ्ते, 10 दिन पहले कहा कि इनका बहुत ही गंभीर मुद्दा है। बार-बार गंभीर मुद्दा शब्द इस्तेमाल करते हैं और फिर सब कुछ छोड़ देते हैं प्रदेश सरकार के ऊपर। माननीय प्रधानमंत्री जी ने 2,3,4 वीडियो कॉन्फ्रेंसिग की, उसमें 4-4 घंटे लगाए, उसमें 50 प्रतिशत समय और 50 प्रतिशत क्या 70 प्रतिशत प्रदेश मुख्यमंत्रियों ने मांग की प्रवासी श्रमिकों के लिए सहायता की, आपने सुना, आपने वीडियो कॉन्फ्रेंसिग को बहुत प्रचारित किया, लेकिन किया क्या, कॉन्क्रीट ठोस- जीरो। प्लॉनिग 45 दिन बाद, जैसा मैंने कहा खोदा पहाड़, निकला चूहा जैसे।
अंत में इसका संबंध मैं आपको बताना चाहता हूं कि ये लोग भी जो मानव अधिकार के बिंदू से देखें, ये खाएंगे क्या, पीएंगे क्या, रहेंगे कहाँ, सोएंगे कहाँ, उठेंगे, बैठेंगे कहाँ? आपने जितने भी हाइजीन के नोर्म बनाए हैं, उनका पालन कैसे करेंगे? अभी 2 दिन में जो प्रकाशित है और इसकी कई डिटेल हैं, मैं उसमें जाना नहीं चाहता। हालाँकि, एक आरबीआई द्वारा स्थापित इंस्टिट्यूट है, इंस्टिट्यूट ऑफ डेवलप एंड रिसर्च। उसने प्रकाशित किया है कि पिछले 40 दिन या लगभग जो भी लॉकडाउन का समय रहा है; उसमें औसतन 20 प्रतिशत महंगाई बढ़ गई है। मेरे पास आंकड़े हैं, सिर्फ दाल में 6 से 9 प्रतिशत बढ़ी है, आलू को लें तो 15 प्रतिशत, टमाटर को लें तो 28 प्रतिशत, इसलिए औसतन मैंने कहा 20 प्रतिशत। बाकी हमारे पास डिटेल आंकड़े हैं। एक तरफ तो यह हो रहा है और दूसरी तरफ आप सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के 20,000 करोड़ रुपए में से एक पैसा कम नहीं करना चाहते, एक तरफ आप बुलेट ट्रेन का 1.1 लाख करोड़ में से एक पैसा कम नहीं करना चाहते।
प्रकाशित सूत्रों के अनुसार आप तैयार हैं, शायद हमारे राष्ट्रीय डिफेंस बजट को 40 हजार करोड़ से कम करने के लिए, एक ऐसी सरकार जो राष्ट्रवाद की दुहाई और सबक हमें हर दिन सिखाना चाहती है और यहाँ पर ये महंगाई हर दिन बढ़ रही है। प्रवासियों के लिए कोई सहायता नहीं, प्रदेशों को फिसकल कोई समर्थन नहीं।यह किस प्रकार का लॉजिक है, हमें समझ नहीं आता।

Dr. Abhishek Manu Singhvi said- The main issue I am addressing friends is, that the Central Government has abandoned mercilessly, cruelly and without a second thought the entire category known as migrant labour. Let me remind you that the migrant labour is the most vulnerable, weakest section of our informal sector in the whole of the India and India’s informal sector is 80% of the workers. The 20% you think about, which are in the organised sector, are minuscule as compared to this sector. This sector is one of the most vulnerable and important segment. It is on the backs of these people that we enjoy our infrastructure. These are people who had four hours notice. They need food, they need drink, they need to sit, they need to sleep, they need to travel, they need to move, and they need to observe. The Government has not given even one paisa to the state Governments; I am talking to the Central Government for them on any of these four counts.
