Dr. Abhishek M Singhvi, RS MP & Spokesperson, AICC addressed the media via video conferencing today

ALL INDIA CONGRESS COMMITTEE
24, AKBAR ROAD, NEW DELHI
COMMUNICATION DEPARTMENT

Dr. Abhishek M Singhvi, RS MP & Spokesperson, AICC addressed the media via video conferencing today.

डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि आज की प्रेस वार्ता बहुत ही संक्षिप्त रहेगी, उसका कारण ये है कि हम 4:15 बजे, 4:30 बजे चुनाव आय़ोग भी जाएंगे, मेरे अतिरिक्त माननीय पटेल साहब, शक्ति सिंह गोहिल, रणदीप सिंह सुरजेवाला जी, सातव जी, चावड़ा जी और व्यक्ति भी जाएंगे, क्योंकि ये गुजरात से संबंध रखता है, लेकिन मैं थोड़ा इस चुनाव आयोग के अलावा और व्यापकता से 5-10 मिनट में बता दूं।
सत्तारुढ़ सरकार और सत्तारुढ़ पार्टी की हैसियत से भाजपा ने करीब-करीब हर प्रदेश में जिस प्रकार के कारनामे किए हैं, वो गणतंत्र के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है और संविधान के हर स्पिरिट के विरुद्ध है। मैं आपके समक्ष ये मुद्दा उठाना चाहता हूं कि संविधान में जो लिखा है, सिर्फ वही महत्वपूर्ण नहीं है, संविधान में जो नहीं लिखा है या संविधान की जो स्पिरिट है, अक्षर नहीं है, जो संविधान की अस्मिता है, आत्मा है, वो और भी ज्यादा जरुरी है। हम चुनाव आयोग को भी कह रहे हैं और ये एक विशेष एमएलए श्री वंश के विषय में आपको बता रहा है। इसमें सत्तारुढ़ बीजेपी द्वारा, सत्तारुढ़ गुजरात सरकार द्वारा 4-5 चीजें दर्शित होती है। इन्होंने एक तो इलेक्ट्रोल प्रोसेस, चुनाव की प्रक्रिया को भ्रष्टाचार से लिप्त कर दिया है। जहाँ भी इनको थोड़ा सा अंदेशा होता है कि हम एक किसी व्यक्ति को थोड़ा सा तोड़ कर आडंबर के आधार पर बहुमत बना लें, तो करप्ट प्रैक्टिस इनका पहला फैसेट है।
दूसरा है- जान-बूझ कर इन्हीं करप्ट प्रैक्टिस द्वारा, उससे भी ज्यादा डरा कर, धमका कर, केस करके, पुलिस लगा कर आपसे इस्तीफा करवा लें। संविधान बना था तो कभी ये नहीं सोचा था कि 100 लोगों की असेंबली में से इस्तीफा करके 90 लोगों की असेंबली बना लें। इस तरह तो आपका जो 45 का नंबर है, वो अचानक बहुमत जैसा लगता है, 100 में 45 नहीं होता है बहुमत, लेकिन 90 में हो जाता है। ये ऐसी चीजें हैं, जो संविधान की अस्मिता और प्रेरणा, उसकी आत्मा, उसकी स्पिरिट को समझ कर आती है और ये लोग जो अभी सरकार की लोलुपता में इतने व्यस्त हैं, इतने मंत्रमुग्ध हैं कि उनको कोई इसका इल्म नहीं है, ना उसके प्रति कोई जिम्मेदारी है।
तीसरा फैसेट है, नोन- लेवल प्लेईंग फील्ड, जब चुनाव आते हैं, अभी राज्यसभा की बात हो रही है, तो इस प्रकार के नोन- लेवल प्लेईंग फील्ड बनाई जाती हैं।
चौथा, 10 वें शेड्यूल, जिसको आपको 10th शेड्यूल, दल-बदल वाला शेड्यूल कहते हैं, उसका तो ऐसा मजाक उड़ाया जाता है कि मैं समझता हूं कि उसका होना, नहीं होना बराबर है।
