6-Feb-2019 कांग्रेस मुख्यालय में संवाददाता सम्मेलन संबोधित करते हुए

ALL INDIA CONGRESS COMMITTEE

24, AKBAR ROAD, NEW DELHI

COMMUNICATION DEPARTMENT

Dr. Abhishek Manu Singhvi, MP and Sr. Spokesperson AICC addressed the media At AICC Hdqrs. today.

डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि मोदी सरकार ने संघीय ढांचे पर एक नया प्रहार किया है, अभी हाल में आपने पश्चिम बंगाल के विषय में देखा। आर्थिक रुप से जो संघीय ढांचा है, उस पर किस प्रकार से चालाकी से प्रहार किया जा रहा है, मैं उसका उदाहरण दे रहा हूं और शुरुआत करना चाहता हूं, 13 अप्रैल, 2014 के वक्तव्य से, माननीय प्रधानमंत्री जो उस वक्त मुख्यमंत्री, गुजरात थे, उन्होंने कहा था“Need of the hour is to strengthen India’s a federal structure. PM and CMs must work together as Team India” – mark the words Team India – devoted to India’s development.  तो अब ये जुमला जो है, टीम इंडिया का, उन्होंने और भी जुमले जोड़े इसके साथ, कभी-कभी इसको महाजुमला बनाया। 16 जुलाई, 2016 को उन्होंने कहा– Cooperative federalism is an article of faith for our Government. अब तक ये प्रधानमंत्री बन गए थे। Inter –State Council to be a  good opportunity to discuss a wide range of subjects. तो ये जुमला और महाजुमला जो है, इसकी सच्चाई क्या है? इसकी सच्चाई ये है कि टीम इंडिया बनाने का जो नाटक है, वो सब व्यर्थ और बेकार सिद्ध हो गया है। वास्तविकता क्या है? वास्तविकता ये है कि राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक इत्यादि अलग-अलग तौर तरीकों से स्वायत्त प्रदेशों की स्वतंत्रता पर बहुत प्रहार किए गए हैं। एक जुमला था कि हम जो प्रदेशों को फंड देंगे, उसको 32 से 42 प्रतिशत करेंगे। इस बार आंकड़े छुपाए नहीं गए हैं, पहले से प्रकाशित हैं, कई सारे आंकड़े तो छुपा दिए जाते हैं, 2014-15 में 27 प्रतिशत से धीरे-धीरे बढ़ते हुए 33 प्रतिशत हुए हैं 2017-18 तक। ये वो आंकड़े हैं जो आर्थिक पूल में आते हैं, जो केन्द्र, प्रदेशों के साथ व्यवस्थित रुप से शेयर करता है, वो 27 प्रतिशत, दशमलव something से लेकर 33 प्रतिशत दशमलव something तक पहुंच गया है, जबकि वायदा था हम इसे 32 से 42 प्रतिशत तक बनाएंगे। बाकी जो 10 प्रतिशत बचा है, उसको डस्टबिन में फेंक दिया गया है।

नंबर 2 और ये बडा रोचक प्रसंग है, कांग्रेस नहीं कह रही है, माननीय प्रधानमंत्री के आर्थिक विचार-विमर्श के लिए जो काउंसिल है, एडवाइजरी काउंसिल, पीएम इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल, उसके सदस्य श्री रतिन रॉय ने बताया है कि किस प्रकार से 2 और चालाक तरीके अपनाए गए हैं, फिजकल फेडरलिज्म को नगण्य बनाने के लिए। एक तो है कि ये पीएम इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल के सदस्य श्री रतिन रॉय ने प्रकाशित किया है, सेंट्रल स्पोंसर्ड स्कीम की संख्या 70 से 27 कर दी गई है। ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उसके अंदर जो केन्द्र का कॉन्ट्रिब्यूशन होता है, उसको 75 प्रतिशत से घटा कर 50 प्रतिशत कर दिया। तो सेंट्रल स्पोंसर्ड स्कीम की गणना, मात्रा कम कर दी गई है और हर एक स्कीम में केन्द्र का जो कॉन्ट्रिब्यूशन है, योगदान है, वो 75 से 50 प्रतिशत कर दिया है। इन दोनों को अगर जोड़ें तो प्रभाव या दुष्प्रभाव ये होता है कि जो वास्तविकता से प्रदेश के हाथ में रकम आती है, वो बहुत-बहुत कम हो जाती है।

