20-November-2018 कांग्रेस मुख्यालय में संवाददाता सम्मेलन संबोधित करते हुए

ALL INDIA CONGRESS COMMITTEE

24, AKBAR ROAD, NEW DELHI

COMMUNICATION DEPARTMENT

Highlights of the Press briefing

वो सिलेक्टिवली मौन व्रत में माहिर हैं, जब चाहें तो बहुत मुखर और प्रखर हैं और जब जवाब नहीं होता तो चुप्पी साध लेते हैं और चुप्पी आज उनकी आवश्यकता इसलिए बन गई है, क्योंकि जो भ्रष्टाचार विरोधी नैया के बारे में वो 24 घंटे बात करने का प्रयत्न करते थे, आज वो आपके सामने, उनके सामने डूब रही है। ‘ना खाऊँगा ना खाने दूंगा’, ये वाक्य आज एक भद्दा मजाक लग रहा है और इसलिए मोदी जी, सत्तारुढ़ पार्टी के अध्यक्ष और सभी मंत्री दोषियों को बचाने के लिए एक बहुत अवसरवादी मौन व्रत के अंदर बंधे हुए हैं। बचाना अति आवश्यक है, नहीं तो ये काले कारनामे आपके सामने और विशेष रुप से उच्चतम न्यायालय के सामने पारदर्शी रुप से उजागर हो जाएंगे।

मेरा मूल प्रश्न ये है कि आज आपने इस दस्तावेज में, जिसका जिक्र कल हुआ, ऐसी-ऐसी चीजें पढ़ी हैं, इतने गंभीर और इतने संगीन आरोप पढ़े हैं कि इतने बड़े पैमाने पर पैसे से खरीद-फरोख्त हो रही है, मोदी सरकार के नाक के नीचे और ये एक हलफनामे में सत्य को साक्षी मानते हुए कहा गया है, सिर्फ वार्तालाप में, किसी रिकोर्डिंग या किसी स्टिंग ऑपरेशन में नहीं कहा गया है। तो कम से कम इस देश को इतनी न्यूनतम जवाबदेही का अधिकार है कि हमारे मुखर और प्रखर प्रधानमंत्री सनसनीखेज प्रकरण पर दो शब्द बोलें। आपको एक शब्द नहीं मिला, सिवाए एक वाक्य के वो अमुक मंत्री महोदय की ओर से, जिनका नाम आया है, लेकिन ये तो संस्थापित रुप से भ्रष्टाचार है, ये कोई एक मंत्री की बात नहीं है, हर स्तर पर आप भ्रष्टाचार सुन रहे हैं और ये लेटेस्ट एफिडेविट में वही श्रृंखला है, वही कड़ी है, जो आप पिछले 2-3 एफिडेविट से पढ़ रहे हैं। हैदराबाद से लेकर, साना से लेकर जो प्रत्याशी हैं उच्चतम न्यायालय में वर्मा जी, उनके हलफनामे में, कभी बस्सी जी के, कभी किसी और के हलफनामे में, लगभग 5-6 ऐसे दस्तावेज आपके समक्ष, पारदर्शी रुप से पब्लिक डोमेन में आ गए हैं, लेकिन फिर भी चुप्पी, एक शब्द नहीं, एक सफाई नहीं, एक एक्सप्लेनेशन नहीं।