ऐसा आपने मार्च से देखा, 8-9 एमएलए के विषय में। हमने सीधा आरोप लगाया है कि सबको प्रलोभन देकर, धमकाकर, डराकर, केस फाइल करके किया गया। उसमें से मैं एक उदाहरण दे रहा हूं जो आपकी नाक के नीचे अभी हो रहा है। आपको पता है कि गुजरात में 180 सीट में क्योंकि दो नहीं है, वो सब गणित को छोड़ दें, ये माना गया है कि 2 सीट सत्तारुढ़ बीजेपी को मिल सकती हैं, गणित और आंकड़ों के आधार पर और 2 सीट विपक्ष, जो मुख्य विपक्ष है, कांग्रेस को मिल सकती हैं, 4 कुल सीट हैं। आपको संतोष नहीं है, आप सत्ता में पागल हैं। आपको लालच है, आपको लोलुपता है, तो आप सोचते हैं कि इस 2 को 3 कैसे करेंगे। सीट 2, गणित वही है। वहाँ का गणित वही है- 72 वोट का एक वेल्यू होता है, अगर आप 72 में काउंट करें। डिटेल में जाने की आवश्यकता नहीं है, तो गुजरात में 2 आपको 2 हमारी होती हैं। लेकिन आप अगर विकृत रुप से अपना सत्ता का दुरुपयोग करके उसको 3 बनाना चाहते हैं, तो आप इसे करें।
मैंने आपको 4-5 हैड्स दिए, करप्ट प्रैक्टिस, नोन-लेवल प्लेइंग फील्ड, दल-बदल के प्रोसेस को पूरा विकृत करना इत्यादि। मैंने जो वंश की बात की, उनका पूरा नाम है- पूंजाभाई वंश । ये ऐसे 8-9 केस हो चुके हैं, मैं आपको सिर्फ उदाहरण दे रहा हूं, ये नहीं है कि हमारी सूची में बस यही है। अब आपको पता है कि राज्यसभा चुनाव तो मार्च में हो चुका होता, कोरोना के कारण ये स्थगित हो गया। जैसे ही स्थगित हुआ तो बीजेपी की एक ही सोच है कि हमें एक 3 महीने का एक विंडो मिल गया और करो खरीद-फरोख्त औऱ करो एक नंगा नाच पैसे का और करो इस प्रकार की कुरीतियों, जिनका संवैधानिक कुछ स्थल नहीं है। इन्होंने वापस शुरु किया और उसकी 19 की तारीख जानते हुए, जब वोटिंग होगी, फाइल के विषय में एक पुराने इंसिडेंट उना में, जहाँ पर शिकायत में इनका नाम भी नहीं है, ये उपस्थित भी नहीं थे, 8 जून को बुलाया गया पुलिस के सामने। खैर बहरहाल ये पहुंचे एक नागरिक की हैसियत से, law abiding citizen की हैसियत से, 6 घँटे इनको इंटोरेगेट किया गया। उसके बाद 9 तारीख के लिए एक और समन दिया। उस दिन वो फिर पेश हुए, कई घंटे रखा। आपको पता है कि चुनाव आ रहे हैं, आपको कुछ क्रियेट करना है, कुछ तंग करना है। 8 तारीख को इनको रखा गया, लगभग 11 बजे से 6:30 बजे तक, साढ़े सात घंटे। 9 तारीख को इनको लगभग 4 से 8 बजे शाम को, 4 घंटे तक रखा। अब मैं नहीं समझता कि 11-12 घँटे में कोई ऐसी चीज बच जाती है जो आप मुझसे नहीं पूछ सकते, अगर आपका उद्देश्य सीधा और सही है। उसके बाद समन जाता है 10 तारीख को कि आप 11 को वापस आईए, 11 तारीख को यानि कल, फिर वो कल जाते हैं, वो लिखते हैं चिट्ठी पहले तो कि मैं इतने 11 घंटे आ गया, मैं वरिष्ठ मैंबर हूं, मैं राज्यसभा चुनाव के बाद आना चाहता हूं। मुझे भय है कि आप अपने अधिकार का दुरुपयोग करेंगे, मुझे तारीख दे दें। वो तारीख नहीं देते हैं और एक फ्रेश समन जारी करते हैं, आज बुलाते हैं, आज 12 तारीख को 4 बजे बुलाते हैं। ये व्यक्ति पूंजाभाई वंश का कोई क्रिमिनल बैक ग्राउंड नहीं है। हार्ड क्रिमिनल को भी फौजदारी प्रक्रिया में इस प्रकार से नहीं घेरते हैं। शिकायत में इनका नाम नहीं