Dr. Abhishek Manu Singhvi, MP, Spokesperson AICC addressed the media today at AICC Hdqrs.

Highlights of Press Briefing                                                              23 January, 2020

 

डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि मैं महान व्यक्तित्व सुभाष चंद्र बोस की जन्मतिथि पर उनका स्मरण करके अपनी बात शुरु करुंगा। वे देश के एक बहुत बडे महानायक रहे हैं। आज हम बात कर रहे हैं सिर्फ उस रिपोर्ट की नहीं जो आप सबने अखबार में पढ़ी हैडेमोक्रेसी इंडेक्स। समझ लीजिए कि हमें एक संकेतात्मक रुप से सूचना हैउसके आधार पर हम बात नहीं कर रहे हैं। मेरा मानना हैहमारी पार्टी का मानना हैआप में से कई लोगों का मानना है कि भारत देश एक बहुत गौरवशाली गणतंत्र हैदुनिया का सबसे व्यापक और बड़ा गणतंत्र नहींलेकिन अत्यंत गौरवशाली है। इसका सबसे सरल और महत्वपूर्ण कारण है कि 1930 और 60 के बीच में जो साम्राज्यवाद सामंतवाद– उपनिवेशवाद के चंगुल से 30-40 देश निकलेकोई ब्रिटेन के साम्राज्यवाद केकोई हॉलैंड केकोई फ्रांस केकोई बेल्जियम केउनमें भारत अनूठा एक देश हैजो एक गौरवशालीमजबूत गणतंत्र बचा है। बाकी साम्राज्यवाद से जितने निकलेउन सबमें मैं नहीं समझता कि एक भी गिना सकते हैंजो लोकतंत्रगणतंत्र सही रुप सेसही मायने सेवास्तविक रुप से रहा है। उसका उदाहरण हमारे आस-पास से भी देखते हैंहमारे पड़ोसियों के बीच से भीउसका उदाहरण आप दूर-दूर तक  भी देख सकते हैंआस्ट्रेलिया से लेकरसाउथ अमेरिका से लेकरतो इस संदर्भ में हमेशा बुरा लगता हैदुख होता हैवेदना होती है।

 

पहली बात तो जब आप एक डेमोक्रेसी इंडेक्स जैसे इंडेक्स में 10 सूची गिर जाते हैं। ये स्वाभाविक है और हर गौरवशाली भारतीय को, जिसे अपने लोकतंत्र में गौरव है, ये देखकर दुख और वेदना होनी चाहिए, राजनीति परे रखने के बावजूद होनी चाहिए। ये इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट का सर्वे है, जो विश्व भर में सुप्रसिद्ध है ऑब्जेक्टिविटी के लिए, गहराई और व्यापकता के लिए। आप जानते हैं आकंड़े, उनको सिर्फ सूचना के लिए दोहरा रहा हूं कि 7.23 से लगभग 6.9 हो गए हैं और 41 नंबर से 51 नंबर हो गए हैं। हां, हम खुश जरुर हो सकते हैं क्योंकि बांग्लादेश 80 है, पाकिस्तान 108 है, चीन 153 है, लेकिन हम 10 गिरे हैं। जो एक महत्वपूर्ण बात है, जो आपको मालूम ना हो, ये इंडेक्स शुरु हुआ 2006 में और 2006 से आज का जो आंकड़ा है 51 नंबर का, वो भारत के लिए न्यूनतम है। 2006 के बाद 51 नंबर के पर कभी नहीं दिखा भारत।

अब मैं ज्यादा व्यापक बात करना चाहता हूं, जो सिर्फ इस डेमोक्रेसी इंडेक्स से संबंधित नहीं है, वो ये है कि एक प्रकार से डेमोक्रेसी इंडेक्स कुछ मापदंडों पर, कुछ पत्थरों पर, कुछ कसौटियों पर ये अवलोकन करता है। लेकिन हम पूछना चाहते हैं कि क्या 2014 के बाद से इस देश में लोकतंत्र कम हुआ है कि नहीं और मैं किसी त्रुटी के हिसाब से नहीं कह रहा हूं, मैं ये प्रश्न एक सकारात्मक Criticism के हिसाब से पूछ रहा हूं। डिमिनिशिंग डेमोक्रेसी (diminishing-democracy) पोस्ट 2014 और इसके लिए क्या हमें डेमोक्रेसी इंडेक्स की आवश्यकता है?

