Dr. Abhishek Manu Singhvi, MP and Spokesperson, AICC addressed the media( In Hind ).i

डॉ. अभिषेक सिंघवी ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि आज हम आपसे दो मुद्दों पर बात करना चाहते हैं। पहला मुद्दा संबंध रखता है किसानों से , किस तरह से किसानों की सब्सिडी को हड़पने की ये प्रक्रिया की गई है और किसानों के लिए जो सब्सिडी होती है उसको हड़पने का एक नया विकास मॉडल बनाया गया है। सिर्फ सस्ती राजनीति से प्रेरित वो मॉडल है। हम आपको सिद्ध करेंगे कि गुजरात में सब्सिडी कृषकों के लिए पूरी तरह से एक चुनावी जुमला बन गया है। वास्तव में ये माननीय प्रधानमंत्री, उनकी पार्टी, सत्तारुढ़ पार्टी और प्रदेश सरकार की नियत, नीति और नैतिकता को दर्शाता है, बहुत ही घृणात्मक रुप से, बहुत ही सस्ते स्तर पर, बहुत ही निचले स्तर पर ! 

संक्षेप में मुद्दा ये है कि एक कंपनी है GSFC (Gujarat State Fertilizer & Chemicals) जो 100 प्रतिशत सरकारी कंपनी है, अगर मैं सरकारी शब्द का प्रयोग करुं तो, 38 प्रतिशत उसमें गुजरात सरकार की है और बाकि भी अलग-अलग पब्लिक सेक्टर की हिस्सेदारी है। केन्द्र सरकार इस कंपनी को सब्सिडी देती आई है, जिसका उद्देश्य होता है कि वो सब्सिडी का वितरण करे कृषकों को। अब ये सब्सिडी पहले से चलती आ रही थी, एक अमूक वर्ष 2012, मुख्य रुप से 2013 में ये सामने आया कि उस सब्सिडी का वितरण सही रुप से नहीं हो रहा है GSFC द्वारा। GSFC जो सब्सिडी कृषकों के लिए है उसका वितरण नहीं कर रही थी, उल्टा वो उसको अपने रिवेन्यू अकाउंट में डालती थी, अपने अकाउंटस को सुधारने के लिए, अच्छा दिखाने के लिए, प्रोफिट बढ़ाने के लिए window dressing कर रही थी, दुरुपयोग कर रही थी और वो सब्सिडी कृषकों को नहीं मिल रही थी। किसानों तक पूरी राहत पहुंचाने के उद्देश्य से यूपीए सरकार ने 2013 में वो सब्सिडी discontinue की और लगभग 950 करोड़ के आसपास ये आंकड़ा है, जो सब्सिडी सही रुप से वितरित नहीं हुई। उसके बारे में यूपीए सरकार के वक्त से कानूनी केस चल रहा है, बड़ा गंभीर केस है,cheating का कह लीजिए, recovery का कह लीजिए, स्टेट एंटरप्राईज द्वारा।

अब 2014 में मोदी जी की सरकार आती है, मामला जहाँ है वहीँ ठप्प रहता है, वो चल रहा है एक केस और कुछ करते नहीं है मोदी जी, कृषकों के लिए किसी रुप से कोई घड़ियाली आँसू भी नहीं बहाते हैं, इस विषय में। अचानक जब चुनाव आता है गुजरात का, तो एक बड़ा ड्रामा किया जाता है और वो ड्रामा क्या है कि हम कृषकों के लिए बहुत संबंधित हैं, बहुत ही प्रेरित हैं और बहुत ही गंभीर रुप से सोचते हैं।

इसलिए नंबर एक, जो वो केस किया था दुरुपयोग का वो out of Court settlement करते हैं।

दूसरा, settlement केस वापस ले लिया जाता है और वापस वो सब्सिडी शुरु कर देते हैं, जिसको यूपीए ने discontinue किया था, क्योंकि दुरुपयोग हुआ था, siphoning अकाउंट की window dressing हुई थी, तो हम उसको वापस शुरु करते हैं, क्यों, क्योंकि जिससे हम गुजरात की आवाम को बता सकें कि हम कृषकों के कितने हक में हैं।

तीसरा, हम ये भी सोचेंगे कि जो पुराने तीन वर्ष से सब्सिडी रुकी हुई है, उसकी कैसे भरपाई की जाए और उसको कैसे दिया जाए।

चौथा, हम दिखाएंगे कि किस प्रकार से GSFC कितनी अच्छी कंपनी है।

ये है एक कुल मिलाकर संक्षेप में। ऐसा छल, कपट और मिथ्या प्रचार, जिसको मैं आपको थोड़ा विस्तार से सिद्ध करना चाहता हूं।