है, वारदात पुरानी है, 8 और अभियुक्त हैं। उनके विवरण में इनका नाम नहीं आता है और ये मान लीजिए कि आप तंग करना चाहते हैं, 12 c भी आपके लिए पर्याप्त नहीं है, तो ये अचानक गतिविधि चुनाव से पहले कैसे? उनको भी उस सूची में भेजना चाहते हैं कि इस्तीफा दें दें। उनको भी उस सूची में भेजना चाहते हैं कि एक आर्टिफिशियल मैज्योरिटी बनाएंगे। उस असेंबली में जहाँ आप जानते हैं कि 2 से ज्यादा आपको मिल नहीं सकते।
ये आज की बात है- 4 बजे की। उनको ये बड़ा स्पष्ट संदेश है कि हम कांग्रेस के लोग, पार्टी के लोग, जो राजनीतिक एक्टिविस्ट हैं, ऐसी गीदड़ भभकियों से डरने वाले नहीं हैं। उल्टा डरना आपको चाहिए, क्योंकि हम इसे हर फोर्म पर उठाएंगे। ऑफिसर्स जो हैं, जो इस प्रकार के दुष्प्रभाव में आ रहे हैं कि हम हर प्रकार का मुद्दा उठाएंगे कि आपकी पॉवर का दुरुपयोग धमकियों द्वारा कर रहे हैं। चाहे वो चुनाव आय़ोग, चाहे कोर्ट कचहरी हो, इस देश में आखिर देर हैं, अंधेर नहीं है। अगर कानून की कोई भी करारी चपत लगती है, तो उन सब ऑफिसरों को भी और उन सब व्यक्तियों को भी जो इस दुष्प्रभाव में आकर गलत कुरीतियों कर रहे हैं, उनको भी ध्यान रखना चाहिए। हां, अगर कोई केस तब होता कि कल-परसों हुई है। हम कभी गए नहीं, हम लुके-छुपे भाग रहे हैं, ये पुरानी वारदात पर आपने 12 घंटे ज्यादा मुझे इंटोरेगेट कर लिया। आप लास्ट वीक में एक हफ्ते के एडजर्नमेंट नहीं देकर, वापस बुला रहे हैं, इसलिए मैं कह रहा हूं कि अगर भगवान से नहीं डरते, तो कानून से डरिए।
मैं अंत करुंगा अपनी बात आपको याद दिलाकर कि संविधान का अक्षर सिर्फ आवश्यक नहीं होता, उसकी आत्मा, जहाँ वो चुप है, संविधान का कहना और संविधान का चुप रहना बराबर है। उसके संकेतात्मक जो प्रावधान हैं, इसके लिए मैं आपको एआईसीसी के द्वारा एक सूची दूंगा। इसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा है? बड़े प्रभावशाली शब्द हैं, मैं एक– दो को कोट करुंगा, बाकी आपको सूची दे दी जाएगी। किन चीजों की बात की है, कॉन्स्टिट्यूशनल मोरैलिटी की, संविधान की आत्मा की, नैतिकता की, कॉन्स्टिट्यूशनल साइलेंस की, कॉन्स्टिट्यूशनल स्पिरिट की, बैठ कर हमारे संविधान निर्माता ये नहीं सोच सकते कि किस तरह से दुरुपयोग करें, लिखा नहीं जाता सब कुछ। 100 की असेंबली को 90 बनाना संविधान के प्रति कभी हो सकता है। उन्होंने कहा है एक मैं पुराना केस दे रहा हूं 2018 का, Constitution is not just a document in solemn form, but, a living framework for the Government exhibiting a sufficient degree of cohesion and it is working depends on the democratic spirit underlined it, being reflected in letter and spirit. आगे कहा है उसी जजमेंट में to realise the true and ultimate purpose of the constitution not only letter, but, also in spirit. उसके बाद कहा है 302 पैरा में constitutional morality fills in the constitutional silences to enhance and complete the spirit of the constitution.