क्या अगर मैं आपको 4 कसौटियां या मापदंड दूं तो क्या आप नहीं समझते कि इन चारों में बहुत सीधा, साफ नापतोल कर सकें, वैसे गिरावट है। डीआई को छोड़ दीजिए तब भी। पहला है – भय। क्या इस कसौटी में परिवर्तन है 2014 के बाद? मैं नहीं समझता कि अपने हृदय पर हाथ रखकर आप ‘न’ कह सकते हैं। भय का स्तोत्र राजनीतिक हो, राजनीतिक प्रतिशोध हो, सरकारी एजेसियों का दुरुपयोग हो, उदाहरण आपके पास बहुत सारे हैं। हमने इस मंच से कई दिए हैं। लेकिन सच्चाई है कि इस मापदंड पर किसी थर्मामीटर को डालने की जरुरत नहीं है। भय इस देश में बढ़ा है। I think that is diminishing Democracy just by itself.

दूसरा, असहिष्णुता। उसको इनटोलरेंस कहें या अकोमोडेशन कहें, लेकिन अपने एक रंग में हर आदमी को रंग देना, ये असहिष्णुता जो है, ये बढ़ी है या कम हुई है? डेमोक्रेसी इंडेक्स इसको नापें या ना नापें, असहिष्णुता के अलग-अलग उदाहरण आप हर दिन देखते हैँ। चाहे वो 144 को लागू करने की बात से हो या इतने बड़े पैमाने पर विद्यार्थियों के विषयों में हो, लेकिन ये एक दूसरी महत्वपूर्ण कसौटी है, Which diminishes Democracy or is diminishing Democracy.

तीसरा है – द्वेष और प्रतिशोध की भावना। सीधा है, सिर्फ विपक्ष के प्रति नहीं, आपकी पार्टी के अंदर भी। सत्तारुढ़ पार्टी में या विपक्ष में द्वेष और प्रतिशोध जो इस देश की संस्कृति कभी नहीं रही, मैं हमेशा कहता हूं कि हमारे पड़ोसी बांग्लादेश में दोनों महिलाएं उनके सेंट्रल हाल में इतनी आसानी से नहीं बैठ सकती और गपशप नहीं कर सकती हैं और ना ही माननीय ज़िया-उल-हक़ जी और माननीय नवाज शरीफ जी पाकिस्तान के सेंट्रल हाल में कर सकते थे। जो हमारे देश की प्रथा रही है और जो किया है कभी वाजपेयी जी ने, कभी राजीव गांधी जी ने, कभी इंदिरा गांधी जी ने, कभी सोनिया गांधी जी ने। ये भी द्वेष और प्रतिशोध, हां कुछ प्रदेशों में हमारे देश में शुरु हो गया था, उनके नाम आप जानते हैं। लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर, केन्द्र के स्तर पर ये मापदंड जो कम होते हुए या लोकतंत्र को कम करने वाला डिमिनिशिंग डेमोक्रेसी का मापदंड नहीं था, इस पैमाने में, इस व्यापकता में, इस शक्तिशाली रुप में जो आप अब देखते हैं।

आखिरी – सामाजिक सांस्कृतिक, धार्मिक एकरुपता। सबकुछ यूनिफार्म होना चाहिए। आप जो बोलते हैं और मैं जो बोलता हूं, आप जो खाते हैं और ये जो खाते हैं, आप जो पहनते हैं और वो जो पहनते हैं, आप जो दर्शाते हैं और मैं जो दर्शाता हूं, ये सब ऐसे मापदंड हैं जो सिर्फ डेमोक्रेसी इंडेक्स तक ही सीमित नहीं है, यद्यपि डेमोक्रेसी इंडेक्स एक महत्वपूर्ण इंडेक्स है और अगर इस पृष्ठ को देखें, व्यापकता से देखें और व्यापक रुप से देखें तो ये बड़ा सीधा संदेश भेजता है।

 Dr. Singhvi said – that we are diminishing democracy in possibly the world’s proudest democracy, certainly the world’s largest democracy, certainly something of which each Indian is terribly-terribly proud. I give the example that you ask a simple question and it is one of the simplest questions which I asked audiences sometimes when I start speaking and there is no real satisfactory answer that of the 30 to 60 countries which emerged from the yoke of Imperialism between the 1930s and the 1960s – somebody from UK, somebody from Belgium, somebody from France, somebody from Holland.     Of these 30-60 countries, I can’t think of a single country which has remained a vibrant, diversed democracy as India is and certainly no one of the size and the complexity of India. And those rex and ruins of constitutionalism litter the landscape of South America, of Africa, of Australasia, of West Asia, of South East Asia – the so-called economic tiger. Democracy has been vibrant, alive and kicking in a big measure only in India.