On 29th April, 2020, two days ago and this is first time we are comprehensively addressing this issue, a farman like a Tughlaqi farman is issued by the MHA, which is very quaint and very funny one, if it would not be tragic, it would be funny, as it seems to have been issued by an ignorant person, by a person, who is uncaring and in fact constituting a cruel joke, a slap in the face of this vulnerable section. It says 3-4 very funny things, it says you are now allowed, what is allowed ? To go from one state to other, return to your states, so it said, but, you can do it only by buses and the receiving and the sending state must have nodal officers and each must consult each other before you reach and lastly, there must be screening at the receiving point. I don’t know, how much of this have to be said by this great big circular. So, now I have 6-7 very quick points for your consideration.
After 45 days did you expect this? After 45 days, this is the Brahmastra, the bomb, the great big cake, which the Central Government has offered, not only to migrant labour, but, to states? Is it ‘all fizz and no pop’ after 45 days of waiting?
Have you not had the good sense in 45 days? Not, only, not to increase your 0.7% of GDP injection. Remember, USA has given 10%, Malaysia, a country very different from USA has given 16% fiscal injection. You have not even given a penny for the narrow segment of Migrant labour. Let me make it more narrow and subset, the transportation of Migrant labour.
You have no idea of the stated facts and the number of the migrant labour, when you issued this Tughlaqi Farman on 29th April, 2020. You simply said- I am speaking like a king, you are allowed to move, move only in buses, it is your headaches not mine. Did you know that only UP and Bihar estimated that 42-45 lakh people want to come back to these two states. Of course, these figures are probable or undersigned, but, I am giving you broad idea. Bihar says that from Maharashtra and Tamil Nadu alone, we anticipate 25 lakhs. Rajasthan says 3 or 2.8 lakh people want to come back. I have other figures, I don’t want to go into details. Kerala says- 4 lakhs, Punjab says- 4 lakhs. Delhi has the large number of stranded labour here, about 10 lakh+, some people say- 15 lakhs. Orissa CM gave a statement estimating around 7 lakh people to return. Assam, not an easy place to reach, wants or expects 1.5 lakh people to come. Now, first of all, do you have a database, do you have any information, any figure, you have no idea. That’s how this amateur circular is.
If you knew, you were not having this very funny; I would say almost amazing, unprecedented direction thou shall travel only by buses. Any estimate of these figures means that you take 2 or 3 years to transport them by buses. How many buses, how much petrol, how much diesel, how many roads, how many road blocks, we don’t know and what is the rationale behind this, I am not able to understand, the country is not able to understand this.
Why not special trains for this vulnerable, stranded, abandoned class. Trains can be special. They can be with completely social distancing maintained, they can be calibrated and regulated, food can be served and they should be point to point. Even if 10-20 and then 50 and hundred trains are slowly ramped up. That is according to common sense and not uncommon nonsense. Is it the most efficient answer? Is it the least time consuming, is it the best or is this tughlaqi farman of a bus, what are you trying to save? Money, resources, logistics? You are one of the world’s largest train departments. Former Railway Ministers, every opposition party, Congress of course, is in the forefront of this has been saying- why don’t you run railways? Now, I can only scribe it to some kind of obstinacy, some kind of Zid. Unfortunately, I can only ascribe it to some kind of ignorance, some kind of foolishness, some kind of complete negligence to hell with this category, we don’t care. You can have special planes with far lesser numbers; you can’t have special trains within your own country for far larger numbers. Such an approach and such a lapse suggests a disconnect between India as it exist and in the imagination as it is found in 7, Lok Kalyan Marg. A road, which is renamed and the name itself is now become ironic in the light of migrant labour issues, I have raised. We cannot, but, help notice the similarity between Notebandi and Gharbandi, between demonetisation and lockdown. The elements, I am today talking about, no prior planning for these migrant labour, four hours notice, no trains, only buses and that too after 45 days, sudden announcements, no economic package, so this history is repeating itself in a much more dire situation then we are all collectively battling.