अरे भाई मोरैलिटी, नैतिकता की बात को दूर, आप तो इसका विकृत एक संहार कर रहे हैं। आगे कहा है कि Constitutional morality provides a principle understanding for unfolding the work for Governance. It is a compass to hold in troubled water, it specifies norms for institution to survive and expectation of behaviour that are need, not just a text, but, the soul of the constitution. तो मैं आपको वो शब्द बता रहा हूं, 4 इसके अलावा अतिरिक्त केस हैं, उसकी सूची आपको मिलेगी। हम बड़े पुर्जोर तरीके से, मैं भी जा रहा हूं उस डेलिगेशन में, चुनाव आयोग को रखेंगे, कोर्ट कचहरी में रखेंगे और सावधान करना चाहते हैं कि अगर सत्तारुढ़ पार्टी ये समझती है कि हम आपकी गीदड- भभकियों से डरने वाले हैं या हमारे जो सोल्जर हैं, एमएलए हैं, वो डरने वाले हैं तो आप हमें जानते नहीं, हमें समझते नहीं, इस देश में लोकतांत्रिक ट्रेडिशन, विरासत को नहीं समझते।
On a question that the turn of events which have been taken place in Gujarat and not only this but, previously we have seen in other states as well, a similar modus operandi has been followed, so it just said that the 10th schedule is now redundant and it has become a mockery. So, what do you suggest is the way forward? Dr. Singhvi said- It is a very important question. You know that I know, apart from a Congressman also as a Counsel appearing in those very cases, whether it is Karnataka or Maharashtra, whether it is Jharkhand or Uttarakhand. These are all forms of the same root problem, but, you know as well I do, that you will amend the law, I as a legislator will pass the law and we will both clap. The solution is not in amending the law, it is relying on what you call your ‘vivek’. Everything can’t be said, a law cannot anticipate, how you will operate with perversity, If you are hell-bent upon with being perverse, no law can stop…so, first point, I want to explore to the press conference that you have to be- not calling yourself a dignified rulers of this country. Where are the Prime Minister’s sermons? What use is it of, his great Updeshas, his very-very biased references to principle, if he can’t control this kind of practice. Secondly, we will raise it through you in fora, because it is the name and shame, which is more important than amending the law. Thirdly of course, if we will look at the amending law, if we can, but, let me assure you that amending the law, is not going to solve the long term problem, it is the naming and shaming, exposing and telling you that ‘Chaal, Charitra aur Chehra’ has to match the spirit of the constitution.