It is in this context that it is but natural without doubt that every proud Indian will feel hurt and pained deeply when he finds that in a Democracy Index computed by a well-known renowned and a very objectively known entity called the Economist and the Economist Intelligence Unit. In that we have declined 10 straight points – from the 41st nation, we have become the 51st but that is only a very small part of the story. Of course, we can pat ourselves with self-congratulatory pats on our back and we can make sophisticated arguments and feel happy that Bangladesh is at 80 or Pakistan is at 108 or China is at 153. That is not the point at all. The democracy index India should be rising because you are one of those few countries who have solid democracy in this country and secondly it is the first time since 2006 when we have declined to this figure. Since the index started in 2006, it has never been as low as 51 for India. But I am not at all concerned only with the democracy index although that is a peg to remind you of the story because it was                     published yesterday and today. The story is much wider and that is to ask you to put your hands on your heart – I don’t mean you literally – but I mean the public of India through you. Can anyone say that on the four standards simple basic parameters and this is going beyond democracy index. We have improved or become worse. Take for example to this parameter fear – is there not palpable fear in this country whether within the ruling party or outside the ruling party, whether it is because of misuse of governmental power and agencies or of snooping and surveillance but is there a? I don’t think we need a thermometer to measure that. We all understand and we all know it. Well, that diminishes democracy. This DD factor is what we are talking about – Diminishing Democracy.

The second milestone criterion is obviously ‘intolerance’ or ‘accommodation as you might want to call it. Whether you see it manifested in students’ episodes or you see it manifested in pre-emptive invocation of Article 144 so that you pre-emptively prevent the beginning of assembly which you later on call an unlawful assembly. But everybody must be painted in my colour. What is my colour will be your colour. That is not the culture of India.

The third factor of Diminishing Democracy is a palpable increase in vendetta in a feeling of getting even settling the scores. This is completely anti-thetical to the Idea of India and happily in our political culture unlike our South East Asian neighbours, unlike our immediate South Asian neighbours, unlike most of Asia and Africa, we have never had this vendetta politics. I concede, we had it beginning in one or two States. I concede it, as you all know it in one State in South India, you know one in East, may be one in North. But in this national level politics, it has never been a factor, as before never since 2014.

And the last of these Diminishing Democracy criteria would be this feeling that what is uniform is right. That everything should be uniform and I am not talking of one factor. Culture should be uniform, languages, thought, habit, dress, food, smells, sounds and thinking – all should be uniform. We should be one grand monolithic uniform nation which is again obviously anti-thetical to the diversity of India. Lynchings and impositions are only examples, they are manifestation but the route approaches uniformity as it ended itself.

Friends, I conclude by saying this is a red-flag which should remind us every minute of our existence that Diminishing Democracy is what we have to be eternally vigilant against.  This is our proud heritage, it is our proudest possession. We can’t allow it to dilute or diminish even by one mm.

डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत की गिरती पोजीशन से संबंधित एक प्रश्न के उत्तर में डॉ. सिंघवी ने कहा कि फिगर्स तो अब छप रहे हैं कुछ हद तक, ऊपर नीचे हुआ है, लेकिन दो  चीजें स्पष्ट हैं, एक वर्ष में 10 स्थान कभी नहीं गिरा भारत।