Friends, my last two points are this that a fiscal injection, especially designed for migrant labour is the need of the hour. We have been crying ourselves hoarse since the first press conference, I took 40 days ago, asked for fiscal injection, you have got only one figure from day one, 0.7% of GDP, US gives 10%, and Malaysia has given 15-16%. Now, can you give 2-1/2 thousand crores? Can you give 2 thousand crores? Can you give 1 thousand crores only for migrant labour to transfer back through trains and other food support?
There is a very-very sad and interesting irony here, when you want to abuse federalism, cross all federal frontiers and boundaries and expand your powers in the name of a fiscal or a medical emergency then federalism has no limit. You will give every kind of direction and control every state, but, when it comes to obligations, then federalism is the limit. This is my federal obligation that is yours, you please take that yourself, I don’t care. Is this not, ‘चित भी मेरी, पट भी मेरी’? Is not it, Heads I win, Tails you lose ? What kind of hypocrisy is this? किस प्रकार का आडंबर है ये? और ये चित भी मेरी, पट भी मेरी, कौन सी जीत दिखाता है, आपको?
May I end by linking this to a sad development which had been published widely in the last two days and that I called sad, because, at the end of the day you have to feed your children and your wife and your husband, is where it hits most. The shoe pinches most there.
Yesterday and the day before, a reports was published in many papers in the vernacular especially, but, in particular sourcing into the Institute of Development Research, Mumbai established by the RBI says that in the duration of the lockdown, be it 40 days, be it 45 days, we have had average 20% increase in prices. I have the figures, tomatoes- 28%, potatoes- आलू, the humble aloo- 15%, Dals (pulses)- 6-9%, whole lot of other figures are there. Now, if this is so, is this a double whammy, a triple whammy, squeezing these people from the top, from the bottom, from the every possible way.
The Central Government should wake up. The mismanagement of the migrant workers and the treatment meted out to them, shows and reflects the approach of this Government to the poorest segment, that too during pandemic and that reveals, unfortunately, a very bizarre developmental model for India during these crisis times.