तीसरा, एक और तौर – तरीका, जुमले भी, चालाकी भी, स्लेट ऑफ हैंड भी, टू क्लेवर बॉय हाफ जिसे कहते हैं, वो भी। तीसरा है, एक और कैटेगरी होती है, सेस और सरचार्ज की, उसमें शेयरिंग नहीं करनी पड़ती है, केन्द्र को प्रदेश की तरफ कोई योगदान नहीं देना पड़ता है। तो उस कैटेगरी में एक तरफ तो आप वहाँ 27 से 33 पर गए, 42 पर जाना था, वो बढ़ाया नहीं, क्योंकि उसको बढ़ाते तो आपको शेयर करना पड़ता। इसमें जहाँ शेयरिंग नहीं है, आपने बढ़ते-बढ़ते 3.04 ट्रिलियन रुपए, 2018-19 के फाइनेंशियल ईयर में, जो अभी समाप्त होने वाला है, उससे 3.04 ट्रिलियन रुपए इक्कठ्ठे कर लिए हैं। इसका एक पैसा आप प्रदेश को दे नहीं रहे हैं। मैं मानता हूं कि कानूनी रुप से केन्द्र सरकार बाध्य नहीं है, इसको प्रदेश को देने के लिए, लेकिन अगर आप अपनी स्वायत्ता से अपने आप दे सकते हैं। ये सेस सरचार्ज ज्यादा कहाँ से आता है, बार-बार आम आदमी के पेट्रोल, डीजल, आम चीजों पर सरचार्ज लगा-लगा कर, इक्कठ्ठा करके, अंतर्राष्ट्रीय कीमत बहुत कम है, आपने सरचार्ज लगा-लगा कर इक्कठ्ठा किया, इक्कठ्ठा करने के बाद इसको आंशिक रुप से भी आप दे नहीं रहे हैं। अभी जो अनुमान किया गया है कि जब तक ये सरकार मई में निकलेगी, तब तक ये आंकड़ा 4.4 लाख करोड़ हो जाएगा, 4.4 ट्रिलियन हो जाएगा। इसमें से एक पैसा अपने आप देने को तैयार नहीं हैं और बात करते हैं संघीय ढांचे की, कोऑपरेटिव फेडरलिज्म की, कॉम्पिटेटिव फेडरलिज्म की, टीम इंडिया की।

मैं अपनी बात करुंगा, आपको वापस याद दिलाकर कि रोजगार कहाँ हैं, jobs की जगह आपको पकौड़ा और पकौड़ा मिल रहा है। आज बड़ा रोचक जो प्रसंग हुआ वो ये था कि पिछले 5 वर्षों में  इस सरकार ने रोजगार का एक भी आंकड़ा औपचारिक रुप से प्रकाशित नहीं किया है, सरकार का कार्यकाल खत्म हो रहा है, जब सीएमआई, ने बताया आपको कि डेढ़ साल में 1.1 करोड़ रोजगार गया। तो उसका खंडन सरकार ने किया, लेकिन ये नहीं बताया कि हमारे आंकड़ों के अनुसार क्या है। जब एनएसएसओ ने अभी प्रकाशित किया तो उसका खंडन किया एक बड़े अजीबो-गरीब बहाने के आधार पर, लेकिन ये नहीं बताया कि रोजगार कितना होना चाहिए। नीति आयोग के अध्यक्ष को प्रवक्ता बना दिया है, आंकड़ों के विषय में स्पिन डॉक्टरी करने के लिए। उन्होंने कहा कि जब तक उन्हें केन्द्र सरकार से अनुमति नहीं मिलती, ये आंकड़े प्रकाशित नहीं होंगे। पूरा विश्व जानता है कि इन आंकड़ों को प्रकाशित करने के लिए अनुमति की कोई आवश्यकता नही है। तो इस प्रकार के झूठ के दौरान आज भी रोजगार का एक सिंगल मात्र आंकड़ा भी हमारे पास नहीं है। इसके अलावा न्यूट्रिशन का डेटा 2016 से विद होल्ड किया गया है, एफडीआई का डेटा 2018 के बाद से पब्लिश नहीं किया गया है, क्राईम का डेटा 2016 के बाद रिलीज नहीं किया गया है, जेल संबंधी आंकड़े आखिरी बार 2015 के बाद रिलीज नहीं किए गए हैं, कृषि के वेजिज 2015-16 वर्ष के बाद जारी नहीं किए गए। कृषक आत्महत्या पर तीन वर्ष से आंकड़े नहीं दिए गए हैं। तो ये है संक्षेप में इस सरकार की चालाकी की सच्चाई।

Sd/-

(Vineet Punia)

Secretary

Communication Deptt.

AICC

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