एनआरसी से संबंधित एक अन्य प्रश्न के उत्तर में डॉ. सिंघवी ने कहा कि मैंने ही दो-तीन दिन पहले ही उत्तर दिया है, तो मैं उत्तर को दोहराना नहीं चाहता, दोहराव से बदलाव आता है, दोहराव से बदलाव को आप ज्यादा विकृत करेंगी, तो जवाब वही है, मैं संक्षेप में आपको याद दिला दूँ कि इसका सही सिद्धांत अब मैं अपने शब्दों में कह रहा हूँ, मैं किसी व्यक्ति या शब्दों पर टिप्पणी नहीं कर रहा हूँ, न मैं किसी और की बात के ऊपर अपनी बात बता रहा हूँ, इसलिए मैंने उस दिन जो कहा था, इससे भी सरल बात कही थी कि अगर अमुक प्रदेश में या अमुक प्रदेशों ने याचिकाएं डाली हैं उच्चतम न्यायालय में, या डाल रहे हैं, वो प्रोसेस आपकी नाक के नीचे चल रहा है, या निकट भविष्य में अगले हफ्ते डालने वाले हैं, कल हम पेश हुए थे, तो 140 हैं, कल टिप्पणी हुई थी, शायद 10-12 और  आ जाएंगी। कल की बात है, तो जो प्रदेश और विशेष रुप से मैं उदाहरण दूँगा आपको कि प्रादेशिक याचिका एक निजी या इंडिविजुअल याजिका जैसी नहीं होती, उसमें एक महत्वपूर्ण फर्क ये होता है कि वे संविधान की धारा 131 के अंदर आती है, जो एक विशेष प्रावधान है, जो आपके और मेरे लिए नहीं बना, तो जब ऐसी याचिकाएं, प्रदेश डाल रहे हैं, कई ने डाल दी और कई डालने वाले हैं, तो मैं नहीं समझता कि बिल्कुल गैर लाजमी है, उनके लिए कहना कि जब हमने ये याचिका डाली है, हम आशा और विश्वास करते हैं कि महीने-दो महीने में इसका निर्णय होगा, इधर होगा, या उधर होगा, जो निर्णय आएगा उस पर हम नतमस्तक होंगे। जब तक वो निर्णय नहीं आता है, आप हम पर इसको क्यों लागू कर रहे हैं, हम क्यों इसको कार्यान्वित करें, लागू तो हो गया है,  हम कार्यान्वित कयों करें। तो ये कोई बहुत सहज बात है, इसमें गलत क्या है? इसको बगावत कहना, इसको ये कहना कि मैं बागी हो गया हूँ, ये तो जानबूझ कर सरकार और सत्तारूढ के एलिमेंट्स कह रहे हैं।

On another question about the alleged statement of Dr. Shashi Tharoor related to CAA, Dr. Singhvi said- I have already said so from this podium hardly 3-4 days ago. I am repeating it for your convenience without going into all the details. I stand by every word which I said and I think, it needs only one facet needs repetition. I found absolutely no contradiction, nothing wrong in the states during what they are doing, for a simple reason that the real nub of the new answer has not been appreciated. The nub of the new answer is simply this when there are multiple states some who have already filed petitions; some who are actively in the process of filing as we speak and some will be filing in the next few days.

When these are petitions filed challenging all aspects of the validity of the CAA and its related initiatives and remember that these petitions are filed under the specifically created constitutional provision called article 131, which is not available to you and me then I find nothing wrong in a state saying look I have filed/filing a challenge till such time as maximum one month, two month, three months it say, the Apex Court will decide the challenge this way or that way. I don’t intend operationalising something which I have challenged. That’s about it now, to mischaracterize this, as the Government is desperately trying to do as a constitutional rebellion, to mischaracterize it as a revolt possibly as an excuse to impose 356, is bizarre.

डॉ. सिंघवी द्वारा किए गए एक ट्वीट के संदर्भ में पूछे एक अन्य प्रश्न के उत्तर में डॉ. सिंघवी ने कहा  ये जाहिर है कि जहाँ आप बगावत का बिगुल बजाते हैं, कांग्रेस का एक रोम भी उसका समर्थन नहीं कर सकता। इसकी कट्टर से कट्टर भर्त्सना और निंदा होनी चाहिए लेकिन उसका मतलब अगर ये है कि आप एक पीसफुल प्रोटैस्ट का गला दबाकर घोंटना चाहते हैं, तो वो बिल्कुल गलत होगा। अब सच्चाई कहाँ है, वो इंडिविजुअल अमुक केस पर निर्भर करती है। मैं अगर संविधान की परिधि के बाहर कोई ऐसा नारा लगाता हूँ, मैं नहीं समझता कि जो आप दसवा उदाहरण देखते हैं, जो भी लोग संविधान की दूहाई दे रहे हैं, और संविधान की प्रस्तावना की बात कर रहे हैं, वहाँ आप आजादी की बात करें और इस प्रकार की मिसकरैक्टराईजेशन करें कि मैं बगावत कर रहा हूँ, तो ये तो हम सब समझते हैं कि ये कितनी राजनीति है, कितना बरगलाने की प्रक्रिया है, कितना बहकाने की प्रक्रिया है।