ये कौन से मंत्रालय के, किस नियम के अंतर्गत, ट्रांजेक्शन ऑफ बिजनेस रुल में लिखा है। सिर्फ इसलिए कि NSA प्रधानमंत्री से सीधी बातचीत करते हैं, नहीं तो क्या अधिकार क्षेत्र है मिनिस्ट्री ऑफ पर्सनल के मामले में या सीबीआई के मामले में हस्तक्षेप करना, सीबीआई तो उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता और ये उनका अधिकार क्षेत्र नहीं हो सकता कि इनकी नियुक्ति चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ, नेवी स्टाफ इत्यादि के ऊपर है, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से कहीं ज्यादा अधिकार क्षेत्र है इनका। इतने दिनों में, ये हलफनामा पहला हलफनामा नहीं है, हलफनामे पहले भी आए हैं। माननीय प्रधानमंत्री की चुप्पी क्यों है? जूनियर मंत्री महोदय में क्या दम है, बहादुरी है कि वो सफाई दें, तथ्य दें, कुछ संदर्भ दें या सिर्फ एक लाईन की मनाही दें? ये दूसरे जूनियर मंत्री कौन हैं जो एक दूसरे मंत्री के लिए मामला ‘Settle’ कर रहे हैं? ये settlement वाला पीएमओ है, किसके प्रभाव से settlement होते हैं, कौन उनका मीडियम होता है? ये सब महत्वपूर्ण प्रश्न देश पूछ रहा है। ये मामले एक डीआईजी लेवल के व्यक्ति ने उच्चतम न्यायालय के स्तर पर कहे हैं और आप ये भी कह सकते हैं कि ये झूठ है, ये कह सकते हैं कि ये आंशिक सत्य है, ये कह सकते हैं कि आंतरिक जांच से हमें ये मालूम पड़ा, लेकिन कुछ भी नहीं- सिर्फ चुप्पी। क्यों श्री डोभाल का हस्तक्षेप था, किस अधिकार क्षेत्र में उन्होंने एफ.आई.आर. के बारे में श्री अस्थाना को सूचित किया? आपको याद है कि एक यूपीए के मंत्री महोदय ने कानूनी settlement जिसे कहते हैं, कानून रुप से लिखना कहते हैं, एक एफिडेविट को देखा, जांच की और उसको ऊपर-नीचे लिखने का प्रयत्न किया, उसमें उनका इस्तीफा हुआ। यहाँ तो सीधा हस्तक्षेप है, आप गिरफ्तार हो रहे हैं, आपको गिरफ्तार कैसे नहीं होने दिया जाए, अभी क्या हो रहा है, अभी मैं क्या करने वाला हूं, ये सब चीजें शेयर हो रही हैं एक ऐसे व्यक्ति से जो गिरफ्तार होने जा रहे हैं और क्या लिंक है इन 4-5 नामों का, डोभाल से लेकर, अस्थाना से लेकर, दिनेश्वर प्रसाद से लेकर, जो मनोज कुमार के पिता हैं, और मोइन कुरैशी केस से लेकर। कुछ तो बताईए, देश को कुछ तो जवाबदेही दीजिए, आप भ्रष्टाचार के विरुद्ध इतने अभियान, मुहिम चलाते हैं, आज ये चुप्पी कैसी?

अगला प्रश्न, कौन था ये RAW ऑफिसर, जो ये मामला सीबीआई के साथ नेगोशिएट कर रहा था? 23 अक्टूबर का जिक्र है हलफनामे में, कौन व्यक्ति है, इसका नाम क्या है?

सातवां प्रश्न, अगर किसी आरोपी को मिलना गलत माना गया है तो किस हैसियत से सीवीसी उस व्यक्ति से मिल रहे हैं, जो विटनेस बना है साना के विरुद्ध, मोइन कुरैशी केस में? सीवीसी किस अधिकार क्षेत्र से अस्थाना से मिल रहे हैं, क्योंकि अस्थाना इस केस में एक आरोपित हैं?  तो क्या सीवीसी का उनसे मिलना उपयुक्त है और क्यों सीवीसी की डेनमार्क यात्रा कैंसिल हुई, निरस्त हुई? क्या उनको पूर्वानुमान था, क्या वह पूर्व सूचित थे कि कुछ होने वाला है, इसलिए डेनमार्क जाना आवश्यक नहीं है? ये महत्वपूर्ण प्रश्न हैं, जिनका सरकार कोई उत्तर देती ही नहीं है।