एक प्रश्न पर आपने माईग्रेंट वर्कर को लेकर ट्रांसपोटेशन की बात की, रेलवे मिनिस्ट्री का कहना है कि अगर जहाँ से ट्रांसपोटेशन होना है और जहाँ डेस्टिनेशन है, दोनों राज्य तैयार हैं, आज सुबह भी एक ट्रेन चली है जो तेलंगाना से शुरु हुई है और झारखंड़ के अंदर पहुंचेगी। करीब 500 वर्करों को पूरी सुरक्षा के तहत भेजा गया है, क्या इससे कांग्रेस सहमत है? डॉ. सिंघवी ने कहा कि आप अपने प्रश्न का उत्तर अपने आप समझिए कि आम आदमी के तौर पर ये एक ट्रेन का उदाहरण देकर क्या आप संतुष्ट हैं? क्या आपका उदाहरण मेरे प्वाइंट को अंडरलाइन नहीं करता, दोहराता नहीं? आप सोचिए कि ये कोई ब्यूरोक्रेटिक खेल चल रहा है कि आप अनुमति के लिए इंतजार कर रहे हैं। कोई स्टेट है, जो कह रहा है कि हम बस के लिए हां कह रहे हैं और ट्रेन के लिए ना कह रहे हैं और आपने 45 दिन बाद एक ट्रेन चलाई है, वो भी इतने विरोध के बाद। हम आज बात कर रहे हैं आपके सर्कुलर का; आपने सर्कुलर जारी किया है 29 तारीख को, आज 1 तारीख है, परसों शाम को, उसमें क्या लिखा है, ये सही है कि हमने विरोध किया, कल भी किया, आज हम औपचारिक रुप से कर रहे हैं, आपने किया, विपक्ष ने किया, तो आपने आज बोल दिया कि आज एक ट्रेन जा रही है। 29 तारीख में लिखा है सिर्फ बसें। एक ट्रेन नहीं, कम से कम 500 ट्रेन। ये आपने पहले किया होता तो धीरे-धीरे यह बढ़ता, एकसाथ नहीं बढ़ता है, रैंपअप करना पड़ता है, इसके लिए प्लानिंग करनी पड़ती है। आपका प्रश्न बड़ा सटिक है, वो इस बात को निर्धारित करता है कि एग्जेक्टली यही हो रहा है, इमिडिएट रिएक्शन। आपने कुछ कह दिया, यानि ये 29 तारीख के बाद का रिएक्शन है। उसका विरोध मैंने किया, तो ऑन दी स्पोट एक नई नीति बन गई।
एक अन्य प्रश्न पर कि क्या आप इस चीज से जो ये कवायद सरकार की तरफ से की जा रही है, इसको आप खारीज करते हैं या मानते हैं? डॉ. सिंघवी ने कहा कि मैं तो समर्थन कर रहा हूं, मैं कह रहा हूं जीरो- टू लेट। टू लेट शुरुआत हुई है 0.1 प्रतिशत से। अब हम इसका इंतजार करते, हमने इसकी निंदा की है, इसकी त्रुटियां निकाली हैं, तो मैं आशा-विश्वास करता हूं कि कुछ हफ्तों में बढ़ेगा। लेकिन जब तक ये कम से कम ऐसे स्तर पर पहुंचता है कि भारत के संदर्भ में बात करते हैं तो 1 और 500 का आंकड़ा क्या है, उस 1 की जगह 500 ट्रेन चलाने के लिए आपके पास प्लानिंग होनी चाहिए। आज के वक्त लगता नहीं है कि आपके पास प्लानिंग है, ट्रेन के लिए भी तैयारी करनी पड़ती है, सोशल डिस्टेंसिंग, उसके लिए वहाँ के कर्मचारी, टेक्नोलॉजी, इत्यादि-इत्यादि, हम सब जानते हैं। अगर होता तो मैं समर्थन करुंगा, लेकिन ये तो भविष्य की बात हो रही है, आज तो हम बात कर रहे हैं पास्ट की, ये कॉमन सेंस की बात है। आप हर दिन लंबे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करते हैं, उसमें 50 प्रतिशत से ज्यादा समय में प्रदेशों ने मांग की है, आप आज बता रहे हैं कि एक ट्रेन जा रही है।