इससे पता चलता है कि ये सरकार राजनीति से प्रेरित होकर कुछ भी कर सकती है। वास्तव में कोई अच्छा करना या कृषकों को खुश करने का को कोई उद्देश्य नहीं है। तीन वर्षों से चुप्पी थी, कुछ नहीं हुआ, वही GSFC थी, वही केन्द्र सरकार थी। चुनाव के वक्त ये अचानक out of Court settlement का ड्रामा हुआ। अगर आपको इतनी गंभीरता थी कृषकों के बारे में तो आप सब्सिडी और रुप से दे सकते थे, आपने सब्सिडी दी नहीं। एकदम से चुनाव से पहले आपने उसी संस्था को सब्सिडी दी, जिसके साथ आप कोर्ट केस लड़ रहे थे। केन्द्र सरकार का एक हजार करोड़, 950 करोड़ कोई छोटी रकम नहीं होती, वेस्ट करने के लिए या दुरुपयोग करने के लिए नहीं होती। लेकिन गुजरात में नंबर बढ़ाने के लिए, दिखावा करने के लिए ये चीज कही गई है और इससे आपने एक प्रकार से समर्थन किया है, उन लोगों का जिन्होंने पुराना एक बिल्कुल गलत काम, siphoning दुरुपयोग और केन्द्र द्वारा एक बहुत ही महत्वपर्ण मुद्दे पर जो रुपया आता है, उसको आपने माफ कर दिया है, उसके दुरुपयोग के विषय में आपने माफी दे दी।

मैं आपको ये भी याद दिलाना चाहता हूं कि ये पहली बार नहीं है कि जब ऐसा हुआ है। स्टेट एंटरप्राईसिज जो गुजरात के हैं, उसके साथ इस प्रकार का खिलवाड़ पहले भी हो चुका है। हमारी संस्थापित स्मृति कई बार कमजोर हो जाती है, भूल जाती है। आपको याद है कि गुजरात का विकास मॉडल 2015 में, पर विशेष रुप से 31 मार्च 2016 में CAG रिपोर्ट में जो गुजरात की ऐसेंबली में टेबल हुई, तब ये सामने आया कि जो दूसरी कंपनी है गुजरात की, GSPC (Gujrat State Petroleum Corporation) उसमें किस प्रकार से एक कैपिटलिस्ट, कॉरपोरेट दोस्तों और मित्रों का समर्थन करने के लिए लगभग 45 गैस ब्लोकस, कुल उसके पास 64 गैस ब्लौकस थे, 64 में से 45 होते हैं, 70 प्रतिशत गैस ब्लौकस GSPC द्वारा सरेंडर कर दिए गए। जिनका एस्टिमेट CAG ने लगाया 2992 करोड़ यानि लगभग तीन हजार करोड़ का और loss इस पर लगाया CAG ने, लगभग 1700 करोड़ का। ये वही गुजरात है, वही पब्लिक सेक्टर कंपनी है, वही दुरुपयोग है, जिसका इस्तेमाल आज चुनाव के नाम पर बरगलाने के लिए गुजरात के सच्चे, सरल नागरिकों को बहकाने के लिए किया जा रहा है। आज इस संदर्भ में और मैं ये भी आपको बता दूं कि आज जो केन्द्र सरकार में दिग्गज, अग्रिण पंक्ति में गुजरात से आने वाले वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट बैठे हैं, उनमें से कई GSPC और GSFC में बॉर्ड ऑफ डॉयरेक्टर थे। जितने भी गुजरात से संबंध रखने वाले जो टॉप ऑफिसर हैं यहाँ पर Secretary Government of India, वो वहाँ के डॉयरेक्टर रहे हैं।

 

तो हमारें संक्षेप में केन्द्र सरकार और गुजरात सरकार से कुछ प्रश्न हैं, विशेष रुप से GSFC के विषय में। GSPC तो पिछले वर्ष की बात है, मैंने सिर्फ आपको याद दिलाया है। 

पहला, क्या गुजरात सरकार के दौरान और केन्द्र सरकार के दौरान ये इस प्रकार से बैलेंस शीट को बढ़ाने की प्रक्रिया GSFC में परमिट कैसे हुई? क्योंकि उससे अकाउंट अच्छे दिखेंगे, रिवेन्यू बढ़ गया, हमारा प्रोफिट बढ़ गया, हम अच्छा दिखाते हैं। ये कैसे होने दिया?

