BJP is deliberately, consciously, intentionally undermining and sabotaging institutions

Highlights of Press Briefing                                                    15 November, 2021

Dr. Abhishek Manu Singhvi, MP & Spokesperson, AICC addressed the media at AICC Hdqrs, today.

डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि दोस्तों, जब बढ़वाना हो निदेशकों का कार्यकालतब कैसे पूछ सकेंगी एजेंसियां भाजपा से सवाल?” ये उद्देश्य है, जो कारनामे आप देख रहे हैं कल से और पहले से भी। क्योंकि, घोटालों और जुर्मों से बच खुद की नाक, भाजपा तेजी से गिरा रही है सभी संस्थाओं की साख।

The BJP is consistently, deliberately, consciously, intentionally, engaged in undermining institutions, sabotaging institutions, creating security for the establishment themselves, instead of security for the nation and the ordinances are another example in that direction. These ordinances take these institutions from discipline and upholding the rule of law to dutifulness to their political masters to discretion in choosing how to deal with equals unequally and from objectivity to subjectivity.

As you know, these ordinances give empowering provisions of 5 years or up to 5 years for extensions. I am not going to go into legalese. मैं आपसे तकनीकी बातें नहीं करने वाला हूं। मूल शब्द ऑर्डिनेंस का, अध्यादेश का महत्वपूर्ण है वो है – एक्सटेंशन, समय बढ़ाना। इसका मतलब क्या है – इसका मतलब है कि आप अपने आपके लिए कानून द्वारा अपने आप यानी सरकार, मंत्रालय, मंत्री, मोदी सरकार अपने लिए अध्यादेश द्वारा ये अधिकार क्षेत्र प्राप्त कर रही है कि जो चल रहा है, जो पदासीन व्यक्ति है, उसको हर वर्ष, प्रतिवर्ष एक वर्ष के लिए उसका कार्यकाल बढ़ा सके और एक वर्ष के बाद एक वर्ष और, जब वो वर्ष आएगा चौथा, तब उसको फिर बढ़ा सके और जब एक और पांचवा वर्ष आएगा, तब उसको फिर बढ़ा सके पांचवे वर्ष के लिए। ये अधिकार क्षेत्र दिया है इस अध्यादेश ने। इसका सीधा उद्देश्य, प्रमाण, इसका गन्तव्य, इसका जो मूल तत्व क्या है, वो है – लटकाना, झुलाना, इंतजार करना, नियंत्रण करना, कंट्रोल फ्रीक सरकार।

क्या मतलब होता है लटकाना, झुलाना, इंतजार करना, नियंत्रण करना, कंट्रोल फ्रीक सरकार का – मैं आज पदासीन व्यक्ति हूं, मुझ से जो काम चाहिए, वो करवाते रहेंगे। जो गलत, गैर कानूनी, द्वेषपूर्ण या कोई उस प्रकार का काम है, वो करवाते रहेंगे और इस सरकार के सात साल के इतिहास इससे प्रज्जवलित है ऐसे कई उदाहरणों से और अगर आपने काम पर्याप्त रुप से, सेवा पूर्वक, पूरे सही एफिशियेंसी के साथ कर डाला, तो इस अध्यादेश के जरिए आपको एक साल और मिलेगा। 3 साल नहीं, 5 साल नहीं, एक साल और मिलेगा। आप प्रोबेशन में हैं हर वर्ष अगले वर्ष के लिए और आपके अगले वर्ष का प्रोबेशन इस वर्ष के निर्धारित काम को कार्यांवित करने पर निर्भर करता है। वही काम जो आप इस द्वेष से बड़ी सरकार के अलग-अलग एजेंसियों द्वारा देख रहे हैं 7 वर्ष से।