एक प्रश्न पर कि आज दिल्ली के मुद्दे पर कोर्ट ने दिल्ली सरकार को लताड़ लगाई है, एमसीडी ने मौतों को लेकर जो आंकड़ा जारी किया, वो दिल्ली सरकार से बिल्कुल विपरीत है, इसको लेकर क्या कहेंगे? डॉ. सिंघवी ने कहा कि आपके प्रश्न का सीधा संबंध हैं, उस कंटिन्यूटी से, जो कल ही अंत हुई है 24 घंटे पहले, कल ही मैंने प्रेस वार्ता की थी। आपको याद है कि मैंने शुरु किया था एक वाक्य से कि एक दूसरे पर दोषारोपण करना, आरोप−प्रत्यारोप और बंटाधार करना उस आरोप−प्रत्यारोप और अहंकार के बीच में, ये मैंने अंग्रेजी में भी कहा था, हिंदी में भी कहा था, कल ही कहा था। ये आप जो कह रही हैं, ये उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है आज। एमसीडी कहती है कि हमारे पास पैसे नहीं हैं, हम बीजेपी कंट्रोल्ड में है, बीजेपी दूध की नहाई है, आप गलती कर रहे हैं। आप कहती है कि आप बीजेपी कंट्रोल्ड हो, आप गलती कर रहे हैं। एक कहता है कि फीगर एक्स है, एक कहता है फीगर वाई है। आपका प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है कि अगर आप जो पैरा पढ़ेंगे, जो मैंने कल कहा है उसका प्रत्यक्ष प्रमाण 24 घंटे बाद आपने गिनवा दिया है। इसमें मैं समझता हूं कि जो पूर्ण रूप से काटा जा रहा है इस चक्की के दो साइड में, वो आप जानते हैं कि कौन काट रहा है, उसका भी जिक्र किया था, लेकिन इन चीजों में हर बार, जब ऐसी कोई वारदात होती है, गुजरात में चुनाव लेकर या दिल्ली में कोरोना को लेकर, तो लोग सोचते हैं कि कुछ हो नहीं रहा है, हो रहा है। जनता में जागरुकता आ रही है, आक्रोश आ रही है, गुस्सा आ रहा है, नफरत आ रही है, इन दोनों लोगों के बीच में। मैं ज्यादा बड़ी बात नहीं करना चाहता, हमने भी 15 में से 5−7 साल एक ऐसी सरकार चलाई थी इस प्रदेश में, जिसका मेल नहीं मिलता था केन्द्र सरकार से और हमें भी कोई हिचक नहीं कहने में कि हमारा विरोध था कई चीजों पर, हमने विरोध प्रकट भी किया, लेकिन कभी हमने विरोध ऐसा प्रकट किया कि जनता जाए भाड़ में, मैं गलती आपकी निकालूं, आप मेरी निकालें और कुछ काम ना करें, बहानेबाजी करते रहें, ये तो आपने 15 साल में भी नहीं देखा।
एक अन्य प्रश्न पर कि राज्यसभा चुनावों का जहाँ तक संबंध है, क्या इस बारे में चुनाव आय़ोग को कोई आचार संहिता नहीं लगानी चाहिए? डॉ. सिंघवी ने कहा कि आप बिल्कुल सही कह रहे हैं, आचार संहिता है। जब आप संविधान को कूड़ेदान में डाल रहे हैं, आचार संहिता का क्या स्टेटस है,। क्या कहीं संविधान में आपको लगता है कि दल−बदल का 10वां शेड्यूल बना कर ये अनुमति है कि आप मुझे कुछ धमका कर, डरा कर, पैसे देकर इस्तीफा दिलवा लेंगे? संविधान में तो लिख सकते हैं, आचार संहिता बेचारी क्या करेगी? आप वजह फरमा रहे हैं, हम चुनाव आय़ोग में उठाएंगे इसे। मैंने जैसा कहा आपको कि जब आपका मन मैला है और आपने कहा है कि मैं सत्ता में हूं, मैं कुछ भी करुंगा, मुझे 2 की 3 सीट चाहिए, अगर आप ऐसा ठान लेंगे, इतने खुले नंगे रुप में, संविधान कुछ हो, सिद्धांत कुछ हो, कारण कुछ हो, मुझे ये करना है, तो फिर अंततोगत्वा मैं समझता हूं कि जनता ही समझ लेती है, इसका जवाब देती है। लेकिन ये आप आश्वस्त रहें कि हम चुनाव आयोग से एक−एक चीज उठा रहे हैं और चुनाव आयोग तक सीमित नहीं रखेंगे इसे, सबसे बड़ा फोर्म आप लोगों का है, जो कि व्यापक है, औऱ संस्थाएं हैं, हम उठाएंगे बिल्कुल।

Watch this here: https://youtu.be/51z4uqsrKQw

Sd/-
(Vineet Punia)
Secretary
Communication Deptt,
AICC

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