दूसरा, ये अचानक तीन वर्ष बाद ये क्यों सब्सिडी वापस शुरु की, क्योंकि अगले महीने चुनाव हैं इसलिए। ये क्यों की?

तीसरा, ये out of Court settlement कैसे आ गया अचानक, केन्द्र सरकार और GSFC का झगड़ा चल रहा है, कोई छोटी-मोटी बात नहीं है, कोई दो प्राईवेट नागरिकों का झगड़ा नहीं है, तो out of Court settlement ऐसे ही होगा, क्योंकि चुनाव आ रहे हैं?

चौथा, किस आधार पर पिछले तीन वर्ष की जो रुकी हुई चीज है सब्सिडी, उसको भी देने की बात हो रही है। क्या विराम दे रहे हैं इन्हें दुरुपयोग का? आपने दुरुपयोग किया, यूपीए ने उसको रोका, केस चला, आपने out of Court settlement किया और उस दुरुपयोग का नाम दिया कि जो तीन वर्ष से जो रुका हुआ है, उसको भी देंगे हम।

ये किस प्रकार का शासन है, कु:शासन है, सुशासन है, हम जानना चाहेंगे और जहाँ तक कृषकों का सवाल है, अगर आपको उनकी मदद करनी है तो डायरेक्ट ट्राँसफर कीजिए। आधार और DBT का ढोंग रचाते हैं, प्राईवेसी के अंदर जाने के लिए। जहाँ सीधा उसका इस्तेमाल हो सकता है कि मैं केन्द्र सरकार आपको सीधी सब्सिडी दे सकती हूं, वो क्यों नहीं करते हैं, क्यों, क्योंकि गुजरात के चुनाव में बरगलाने और बहकाने की प्रक्रिया अग्रणी उद्देश्य है।

दूसरा मुद्दा है, GST के विषय में है। जैसा कि आप जानते हैं कि गब्बर सिंह टैक्स का जो विकृत रुप दिखाया आपको, उसके बारे में वो जो कहावत है, वो कर रही है ये सरकार। एक अच्छी चीज को विकृत कैसे करना, एक मूल, अच्छे स्वरुप को विकृत और खराब करना कैसे, ये इस सरकार से सीखना चाहिए और वो जो कहावत है, पहले आदमी को सोचना चाहिए, फिर निशाना लगाना चाहिए और फिर शूट करना चाहिए। माननीय प्रधानमंत्री और उनकी सरकार चाहे नोटबंदी हो, चाहे GST हो, पहले शूट करते हैं, बाद में निशाना लगाते हैं और अंत में सोचते हैं। वही GST में हो रहा है। तो GST में आज, आपको बार-बार बरगलाआ जाता है ये कहकर कि अरे कई प्रदेश सरकारों नें तो कुछ आपत्ति नहीं उठाई, कोई विरोध नहीं किया, सबकी सहमति है। अरे भाई किसकी सहमति है। हमारे पास सैंकडों पत्र हैं, मैं सिर्फ कांग्रेस प्रदेश की बात नहीं कर रहा हूं, कांग्रेस प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों और वित्त मंत्रियों की और नोन-कांग्रेस प्रदेशों के पत्र हैं हमारे पास, जो हम आपको देंगे।

कितनी बार हमने उठाया है और उसके तो दसों विरोध हैं। मैं आपको पाँच-छह मुख्य मुद्दों के विरोध, जो आज, अभी और इस मंच से भी उठाए गए हैं। लिखित उठाए गए हैं, कांग्रेस सरकार द्वारा ही नहीं औरों के द्वारा भी। तो आप बहकाईए नहीं। पहला कि आप बार-बार कहते हैं One Nation – One Tax,  ना इस पर One Nation का तत्व है और ना  One Tax का है। सात टैक्स तो अभी गिन लिए हैं हमने। अब आठवाँ, नौंवा आना बाकी बचा है। दूसरा One nation One tax कहाँ से हुआ, अगर 40 से 45 प्रतिशत भारत देश इस टैक्स से बाहर है। तो ये One nation One tax कहाँ से हुआ। आप जानते हैं पैट्रोलियम, शराब, रियल ईस्टेट इत्यादि-इत्यादि। तीसरा, आप कृषि के क्षेत्र में, ट्रैक्टरों और कई औजारों को, मैं डिटेल में नहीं जाना चाहता, 12 प्रतिशत पर टैक्स कर रहे हैं, टॉयर, ट्यूब, ट्राँसमिशन पार्ट इत्यादि। मैं सिर्फ कृषि के विषय में बोल रहा हूं। ट्रैक्टर,टॉयर, ट्यूब एक कैटेगरी और कोल्ड स्टोरेज, फूड ग्रेन की जो हैंडलिंग के जो ट्राँसमिशन सिस्टम होते हैं, उसमें 18 प्रतिशत। तो हम मांग बता रहे हैं, जो लिखित रुप से मांगी गई हैं। जिसमें आपको बहकाया जाता है कि सब सहमति है। 18 और 12 प्रतिशत GST कैसे रख सकते हैं आप?