अंग्रेजी में इसको कह सकते हैं Keeping you on a leash, watching you and giving you incremental, partial, piecemeal extensions, because that allows me to be a control freak over you, that allows me to control, because I will say, next time please watch out, your provision in coming again after one year. You better behave into everything I tell you because then only you will get an extension. मैं ये समझ सकता हूं कि आपने स्वतंत्रता और निष्पक्षता के नाम पर एक बहुत बड़ा अध्यादेश पास किया है, जिसके अंतर्गत आप 5 वर्ष का कार्यकाल, समूचा फिक्स्ड जो बदलाव नहीं कर सके कोई, वैसा कार्यकाल एक कानून द्वारा लाए हैं, जो अगले नए पदासीन व्यक्ति को दिया जाएगा। उसको कहा जा सकता है कि आप इस अध्यादेश द्वारा किसी निष्पक्षता, स्वतंत्रता, एक स्वतंत्रता के स्तंभ को बना रहे हैं, लेकिन इसका विपरीत कर रहे हैं। आप कह रहे हैं कि मैं नोर्मली आपको 2 साल के लिए फिक्स्ड नियुक्त दिया है सरकार ने। 2 साल के बाद मैं हर साल आपको 6 महीने या 1 साल की बढ़ोतरी दूंगा। एक साथ नहीं दूंगा, पहले से नहीं बताउंगा, फिक्स्ड नहीं दूंगा, आपको अपने ऊपर निर्भर करुंगा। ये आत्मनिर्भर सरकार है, हम सब जानते हैं। ये आत्मनिर्भर सरकार के स्लोगन माननीय प्रधानमंत्री स्लोगन की एक नई परिभाषा है कि मैं आपको अपने ऊपर निर्भर करुंगा और आपको अपने ऊपर निर्भर करवाकर मैं काम करवाऊंगा, वही जो मैंने कहा आपको- लटकाना, झुलाना, इंतजार करना, कंट्रोल करना।

ये चाहे आप सीबीआई के विषय में देख लीजिए, चाहे आप ईडी के विषय में देख लीजिए। अलग-अलग नई-नई चीजें हो रही हैं सीबीआई के लिए। मैंने और सोचा कि शायद इसको आप Credibility Bereft Institution (CBI) भी कह सकते हैं, अंग्रेजी में सीबीआई, Credibility Bereft Institution. ईडी के लिए भी कई शब्दों का प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन मूल बात ये है कि जब अभी उस कागज पर शायद स्याही भी सूखी नहीं होगी, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने कहा कि आप बस और नहीं। आप जो बढ़ावा देते हैं इस टर्म को, उसका अंत अब होना चाहिए। ये आपको मालूम है कि ये दो साल का और उसके बाद माननीय खंडपीठ उच्चतम न्यायालय की, जिसके अंतर्गत उन्होंने कहा कि आगे नहीं बढ़ सकता और वो कार्यकाल एक केस में 18 नवंबर को अंतर हो रहा था या 17 की रात को। दूसरे कार्यकाल में जो भी कार्यकाल था, तब अंत होता। ऐसी चीजें कहने का फायदा क्या, अगर उच्चतम न्यायालय अभी कहती या दो हप्तों बाद। उसको पूरा आप बाहर फैंकते हुए अनादर के साथ बिना उसको सुने, समझे, आत्मसात किए, उसका उल्लघंन करते हैं कानून द्वारा और कानून कब – संसद के 15 दिन पहले ।

आपको संसद की अवहेलना करनी है, आपको उच्चतम न्यायालय का बायपास करना है। आप किस संस्था को छोड़ने वाले हैं?

मैं याद दिलाना चाहता हूं, हम सब जानते हैं, आप भी जानते हैं, लेकिन संस्थापित स्मृति जगाने की आवश्यकता पड़ती है बार-बार। ये पीसमिल एक्सटेंशन, यही मूल बात थी जिसको 1997 में जैन हवाला केस में उच्चतम न्यायालय ने कड़ी निंदा की थी। कुछ पंक्तियां मैं आपको याद दिला दूं-

“[a]n in-depth consideration of the matter leaves us with no doubt that the clear legislative intent in bringing the aforesaid provisions to the statute book are for the purpose of ensuring complete insulation of the office of the Director, CBI from all kinds   of   extraneous influences, as may be, as well as for upholding the integrity and independence of the institution of the CBI as a whole.”