आज इस सरकार को आए पौने पांच साल हो गए हैं, कभी आपके साथ प्रेस वार्ता की? दुनिया के सभी लोग छोटे हैं, सबसे बड़े प्रधानमंत्री हैं, प्रथम पुरुष इस देश के। हम प्रेस वार्ता कर सकते हैं तो उन्होंने कभी प्रेस वार्ता क्यों नहीं की आपके साथ। कोई सूचना तो दें आपको, आपके दो-चार प्रश्नों को, जो ई-मेल के द्वारा नहीं दिए गए हों, जो विदेशों में बैठकर पूर्वनिर्मित ना हों, वैसी प्रेस वार्ता कभी तो कर लें। ना जवाबदेही, ना तथ्य, ना प्रेस वार्ता, चुप्पी, ये कैसी चुप्पी है? इन अफसरों ने सतीश अस्थाना को क्यों कहा कि आप ‘helpful’ होईए, ये सब हलफनामा में लिखा है। मैं इस प्रकार के प्रश्न बढ़ा सकता हूं, मेरे पास और प्रश्न हैं, लंबा हलफनामा है, एक हलफनामा नहीं है, तीन और व्यक्तियों ने पहले हलफनामे दिए हैं, उसी श्रृंखला में ये एक और है। लेकिन मेरा मूल मुद्दा है इन सभी 7-8 प्रश्नों के जरिए यह है कि हमें प्रधानमंत्री से जवाबदेही चाहिए, आपके छत्तीसगढ़ में या सिंगापुर में मुखर और प्रखर होने से बात नहीं होती है। कांग्रेस को गाली देने से बात नहीं होती है, देश को इन प्रश्नों का जवाब चाहिए और इन प्रश्नों के जवाब में हमें सिर्फ चुप्पी मिल रही है।1984 दंगों के मामले में आए फैसले पर पूछे एक अन्य प्रश्न के उत्तर में डॉ. सिंघवी ने कहा कि कुछ दिनों पहले हमने कहा, मेरे सहयोगी ने कहा, मैंने कहा, ये कानूनी प्रक्रिया है और जिस अमुक व्यक्ति को प्रक्रिया के परिणाम के अनुसार एक दंड मिलता है, मैं समझता हूं पूरे देश को, पूरे सिस्टम को उसका स्वागत करना चाहिए। साथ-साथ ये ध्यान रखना चाहिए कि कानूनी प्रक्रिया एक संतुलित तरीके से हो, उसके जो अपील वगैरह के प्रावधान हैं, वो भी हों, लेकिन निश्चित रुप से ये अच्छी बात है कि अगर ये प्रक्रिया उस प्रक्रिया करने वाले और उस अभियुक्त के बीच की बात है और कांग्रेस अगर न्याय हुआ है तो उसका 100 प्रतिशत स्वागत करती है।

एक अन्य प्रश्न पर कि अखिलेश यादव ने मध्यप्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस और बीजेपी पर तीखा हमला बोला है, क्या कहेंगे, डॉ. सिंघवी ने कहा कि गठबंधन, adjustment, समझदारी इतने और प्रदेशों में, इतने और आयामों में हो रही है। उस प्रदेश में हमारा कोई गठबंधन नहीं है। उस प्रदेश में लाजमी राजनीतिक जो भी लड़ाई लड़ सकते हैं, उसको कांग्रेस भी उतने ही पुरजोर तरीके से लड़ेगी, जितना कि अपेक्षा करेंगी और पार्टियां, कांग्रेस के विरुद्ध लड़ने की। इसलिए उन वाक्यों को राजनीति के संदर्भ में देखना चाहिए। मैं बिल्कुल नहीं मानता कि एक वाक्य एक ऐसे प्रदेश में राजनीतिक गरमा-गर्मी में जहाँ पर हम और वो प्रतिद्वंधी हैं, उसका अभिप्राय या उसका दुष्परिणाम किसी रुप से उस मुद्दे पर पड़ता है, जो ज्यादा व्यापक है यानि अन्य प्रदेशों में गठबंधन, सीट adjustment या समझदारी।    

एक अन्य प्रश्न पर कि बीजेपी के एक प्रवक्ता ने कहा है कि कांग्रेस ने देश को अस्थिर करने के चलते एक डीआईजी से ये हलफनामा लिखवाया है, डॉ. सिंघवी ने कहा कि हर वाहियात चीज का जवाब तो दे नहीं सकते, ये आपको खुद को हास्यास्पद नहीं लगता है। रॉ आपके पास है, सीबीआई आपके पास है, ईडी आपके पास है, आईटी आपके पास है, आप उसको मैनेज नहीं कर पा रहे हो। सलेक्शन कमेटी में बहुमत में आपने सलेक्ट किया, आपके नंबर एक में और नंबर दो में झगड़ा है, आपने रात के 2 बजे स्थानांतरण किया और आपके स्थानांतरण के विरुद्ध एक व्यक्ति हलफनामा देता है। तो मैं मानता हूं कि ये 2014 से नियम मान कर चलिए कि जैसा गब्बर सिंह कहते थे अरे वो पेड़ हरा, वो पत्ता हरा, कांग्रेस आ रही है, ये भयभीत सरकार है, इसको देश के हर पत्ते में ये जाहिर होता है कि कांग्रेस विद्यमान है। लेकिन इस प्रकार के वाहियात प्रश्न और हास्यास्पद टिप्पणियों का जवाब देने की आवश्यकता नहीं है, इसका उत्तर उनके प्रश्नों में ही निहित है।