तीसरा पूरे आईटी इन्फ्रास्ट्रक्टर का ऑवर ऑल, आप शायद भूल गए हैं हमने शुरु में कहा था कि आपको करना ही आपको तो जल्दबाजी मत कीजिए। पॉयलटे प्रोजेक्ट कीजिए तीन-चार जगहों पर और आईटी को स्टेबिलाईजड होने दीजिए, वही आपने किया shoot, aim and then think, तो इसलिए ये समस्या आ रही है।

नंबर चार, जो बहुत चिंताजनक विषय है कि इरादा ये था, उद्देश्य ये था और जल्दबाजी भी इस आधार पर की गई कि मुश्किल से 4-5 प्रदेशों नहीं तो 7 प्रदेशों में आपको compensation देना पड़ेगा, क्योंकि वहाँ पर कुछ गिरावट हो गई टैक्स कलेक्शन की, क्योंकि केन्द्र सरकार ने कई वायदे किए थे। आज हालत ये हो गई है 31 प्रदेशों में से 4-5 को छोड़कर सब लोग compensation मांग रहे हैं, क्योंकि सबमें गिरावट हो रही है। क्योंकि आपने सोचा नहीं, पहले रेशलाईजेशन करना होता है, ये नहीं कि आप जैसे चल रही है गाड़ी तभी उसका पहिया, स्पीड़, पेंटिग और कौच भी बदलिए। तो जहाँ तक ये था कि 5-7 प्रदेश मांगेगे compensation. वहाँ केवल 5-7 प्रदेश नहीं मांग रहे हैं। तो ये रुपया कहाँ से आएगा, कैसे compensation करेंगे और इस विकृत ढांचे में आप ज्यादा समस्या में नहीं पड़ जाएंगे और सबसे महत्वपूर्ण है कि जो आपको बताया गया है कि एक उदाहरण है कि आप एक चीज को 5 प्रतिशत में करते हैं, एक को चीज को 12 प्रतिशत में करते हैं, कपास को या जो छाटा कारीगर है उसकी चीज को और जो फाईनल प्रोडेक्ट है उसको 5 प्रतिशत पर करते हैं। अगर आप रायमेंड के सूट लेंगे तो आप पर 5 प्रतिशत लगेगा। अगर आप खुद बनवाएंगे तो 12 प्रतिशत लगेगा।

ये कौन सा न्याय है, संतुलन है? मेरे पास बहुत उदाहरण हैं। मनप्रीत बादल जी पंजाब से हैं, कर्नाटक के मंत्री, नॉन कांग्रेस सबने लिख कर दिया है। लेकिन जिद्द की सरकार जो है, अहंकार की सरकार जो है, आम आदमी के विरुद्ध सरकार है, हमारा तुगलकी फरमान है, हम गब्बर सिंह टैक्स लगाएंगे, हम नहीं सुनेंगे, इसका कोई इलाज नहीं है।

भाजपा सांसद यशवंत सिन्हा द्वारा अरुण जेटली को वित्त मंत्रालय से हटाए जाने के बारे में दिए बयान के संबंध में एक प्रश्न के उत्तर में डॉ.सिंघवी ने कहा कि ये प्रश्न तो आपको भाजपा से पूछना चाहिए, जब बीजेपी के इतने दिग्गज नेता कह रहे हैं तो हमारी बात तो कोई नहीं सुने, उनकी बात तो सुननी ही चाहिए सरकार को। दूसरा पक्ष ये है कि क्या सिर्फ इसमें एक ही व्यक्ति जिम्मेवार है या साथ-साथ एक दो व्यक्ति को ओर हटाना चाहिए। तीसरा पहलू, और उसके ऊपर जाएं तो और भी व्यक्ति हैं, क्या हटाने वाले? निश्चित रुप से बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। आपको इसका उत्तर तो बीजेपी की प्रैस कॉन्फ्रेस में ही पूछना चाहिए।