ये 97 का नहीं है, ये 97 के बारे में 2019 में आलोक वर्मा अस्थाना केस में लिखा गया है, लेकिन 1997 के बारे में है। बड़े सही शब्द हैं, बड़े स्पष्ट शब्द हैं, बड़े परिपक्व शब्द हैं, बड़े मजबूत शब्द हैं। मैं पूछना चाहता हूं आपके जरिए कि “purpose of ensuring complete insulation of the office of CBI from all kinds   of   extraneous influences and for upholding the integrity and independence” इससे होता है कि हर वर्ष मैं बोलूं इनको कि आपका अगला साल आ रहा है प्रमोशन का, आप बिहेव करते हैं अपने आपको, तो मैं देता हूं आपको बढ़ोतरी, एक्सटेंशन और नहीं करते हैं, तो नहीं देता हूं। ये उद्देशय परिपूर्ण होता है उससे?

दूसरा देखिए आप “The long history of evolution has shown that the institution of the CBI has been perceived to be necessarily kept away from all kinds of extraneous   influences   so   that   it   can   perform   its   role   as   the premier investigating and prosecuting agency without any fear and favour. The head of the institution has to be the role model of independence and integrity which can only be ensured by freedom from all kinds of control and interference ….” तो आप सोचिए, पहलू नंबर एक – आपने पीसमिल लटकाने, झुलाने और इंतजार कराने वाली प्रवृत्ति का इस्तेमाल किया है कानून बनाकर।

नंबर दो- आपने अध्यादेश 15 दिन पहले किया है। बड़ा स्पष्ट है संसद को बायपास करने के लिए।

नंबर तीन- आपने उच्चतम न्यायालय के स्पष्ट निर्णय को, जो कुछ ही महीनों पुराना है, उसका उल्लंघन किया है। उसको खिड़की के बाहर फैंक दिया है, उसकी अवमानना की है, उसका अनादर किया है।

नंबर चार- आपने ये किया है, सभी एजेंसी का दुरुपयोग करने के लिए, जो कि 7 साल से आपने भारत की इतिहास में लिख दिया है और अब आपने घोषित कर दिया है, आपका इरादा अगले कुछ सालों के लिए भी ये करने का और सिर्फ इसलिए कि किसी का एक दिन तारीख जा रही है, किसी का एक दिन कार्यकाल खत्म हो रहा है।

तो मैं अंत में ये कहूंगा कि इसमें जनहित क्या है, पब्लिक इंट्रस्ट क्या है? – स्वहित है, बीजेपी हित है, सरकार हित है। 5 साल तो बहाना हैसाहेब को बहुत छुपाना है, आखिर अपने दोस्तों को बचाना है और विपक्ष को भी तो दबाना है। ये 5 साल ये हैं- लटकाना, झुलाना ये हैं और अगर आपको इतना शोक था अध्यादेश पास करने का और 5 साल के स्वतंत्र, निष्पक्ष, मजबूत कार्यकाल को देने का, तो आपने बड़ा स्पष्ट एक कानून क्यों नहीं पास कर दिया कि ये टेन्योर बिना किसी इंटरफेयरेंस के, बिना किसी हस्तक्षेप के, बिना किसी के चिक-चिक के, सब व्यक्ति जो हैं और आगे आने वाले हैं, उनका 5 साल होगा फिक्स्ड। ये नहीं कहा आपने। आपने कहा हम आपको देंगे एक्सटेंशन। एक प्रकार से जैसे आप बांटते हैं फायदे, रिवोर्ड्स, फायदे। 15 दिन पहले क्यों किया – चुप्पी। उत्तर ये है कि संसद के 15 दिन पहले इसलिए किया कि हम तो हमेशा से ऐसे करते चले आ रहे हैं। 7 वर्ष में हमने सैंकड़ों बार संसद के महीने, 15 दिन पहले अध्यादेश, ऑर्डिनेंस पास किया, आप क्या कर पाए? कोर्ट ने कुछ किया? विपक्ष ने कुछ किया? हम और करेंगे। हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, हमारा संवैधानिक अधिकार है, आप तो रोक नहीं पाए इसको।