आरबीआई के द्वारा दी गई केवाईसी डायरेक्शन्स के लिए एनपीआर के प्रयोग तथा क्या सरकार एनपीआर पर असमंजस की स्थिति को लेकर पूछे एक अन्य प्रश्न के उत्तर में डॉ. सिंघवी ने कहा कि इसके सिर्फ जो आपका प्रश्न हैं, उसके पहलू जरा थोड़ा और व्यापक हैं, मैं सब बता दूँगा आपको।

  1. ये दिमाग से हटा लें,कोई आपको बरगलाता है, मूर्ख बनाता है, कहकर की एनपीआर ये हैं, एनआरसी ये है, सीएए ये है। ये सब एक ही चीज हैं। ये एक पैकेज की तरह आता है, इसका उद्देश्य आज की तारीख में यही हैं। हां,संवैधानिक रुप से, एतिहासिक रुप से, टैक्स्ट रूप से अलग-अलग चीजें हैं। लेकिन आज उनका एक बहुत जबरदस्त, भयानक मिश्रण है।
  2. आपके प्रश्नों के पास आने से पहले याद दिला दूँ मैं आपको कि ये विचित्र बात है कि जो चीज ऑप्शनल है,जिसकी कोई आवश्यकता नहीं है, जो जावड़ेकर जी खुद मानते हैं कि वो ऑप्शनल है, उसको लिखते क्यों हैं आप? क्या आपके फॉर्म में ऐसे सैंकड़ो प्रश्न आते हैं, जो ऑप्शनल होते हैं और ऑप्शनल का मतलब कि ये तो भर देंगे, ये नहीं भरेंगे।

ऑप्शनल का मतलब ये नहीं कि आप अगर कुछ क्षेत्रों में चाहें तो भरे न भरें, ऑप्शनल यानि कि कुछ भरें, कुछ न भरें, हम जो नहीं भरेंगे, उनको नहीं काउंट करेंगे। अगर ये उद्देश्य है तो आवश्यकता क्या है, इसके होने की, जो कि एक मंत्री महोदय ने याद दिलाया जावड़ेकर जी को।

देखिए जब टिकिंग होती है या सूचियाँ बनती हैं, तो ऑप्शनल आइटम्स के आधार पर भी आपको डाउटफुल करार किया जा सकता है। कम से कम ये तो लिख सकते हैं, इन्होंने भरा नहीं ये तो शायद ये डाउटफुल हैं, क्योंकि इनके पिता जी, इनके परिवार की तारीख रहने की सूचना नहीं है। ये हुई दूसरी बात।

  1. कितनी बार पहले और क्यों,आरबीआई को एनपीआर की आवश्यकता हुई है मैं जानना चाहूँगा आपके प्रश्न के जरिए सरकार से। ये तो मुझे विचित्र लगता है, ऑफिशियली वैलिड डॉक्यूमेंट आरबीआई के विषय में आधार से होते हुए वोटर आइडेंटिटी कार्ड से होते हुए letter issued by National Population Register containing details of names and addresses. इसमें आपको विचित्र नहीं लगता है! उसके अंदर भी कुछ ऑप्शनल, कुछ नॉन ऑप्शनल?

देखिए, सच्ची बात ये है कि जब वातावरण भय का होता है, जब वातावरण अविश्वास का होता है, when the trust deficit is humongous आप सही भी अगर करने का प्रयत्न कर रहे हैं तो गलत लगेगा, सही गलत लगना चाहिए क्योंकि आपने इतना बड़ा अविश्वास का एक पैमाना खड़ा कर दिया है।

It is not people, who should be afraid of the Government, Government should be afraid of the people. Today people are very scared of the Government and when you have such rules that fear increase 10 times each minute.  The death of the democracy is not an assassination from ambush. The death of democracy is slow extinction from apathy, from indifference, from under nourishment.  Our Hon’ble Home Minister said what yesterday “कुछ भी कर लो, हम तो सीएए तो करेंगे ही”, that is known as apathy, indifference and under nourishment. We will not listen to you, we are the Bhartiya Jiddi Party and our political Jidd is paramount. That is not democracy. Democracy is the anti-thesis of the act. Now, when you have a climate of fear, you add up the CAA + the NPR + the NRC + the 6 new question in the NPR + sudden appearance of NPR in the RBI + the optional and yet we will be keep it point, you get a cocktail of distrust, of suspicion. Cocktails can be explosive and cocktail should be avoided, when there are cocktail of distrust and suspicion.