एक अन्य प्रश्न पर कि अभी कुछ देर पहले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने कहा कि जो ग्रीन जोन क्षेत्र में है, उसमें हम 3 तारीख के बाद छूट देंगे और रेड़ जोन वाले को छूट मिलने की संभावना कम है, क्या यही फार्मूला प्रधानमंत्री जी पूरे देश को बताने वाले हैं? डॉ. सिंघवी ने कहा कि पहली बात तो मान कर चल रहा हूं कि करीब-करीब माईग्रेंट लेबर वाला मुद्दा है, उस बारे में बात करें। दूसरा, मैं भविष्वाणी नहीं कर सकता कि माननीय प्रधानमंत्री जी 3 तारीख को या 4 तारीख को क्या कहेंगे? तीसरा, जो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने कहा है, वो कॉमन सेंस की बात है, निश्चित रुप से हमें आर्थिक जरुरत, मंदी को और कोरोना की मैडिकल विषयों को बैलेंस करना पड़ेगा, संतुलित करना पड़ेगा। उसका सबसे अच्छा तरीका है कि ग्रीन और रेड जोन में पूरा, मैं तो कहूंगा कि रेड और ओरेंज करीब-करीब रेड के पास ही आना चाहिए, ग्रीन एक अलग कैटेगरी नहीं होनी चाहिए। नंबर चार, ग्रीन अगर अलग कैटेगरी है तो ये कहना कि ये ग्रीन के लिए आवश्यक है, इस ग्रीन कैटेगरी को कैसे सेनेटाइज किया जाए, इसके और लाल के बीच में दिवार कैसे लागू हो, यही चुनौती सब प्रदेशों के लिए है। इसमें कोई दो राय नहीं कि उद्धव जी ने सही कहा है, लेकिन उसको नियंत्रित करना इतना आसान नहीं, उसके ऊपर वो लगे हुए हैँ। ग्रीन आपने ‘एक’ कमरा बना दिया और रेड़ ‘दूसरा’, बीच का जो स्थानांतरण है, समतल है, पूरे देश के लिए उसको रेगूलेट और कंट्रोल करना अति आवश्यक है। ये तौर तरीके जब तक सभी प्रदेशों को आर्थिक समर्थन नहीं मिलेगा, दूसरा समर्थन नहीं मिलेगा और वो केन्द्र सरकार ही कर सकती है, तब तक संभव नहीं होगा।
एक अन्य प्रश्न पर कि प्रधानमंत्री जी जब देश के नाम अपना संबोधन देंगे तो क्या माईग्रेंट लैबर के मुद्दे पर भी अपनी बात रखें कि इसमें केन्द्र सरकार कैसे सहयोग कर सकती है या करेगी? डॉ. सिंघवी ने कहा कि निश्चित रुप से आप सही कह रहे हैं और मैं साथ में ये विनम्रता से जोडूंगा कि अब जो आप कह रहे हैं, पहले ही काफी विलंब के बाद, लेकिन it is never too late but it is very late, दूसरा बड़ा होना चाहिए, अनुपात में, प्रपोर्शन में होना चाहिए। ये नहीं कि पहाड़ के लिए चिंटी सामने रख दी। ये obvious चीजें हैं, लेकिन अब भी हो, परसों हों, कल हो, हम स्वागत करेंगे। हमें इसमें कोई इगो नहीं है। हम आपके और हमारे बीच में डिबेटिंग प्वाइंट स्कोर नहीं कर रहे हैं, हम इसके लिए एक सार्थकता रख रहे हैं, सच्चाई रख रहे हैं।
एक अन्य प्रश्न पर कि आपने अभी कहा कि माईग्रेंट लेबर को लेकर 45 दिन बाद सरकार ने फैसला लिया, वो भी आधा अधूरा, उससे पहले विपक्ष ने इस बात को क्यों नहीं उठाया था? डॉ. सिंघवी ने कहा कि बिल्कुल गलत।आज की प्रेस वार्ता ली गई है, सरकार के 29 अप्रैल के औपचारिक दस्तावेज का संदर्भ है। हम सरकार नहीं हैं, सरकार ही लागू करती है और उन्होंने परसों लागू किया।आप हमारी प्रेस वार्ता, सोनिया गांधी जी के लैटर और हमारे सार्वजनिक रुप से डिमांग माईग्रेंट लेबर के बारे में कम से कम 10 बार की गई, ट्रेन की बात की गई। 