नंबर तीन – क्या आप समझते हैं कि कोई भी व्यक्ति, जिसको हर 6 महीने में बोलते हैं कि आपका प्रमोशन आने वाला है कुछ महीनों में। वो स्पष्टता, निष्पक्षता, स्वतंत्रता से काम कर सकता है? क्या ये आपको कॉमन सैंस लगता है? कोई भी हो।

नंबर चार- ये विशेष कृपा जो की है दो एजेंसियों की। उन दो एजेंसियों का ट्रैक रिकॉर्ड क्या रहा है पिछले 7 साल में। जो लॉन्ड्री मशीन है, उसमें से किसको डाल कर, निकाल कर सफेद किया जाता है और किसको दबा कर, क्रश करके काला किया जाता है और किन लॉन्ड्री मशीन के द्वारा किन एजेंसी का दुरुपयोग हुआ है, ये पूरा देश जानता है 7 साल से।

नंबर पांच – क्या पब्लिक इंट्रस्ट, क्या जनहित है?

So, friends, I think, the answers to my questions are obvious. The answers to the questions arising from ordinances just two weeks before Parliament is an attempt to sabotage, sidestep and skirt the institution of Parliament, sabotage, sidestep and skirt. The attempt is to substitute, servility and subordination to political masters in place of independence. It is to substitute subjectivity in place of objectivity. The object is to look for self security and security of the establishment, establishment here means NDA and BJP, not security of the nation.

As I have told you, the crucial word in this ordinance, is the word extension. It is not an ordinance, which may be camouflaged and may fool some of you to give a guaranteed tenure of five years, either to incumbent or to a newcomer. A guaranteed tenure of five years could and I am not conceding, but, I am just arguing, possibly be touted as a index of independence, giving you security of tenure in which you can’t be touched. This ordinance just does the opposite, make no mistake about it.

This ordinance says that I will keep you on probation, I will keep you on a tight leash, I will keep you on a master-servant relationship, I will ask you every 6 months, 9 months, look, your next extension is due next January or next March, have you behaved? Have you done his master’s voice? Have you done the master’s bidding? If you have, I may consider a extension. If you haven’t, tough luck, go home. I have the power, this act give me the power to make piecemeal, partial extensions. This is friends, the very opposite of security of tenure and independence. It is turning the concept of independence of such agencies on its head and to add an insult to injury, it is turning it on its head by a supposed act of Parliament, which goes by the name of ordinance.

Friends, It is easy to forget, but, remember that this campaign to have fixed tenures started more than 25 years ago in 1997 or 23 years ago and it is repeated not only in the Jain Hawala case in that year, but, also in the Alok Verma case in 2019. Just to refresh your institutional memory, you know how much it was emphasized to ensure complete insulation of the office of Director from all kinds of extraneous influences. “Best public interest so that the Director may function without fear and favour”, I am just quoting from the judgment, “It has to be the role model of independence and integrity …”, the note you will get will have some of these quotations. Are we anywhere doing this? Are we anywhere near this with the kind of shenanigans, which this government has unleashed? Therefore, it brings us to the 4 or 5 facets and the 4 or 5 questions, which I conclude, as I have done in the Hindi version, which I have just spoken:-