एक अन्य पर कि राम विलास पासवान को क्यों बताने की जरुरत पड़ी कि शायद सरकार जो जगह है, उसको ड्रॉप कर सकती है, क्या आपको लगता है कि अब सरकार के अंदर ये बात पैदा हो रही है कि लोगों के अंदर गुस्सा है इस बात को लेकर, डॉ. सिंघवी ने कहा कि गुस्सा तो जाहिर है, एक दिन का बच्चा भी समझता है, जो देख नहीं सकते, जो बोल नहीं सकते, वो भी जान जाते हैं। उस गुस्से का आभास भी पूरा है, सिर्फ एक चीज का अभाव है कि हम इतने अहंकारी हैं कि हमें गुस्सा भी मालूम है और उसका आभास भी मालूम है कि हम उसको स्वीकार नहीं सकते, अंहकार का मतलब होता है अस्वीकारता और आप उसको देख रहे हैं अब।

नंबर दो, आप आडंबर और एक दोगली आवाज भी देख रहे हैं। हिपोक्रेसी बहुत बड़ी चरम सीमा पर है। उसका उदाहरण अभी पासवान जी के पहले आया, जिसको आप ज्यादा महत्वपूर्ण समझिए। माननीय प्रधानमंत्री ने कहा कि हमने कैबिनेट में, बड़े उनके एग्जेक्ट शब्दों का प्रयोग कर रहा हूँ, ‘संसद में और कैबिनेट में एनआरसी डिस्कस नहीं किया’ तो मैंने ट्वीट किया था कि भाई, माननीय प्रधानमंत्री जैसे बड़े व्यक्तित्व और गृहमंत्री को वकीलों जैसे बात नहीं करनी चाहिए, कि कैविएट लगा दें, प्रोवाइजो लगवा दें, एक्सक्लेशन लगा दें कि हमने संसद में नहीं किया और कैबिनेट में नहीं किया, तो हमने तो कभी कहा ही नहीं कि आपने कभी किया कभी संसद और कैबिनेट में। क्या आप साथ-साथ ये नहीं कह सकते एक सैंटेंस कि हम एनआरसी नेशनवाइड नहीं कर रहे हैं? उसी बात का आपने देखा, माननीय गृहमंत्री ने भी कभी स्पष्ट रुप से भी नहीं किया आपको उनको तो पूछा गया बल्कि ये माननीय प्रधानमंत्री औऱ मिस्टर हरदीप पुरी के वक्तव्य के बाद उनको पूछा गया, उन्होंने सीधा जवाब नहीं दिया।

अब आइए आपके पासवान- जावड़ेकर मुद्दे पर, पासवान जी ने भी कुछ हद तक स्पष्ट प्रश्न पूछने का प्रयत्न किया, उसका गोल-मटोल उत्तर आ गया, क्वेश्चन 1-2-3 रहेंगे, आप चाहो तो जवाब दो, चाहो तो जवाब न दो। कोई ये नहीं कहता, दो वाक्य, एनआरसी राष्ट्रीय स्तर पर नहीं होगा। एनपीआर में जो पुराना यूपीए वक्त के समय ढांचा था, वैसा ही होगा, कोई नए प्रश्न नहीं होंगे। आरबीआई में एनपीआर का इस्तेमाल नहीं होगा और एनपीआर के आधार पर हम डिनायल या एक्सेप्टेंस सुनिश्चित नहीं करेंगे।

अब मैंने चार बड़े सरल वाक्य कहे हैं, मैं समझता हूँ कि इतने महानुभाव इस वाक्य को कई और अच्छे तरीके से कह सकते हैं लेकिन आपको कहने वाला कोई नहीं है, गोल-मटोल घूम रहे हैं कि The politics of digression and diversion is going on.