एक अन्य प्रश्न पर कि गुजरात चुनाव के चलते शीतकालिन सत्र को आगे बढ़ाया गया है, क्या ये राष्ट्रहित के लिए सही है, डॉ. सिंघवी ने कहा कि इसके सभी आयाम शायद पूरी तरह से समझे नहीं है। 2017 पहला वो वर्ष नहीं है, जब कोई प्रादेशिक चुनाव हो रहा है। हर वर्ष इस देश में, गणतंत्र, लोकतंत्र का ये मंदिर है, कई चुनाव होते हैं प्रादेशिक और कभी-कभी केन्द्र वाले। पहला, अगर आपने ये सिद्धांत बना दिया कि गुजरात सर्वोपरी है इस सरकार के लिए, किसी कारण से, तो अगले वर्ष आप कैसे रखेंगे संसदीय सत्र बजट वाला या मौनसून सत्र? दूसरा, आप क्या विचार विमर्श महत्वपूर्ण मुद्दों में अनदेखा करना चाहते हैं, भय के कारण? उदाहरण के तौर पर जयके मुद्दों पर, उदाहरण के तौर पर शूरवीर शौर्यके मुद्दों पर? तीसरा, आपने कौन-सी सर्वदलीय सहमति प्रकट करवाई इस मुद्दे पर, किससे पूछा? चौथा, ये सरकार के अहंकार को दर्शाता है। पाँचवा, ये लोजिस्टिस्क कैसे, क्या आप नाम के लिए 15 दिसंबर के बाद कोई सत्र करवाएंगे, 4 दिन के लिए या एक जनवरी तक सत्र करते रहेंगे? ये आप ऐसा उदाहरण पेश कर रहे हैं कि हर बार किसी भी प्रदेश द्वारा ये मांग हो सकती है। मैं समझता हूं कि गणतंत्र की जडें, सिद्धांत और जो स्तंभ हैं, उनमें ध्यान और परिपक्वता होनी चाहिए। ये नहीं होना चाहिए कि हर चीज को चुनाव के नजरिए से ही देखा जाए।

एक अन्य प्रश्न पर कि बाबा रामदेव ने कहा है कि 99.9 प्रतिशत राजनेता भ्रष्टाचारी होते हैं, डॉ.सिंघवी ने कहा कि चलो अच्छा है, नहीं तो मैंने सुना है कि वो एक पूरा हिस्सा 50 प्रतिशत या 40 प्रतिशत बाहर रखते हैं, अपने कमेंट से, इस बार आप कह रहे हैं कि जोड़ लिया है अपने कमेंट में।

लगातार हो रहे गुजरात सर्वे में कांग्रेस को मिल रही बढ़त और वोट प्रतिशत में जबरदस्त उभार के बारे में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में डॉ. सिंघवी ने कहा कि मैं आंकड़ों की बात नहीं करुंगा। आपको प्रत्यक्ष प्रमाण मिलने वाला है 3-4 हफ्ते के बाद कि चौंकाने वाले, बीजेपी को असमंजस में डालने वाले, घबराने वाले और दूरगामी परिणाम आने वाले हैं। आप कितनी सारी चीजों की बात हमने की, आप देख रहे हैं उसी भय के कारण। उसी के एक उदाहरण की आपने चर्चा की, संसद के सत्र की, विलंब से बैठने की, दूसरा आपने GSFC वाला, तो ये सब प्रादुर्भाव हैं, उसी भय का।

इसी संदर्भ में डॉ. सिंघवी ने कहा कि मैं ये कहना चाहूंगा कि मैं किसी सर्वे के बारे में नहीं कहना चाहता, ना किसी टेक्नीक के बारे में। हमने कभी जो बहुचर्चित सर्वे, कहीं कहीं बिंदुओं पर ज्यादा आते हैं, हमने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। जिस सर्वे पर हम ध्यान देते हैं वो हमारा खुद का आंतरिक होता है। हम उस पर मजबूत हैं। हम ना भयभीत हैं ऐसी चर्चा द्वारा। आपने दिखाया है कि जो 30 प्रतिशत का अंतर 6 प्रतिशत रह गया है, लेकिन मैं वहाँ नहीं जाना चाहूंगा। हम ना 30 प्रतिशत कम पर थे और ना ही 6 प्रतिशत कम पर थे। हमें ये अंदर से मालूम है कि गुजरात में एक बहुत जबरदस्त आक्रोश सत्तारुढ़ प्रादेशिक सरकार के खिलाफ है, केन्द्र सरकार के खिलाफ है। जुमलेबाजी का Law of diminishing returns लगभग 6 महीने पहले से चल रहा है। इसलिए मैंने कहा कि चौंकाने वाले, घबराने वाले, ड़राने वाले परिणाम आने वाले हैं, बीजेपी के लिए।

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