  1. On the face of it, what is the public interest possible in passing an ordinance in 15 days before Parliament? This is personal interest. This is political interest. This is self interest. It is not public interest. This is fear and therefore, fear begets fear.
  2. Have you insulted, ignored, jettisoned, decimated a Supreme Court order with just a few weeks ago said- No!, Please don’t extend and shall not be extended beyond the date of the incumbent, which in one case is 18th November? So, Supreme Court’s order with the deepest respect is not worth the paper on which it is written, in the way you have reacted to it. Is it not contumacious; is it not disrespectful, is it not completely subverting a hallowed institution of Indian democracy?
  3. Have you not undermined completely, whatever little is left of Parliamentary prestige? We know that you have been doing it for the last 7 years that is not the reason for doing it another time. We know that you think, you can act with impunity. We have done ordinances before, so we shall do it again, but, 15 days before Parliament? Are you not snooking a nose at Indian democracy and the temple of Indian democracy? Yes, you are. And all the great name from the Prime Minister downwards and keeping quiet, they are the authors, how can they speak.
  4. The agencies we are talking about in these two acts, what a glorious account they have given of themselves in the last 7 years. They have established milestones of achievements, do you think? Does the country show that faith in them? Does the country believe that these are not misused for vendetta? Has the Supreme Court not just last week said that it is alarming that there is so much crises of credibility about these institutions? Is it not true that state after state, after state, after state is withdrawing consent to institutions, which you are now decimating and undermining with these tactics?
  5. Why did you not create a statute which gives a fix tenure and played this great game of camouflage by using extension only to control, be the control freak, be the master, be the dominator?

So friends, I think, we need to show the NDA as exposed not as a National Democratic Alliance, it is an alliance of its principal component of BJP with agencies called CBI and ED, that is the alliance. It is not a political alliance. It shows the CBI amidst its many-many glittering acronyms as a Credibility Bereft Institution. A Credibility Bereft Institution, it shows that desperation, greed and fear, a dangerous cocktail of all of them is what motivates this government to act and mind you there is fear in it also, fear of self preservation, which has led to this sabotaging, sidestepping and skirting of Parliament and of all the other institution including the Supreme Court. We beseech every stake holder in this country and we also include all authorities, all members of the authorities who care for the future of India not to take this lying down.

On a question about ordinance and the Parliament session, Dr. Abhishek Manu Singhvi said- First of all, what is the meaning of the letter and the spirit of the constitution? Is the letter, and more importantly the spirit of the constitution that when Parliament is meeting next week, you pass an order in this week, is that the spirit? Of course, Parliament will meet some time. It will meet after two months, three months, four months, but, that is not the spirit.

Number two, does it not reduce Parliament to a formality?

Number three; let me reverse your question, what is so special about this man or this man, that he can’t be appointed again with the same act after two weeks? Is he the harbinger of so many secrets of yours? So, where, if you have the brute majority of numbers, which you want to misuse, you will have him back? Why did you do this in this manner, because your intent is to undermine Parliament, to show that we damn care and we don’t care, but, yes, we will do what we want, because we have done it earlier and also you have used so many subterfuges, because you have to see the entire Chal, Charitra and Chehra of this government in totality, not in one event.

You have deliberately in not one, but, many cases and matters are pending in the Supreme Court, declared a bill to be a money bill, because you believe that this Parliament, in this house, I don’t have the majority. You have used this same ordinance, innumerable times earlier. There is a concept in law and I am not saying that everything is legal, I don’t agree with this, that everything, I should make legal everything, I should go to court, but, there is a concept in law known as ‘fraud on power’.

If I use your principal then every time, 15 days or one month before the Parliament, I will pass an ordinance. Let it lapse and again pass an ordinance. As you know it happened in the Bihar case. Now, that is known as fraud on power. If I give you a power, it is intended to be used for the purpose for which is it conferred, not for ulterior circumventing notion. So, this is something too deep and too basic in terms of values for this government to understand.

On a further question, Dr Singhvi said- Look, I strongly believe that a political message and an Akrosh and Anger at the political, social, societal level must be there and must be separated, because, I don’t believe in everything being legal, invalidated, only then it is wrong, point one.

Point two; I have no doubt that this is a complete misuse of power. It is a nullification of a Supreme Court order without taking away the basis of that order and under law, you cannot nullify a order of the Supreme Court under our constitution, so it is illegal also.

Number three, it is illegal, immoral; immoral, in the sense that it is against all values of our constitution. The constitutional values are as important as the constitutional letter and spirit.

And fourth, it seriously undermines all the institutions, I have talked about, two statutory- one parliamentary, one Supreme Court.

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