शाहीन बाग में आंदोलनकारी महिलाओं के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी द्वारा दिए आपत्तिजनक बयान पर प्रतिक्रिया पूछे जाने पर डॉ. सिंघवी ने कहा कि मैं नहीं समझता कि ऐसे अपवाद- आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणी पर मैं कुछ कहूं। एक संवैधानिक पदाधिकारी व्यक्ति हैं, अपने आपको योगी कहते हैं, मुख्यमंत्री हैं उत्तर प्रदेश के और मूल मुद्दे पर 2-3 बातें कहते हैं- या तो पुलिस लाठी से मारेंगे या हम गिरफ्तार कर लेंगे या आपकी प्रोपर्टी खा लेंगे, आप बोलो मत, घर बैठो, बदला लेंगे, ये बातें कहते हैं। उसके बाद महिलाएं किस मुद्दे पर बैठी, उसका जिक्र नहीं करते। मूल मुद्दा क्या है – इतनी कड़ी सर्दी में बैठना इतना आसान है, दिनों-दिनों, उस पर कोई जिक्र नहीं करते, व्यंग्य करते हैं, धमकी देते हैं। गैर कानूनी, असंवैधानिक बातें करते हैं और जब-जब वो ये करते हैं, उनकी पार्टी और उनकी पार्टी से संबंधित रिमोट कंट्रोल नागपुर में उनका दर्जा 5 आंकड़े ऊपर बढ़ जाता है।

केन्द्रीय मंत्री संजीव बालियान द्वारा दिए विवादित बयान पर पूछे एक प्रश्न के उत्तर में डॉ. सिंघवी ने कहा कि मुझे नहीं लगता कि संजीव बालियान जी जैसे लोगों के बारे में मैं कोई टिप्पणी करुं, उनका व्यक्तित्व, उनकी पहचान, उनकी आइडेंटिटी सब लोग जानते हैं। उनका हर दिन एक भद्दे वक्तव्य की आवश्यकता होती है, नहीं तो उनका हाज्मा ठीक नहीं रहता है और उसी के आधार पर वो अपनी राजनीति चलाते हैं। ऐसे लोगों को तो बहुत पहले भारत ने रिजेक्ट कर रखा है।

दिल्ली में भाजपा उम्मीदवार कपिल मिश्रा के दिए बयान पर डॉ. सिंघवी ने कहा कि कांग्रेस हो, एएपी हो, बीजेपी हो, मैं आपको सिद्धांत की बात बडी स्पष्ट कह रहा हूं, मैं यही कहता अगर कांग्रेस पार्टी में से किसी ने कहा होता तो कि जो गणतंत्र में ये कहकर जीतना चाहते हैं कि बाकी आप सब लोग खत्म हो जाएंगे, जैसा कि शुरुआत की थी 2014 में कांग्रेस मुक्त भारत की भी, किसी के मुक्त भारत की बात करना, गणतंत्र के विरुद्ध है। हमारे शत्रुओं, एक पड़ोसी देश, जो हम पर आतंकवाद का आक्रमण करता है, उनसे एक गणतांत्रिक- लोकतांत्रिक विपक्ष की बराबरी करना, चाहे वो आप हों, मैं हूं, कोई भी हो, ये बिल्कुल भारत की अस्मिता के विरुद्ध है, हम इसकी भर्त्सना करते हैं, कंडम करते हैं, कहीं से आए। हां, आप लोकतांत्रिक-गणतांत्रिक तरीकों से हराईए, जीतिए तो स्वागत है।

एक अन्य प्रश्न पर कि चुनाव में भाजपा नेताओं द्वारा विवादित बयान दिए जा रहे हैं, क्या ये ध्रुविकरण करने की नीति है, डॉ. सिंघवी ने कहा कि निश्चित रुप से इस पर कोई दो राय थोड़े ही है। ये तो कोई एक माइल्ड उदाहरण दे रहे हैं ध्रुविकरण का, जो भद्दी-भद्दी चीजें हो रही हैं, लेकिन दिल्ली का एक जो समाज है, जागरुकता है, मैं नहीं समझता कि इस प्रकार से, एक भद्दे प्रदर्शन से कुछ फर्क पड़ने वाला है, बल्कि वो अपने आपको एक्सपोज कर रहे हैं, ऐसे हर वक्तव्य से बुरी तरह से एक्सपोज कर रहे हैं, उनके डेसप्रेशन को दिखा रहा है। You can see  desperation when these things happened.

 

Sd/-

(Vineet Punia)

Secretary

Communication Deptt.

AICC

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