27 मार्च को सोनिया गांधी जी ने प्रधानमंत्री जी को जो पत्र लिखा था, उसमें मांग की गई थी। महीने भर से स्पष्ट रुप से ट्रेन की बात हो रही है। लेकिन सिर्फ ट्रेन की बात नहीं, सोनिया गांधी जी ने स्पेसिफिक्ली अलग से रखा है, माईग्रेंट लैबर का कि उनको कितना मिल रहा है, और सबको कितना मिलना चाहिए। लेकिन इंसेंसेटिव सरकार, अनसुनी करने वाली सरकार है। मार्च के बाद से हम लोगों ने कम से कम 10 पत्र, प्रेस वार्ता एवं सार्वजनिक स्टेटमेंट दिए। आप बसें ही क्यों, ट्रेन को भी चलाए, बेशक आप कम चलाएं, उसमें 5-5, 7-7 फिट का डिस्टेंस रखिए, आप कंट्रोल करिए। इसमें तो कोई दो राय नहीं हो सकती है। मैंने कहा इसमें कॉमन- सेंस और अनकॉमन- सेंस का फर्क है।
एक अन्य प्रश्न पर कि जिस तरह से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रूड ऑयल के दाम कम हुए हैं, लेकिन फिर भी हरियाणा सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए हैं, क्या कहेंगे? डॉ. सिंघवी ने कहा कि मैं हरियाणा के आधार का उत्तर नहीं दूंगा, लेकिन दो बातें कहूंगा। इसी प्रश्न पर पहले बड़ी स्पष्ट प्रेस वार्ता की थी, आंकड़े दिए थे कि इससे कम कीमत कभी नहीं हुई अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और इससे ज्यादा कीमत आंतरिक डोमेस्टिक नहीं हुई। ये कैसी विडंबना है और वो भी कोविड़ के वक्त? हमने आपको आंकड़े दिए हैं, आप दो– तीन हफ्ते पहले की प्रेस वार्ता से निकाल सकते हैं। जहाँ तक हरियाणा का सवाल है, आज ही मेरे सहयोगी रणदीप सिंह सुरजेवाला जी ने प्रेस वार्ता की है, आपको हरियाणा के बारे में भी आंकड़े मिल जाएंगे। लेकिन इसमें हरियाणा क्या करेगा, पूरे देश में सिर्फ टैक्स लेकर आपने लाखों-करोड़ों रुपए एकत्र किए हैं। हमने कहा कि 60 प्रतिशत से ज्यादा टैक्स है, कीमत 40 प्रतिशत भी नहीं है, 33 प्रतिशत भी नहीं है। हमने कहा कि आपको 60 या 65 प्रतिशत पर इसे पूरा रखना है, उससे आधा तो दे दीजिए वापस। जब आप उसका आधा नहीं दे रहे हैं। हरियाणा को भी नहीं दे सकते, देशभर में यही चीज होगी। लाखों-करोड़ों रुपए आपने जमा किए, आप उसका इस्तेमाल वो भी कोविड के समय, अब नहीं करेंगे तो कब करेंगे? आप उसको कोई और नाम दे दीजिए, प्रवासी वर्ग के लिए कर दीजिए, 5 प्रतिशत में जीडीपी कंसेशन दे दीजिए कोविड़ के नाम से। वो भी कर लीजिए, लेकिन कहीं ना कहीं तो इसका इस्तेमाल करना पड़ेगा ना।
महाराष्ट्र में MLC चुनाव की घोषणा के संदर्भ में पूछे एक अन्य प्रश्न पर डॉ. सिंघवी ने कहा कि मैं अभी ज्यादा नहीं बोलूंगा इस पर, जैसा कहते हैं अग्रेंजी में, all’s well that ends well, अगर ये बात, ये मसला हल हुआ है तो मैं स्वागत करता हूं, अभी तक औपचारिक तारीखें नहीं आई हैं, लेकिन मैं बिल्कुल स्वागत करता हूं इस घोषणा का, लेकिन 2-3 चीजें और कहना चाहता हूं कि ये घोषणा स्वत: काफी समय पहले होनी चाहिए थी। आखिर आप एक मुख्यमंत्री की बात कर रहे हैं और भारत के सबसे बड़े व्यापक प्रदेश की बात कर रहे हैं, इसकी याद दिलाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए ना मुख्यमंत्री