एक अन्य प्रश्न पर कि प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि कांग्रेस जा रही है, डॉ. सिंघवी ने कहा कि ये वो व्यक्ति कह रहे हैं जो एक बार 2014 में पहली बार प्राथमिक रुप से अवतरित हुए हैं। इसी कसौटी पर लें तो जरा पूछें कि ये इस 65 साल में कितने समय के लिए विद्यमान थे, आ रहे थे या जा रहे थे और जब इन्होंने क्षणिक रुप से, आंशिक रुप से 1977 में उनसे जुड़े, जिनका आज ये विरोध कर रहे हैं, उसके बाद 1996 में आए और अब 2014 में आए हैं। तो जो लोग एक बिंदु हैं, जिनका अस्तित्व हमारे 150 वर्षों में दो-चार बिंदुओं जैसा है, वो जब ऐसी बातें करते हैं, तो वो गुरुर और अहंकार बहुत क्षणिक होता है और मैं आश्वासन देता हूं, माननीय प्रधानमंत्री को कि इधर तो आपके सभी कार्यकर्ता कांग्रेस से भयभीत हैं और उधर आप इन क्षणिक चीजों के ऊपर इतना अहंकार मत कीजिए, आपका गिरना बहुत निकट है।

ओवैसी के द्वारा दिए विवादित बयान पर पूछे एक अन्य प्रश्न के उत्तर में डॉ. सिंघवी ने कहा कि क्या ऐसे व्यक्ति को कोई जवाब देना चाहिए, जिसके पास बीजेपी हमेशा जाती है, जब भी उसको वोटों की जरुरत पड़ती है या जो खुद बीजेपी का दरवाजा खटखटाते हैं, जब उनको और चीजों की जरुरत पड़ती है। इनके प्रश्नों का तो उत्तर सबसे अच्छा ये है कि ये महाराष्ट्र में जाकर चुनाव क्यों लड़ते हैं, किसके कहने पर लड़ते हैं, किसके आधार और समर्थन पर लड़ते हैं? कभी बिहार में, कभी उत्तर प्रदेश मे क्यों लड़ते हैं? क्या सेक्युलर धर्मनिरपेक्ष ताकतों को मजबूत करने के लिए? तो मैं समझता हूं ऐसे व्यक्तियों का, इस प्रकार के आरोप का अपना एक उद्देश्य होता है और वो उद्देश्य भी इस गठबंधन को साबित करता है, बीजेपी और एआईएमआईएम गठबंधन।एक अन्य प्रश्न पर कि दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर आज लाल मिर्च पाउडर से हमला किया है, क्या कहेंगे, डॉ. सिंघवी ने कहा कि इन भद्दी चीजों की भर्त्सना करने में मुझे 30 सैंकड की भी जरुरत नहीं है। कांग्रेस इस प्रकार की भद्दी राजनीति पर किसी भी तरह से विश्वास नहीं करती है। ये किसी ने भी किया हो, ये हमारी रानजीति की ना परिभाषा है, ना सोच है, ना समझ है। मैं समझता हूं कि सभी लोगों को इसकी भर्त्सना करनी चाहिए, खंडन करना चाहिए, कभी दोहराना नहीं चाहिए, चाहे वो कोई भी हो, कैसा भी हो। मैंने जो कहा है मैंने कहा है। मुझे कोई सरोकार नहीं है, बीजेपी ने क्या कहा है, किसी ने क्या कहा है। मैंने कहा कि भर्त्सना करनी चाहिए ऐसे व्यक्ति की जो ऐसा कृत्य करता है। कोई भी व्यक्ति, किसी भी तरह से हो, कैसा भी हो, वह भर्त्सना योग्य है, अगर इस प्रकार की राजनीति वो प्रैक्टिस करता है।

Sd/-

(Vineet Punia)

Secretary

Communication Deptt.

AICC

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