द्वारा, ना प्रदेश द्वारा की 1 मई आ गया है, 27 मई दूर नहीं है। दूसरा, ये अगर किसी कारण से नहीं हो, खैर सौभाग्य है कि 200- 250 लोग होते हैं या 300 लोगों की स्ट्रैंथ होती है एसेंबली का, इस चुनाव के लिए इलेक्ट्रोल कालेज होता है। इसलिए, सामाजिक दूरी के साथ, सहुलियत के साथ हो सकता है। इसलिए चुनाव की घोषणा बहुत पहले हो जानी चाहिए थी। तीसरा, अगर किसी कारणवश या कोरोना के कारण यदि नहीं भी होती, तो भी माननीय राज्यपाल को कुछ क्षणों में, मिनट भी नहीं, ये नॉमिनेशन नामांकन कर देना चाहिए। इस नामांकन की एक प्रति को भेजे हुए कई हफ्ते हो गए हैं, कई हफ्तों में माननीय राज्यपाल की इस तरह अनुमति नहीं आई, उसके बाद नामांकन वापस दोबारा लिया गया 2-3 हफ्ते पहले। खैर नामांकन की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि चुनाव घोषणा शायद हो जाएगी। लेकिन मैं आपको कुछ ऐसी बातें बता रहा हूं, जिसमें बिल्कुल अनावश्यक राजनीति लाने की आवश्यकता नहीं है।
एक अन्य प्रश्न पर कि माईग्रेंट लैबर की बात कर रहे हैं जो भारत में रह रहे हैं, लेकिन काफी बाहर देशों में फंसे हुए हैं, आपको लगता है कि उनको लेकर भी सरकार को अपनी रणनीति साफ करनी चाहिए? डॉ. सिंघवी ने कहा कि बिल्कुल आवश्यक है। केन्द्र सरकार को लीडरशिप नेतृत्व लेने में कोई दो राय नहीं करनी चाहिए। ये कोई इंडिविजुअली प्रदेश नहीं कर सकता। आप अंतर्राष्ट्रीय बात कर रहे हैं, निश्चित रुप से आप करने के लिए बाध्य है, आपके पास कम से कम कोई प्लान तो होना चाहिए। आज हो क्या रहा है, केरल के बहुत सारे प्रवासी हैं, केरल प्रयत्न कर रहा है, अब आप केरल के प्रयत्नों की सराहना कर सकते हैं, मुद्दा ये नहीं है, मुद्दा ये है कि बाहर के लोगों के लिए भी आवश्यक है। लेकिन उससे ज्यादा प्राथमिकता कहीं गरीब के लिए है और आंतरिक प्रवासियों के लिए है और उससे निकट दूरी पर क्लोज डिस्टेंस जिसे कहेंगे, विदेशी के लिए भी है, क्योंकि वहाँ पर भी कई लोग हैं, एक वर्ग है वहाँ पर, जो इतने समृद्ध नहीं हैं जितना हम सोचते हैं कि आप विदेश चले गए, इसका मतलब ये नहीं कि आप समृद्ध हो गए। उसके लिए आपको एक राष्ट्रीय प्रोग्राम बनाना पड़ेगा, सबसे महत्वपर्ण बात आपने ये शुरु किया होता कम से कम 30 दिन पहले, जो 45 दिन बाद आप कर रहे हैं, तो आधा काम तो हो गया होता, आपने तो किया है, इजराइल के लिए किया है, चार्टेड़ प्लेन जर्मनी गए हैं, इंग्लैंड के लिए किया। जब तकलीफ होती है पाइरेसी की समुद्र में तो आप करते हैं ऐसे प्रबंध। इसलिए ये मान सकता हूं मैं कि आप प्रय़त्न कर रहे हैं 30 दिन से, आपके पास अभाव है, वो अलग बात है, लेकिन कोई प्लान ही नहीं है। किसी राज्य को बोल दिया कि हम तो केन्द्र है, आपको बुलाना है केरलाइट, मलयाली, आप बुलाईए, आपको बुलाना है राजस्थानियों को, आप बुलाईए।

youtube link : https://youtu.be/mT1fQdOREms

Sd/-
(Vineet Punia)
Secretary
Communication Deptt,
AICC

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