Dr. Abhishek Manu Singhvi, Spokesperson, AICC and Shri Jairam Ramesh, former Union Minister addressed the media at AICC Hdqrs.18 dec 2019

Highlights of Press Briefing                                              

डॉ. अभिषेक सिंघवी ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि  जो नया नागरिकता का एक्ट आया है, आज हम उसके विषय में बातचीत करेंगे, उच्चतम न्यायालय की हियरिंग के संदर्भ में और मैं आपको संक्षेप में बताना चाहता हूं कि कि कांग्रेस पार्टी की तरफ से मेरे मित्र जयराम रमेश जी ने जो मुद्दे उठाए हैं, जिनको कोर्ट के समक्ष रखने का मुझे आज अवसर मिला, उनका सारांश क्या है, सरल शब्दों में, मुख्य मुद्दे क्या हैं।

 

मैं पहले ये बात बता दूं आपको कि याचिका जो जयराम रमेश जी की के नाम से थी, ये सिर्फ याचिका नहीं है, इस पर इन्होंने काफी लंबे समय तक शोध किया है, 6-7 महीने से ये शोध चल रहा है, वैसे तो जेपीसी के बाद से ही चल रहा है। उसके बाद आप जानते हैं हमारी पार्टी में आंतरिक बहुत सारी मीटिंग हुई हैं इस विषय पर, जिनका ये हिस्सा थे और एक कोर ग्रुप था, जिस पर ये प्रथम श्रेणी में थे और जिसकी अध्यक्षता माननीय कांग्रेस अध्यक्ष ने की थी, अभी भी हैं और संसद में भी इन्होंने पूरी तरह से भाग लिया है, तो इस संदर्भ में ये याचिका पेश की गई थी।


दूसरी बात मैं शुरुआत में स्पष्ट कर दूं, क्योंकि इस पर मिथ्या प्रचार चल रहा है सुबह से मैं देख रहा हूं। आज प्रमुख याचिका हमारी थी, 3-4 और प्रमुख याचिकाएं थी, जिनके आप नाम जानते हैं, महुआ-मित्रा इत्यादि-इत्यादि। मैं ये बड़े स्पष्ट शब्दों में स्पष्ट कर दूं कि हमने और किसी भी प्रमुख याचिकाकर्ता ने आंतरिक स्टे नहीं मांगा, ये मिथ्या प्रचार से काम नहीं चलेगा और हम जानते हैं कि मिथ्या प्रचार कौन कर रहा है।

 

नंबर दो, ऊल्टा मैंने स्पष्ट कहा, उच्चतम न्यायालय से अनुरोध किया कि आप सिर्फ कारण बताओ नोटिस जारी करें मुख्य याचिका में भी और आंतरिक याचिका में भी।

 

नंबर तीन, उच्चतम न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायधीश ने ये स्पष्ट किया कि हम नोटिस जारी कर रहे हैं दोनों में, मुख्य वाले में भी और आंतरिक वाले में भी।

 

नंबर चार, अगर आप कारण बताओ नोटिस जारी करते हैं आंतरिक में, इसका अभिप्राय होता है कि आप अगली तारीख को, जो जनवरी में है, 22 जनवरी को है, उसमें आप आंतरिक विषय की चर्चा करके उस पर निर्णय तब लेंगे।

 

नंबर पांच, इसका साथ-साथ ये भी अभिप्राय होता है कि जिस चीज के लिए आप कारण बताओ नोटिस जारी कर रहे हैं, आंतरिक रिलीफ के लिए, निश्चित रुप से उसको आज आप खारिज तो नहीं कर रहे हैं ना, अब आज खारिज कैसे कर सकते हैं, जिस चीज को आपने 22 जनवरी को रखा है। तो ये मिथ्या प्रचार पूरी तरह से हट जाना चाहिए और ये बात जरुर है कि करीब 60 या 55 याचिकाएं थी, उनमें से इक्का-दुक्का लोगों ने, जो हमसे संबंध नहीं रखते हैं, कहा होगा, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने शुरु में ही स्पष्ट कर दिया कि हम नोटिस जारी कर रहे हैं, मुख्य याचिका में, जिसको अंग्रेजी में कहते हैं – main petition and stay petition यानि आंतरिक याचिका में, दोनों चीजों को लगाया है अगली तारीख को, या तो 20 है या 22 जनवरी है।

 

इसका मैं कारण बता दूं, एक संदर्भ भी है क्यों मैंने, मेरी आवाज में बड़े स्पष्ट रुप से कोर्ट में सब जानते हैं मांगा कि आप सिर्फ कारण बताओ नोटिस दीजिए, आंतरिक आदेश की आवश्यकता नहीं है। क्यों नहीं है – आज सच्चाई ये है कि इसमें एक्ट जरुर पास हो गया है, यहाँ तक कि 99.99 प्रतिशत एक्ट में होता है, वो एक प्रावधान जिससे हम सब वाकिफ है, This act shall come into force from so and so, वो तक प्रावधान नहीं है, खैर उसको छोड़िए। मुख्य बात ये है कि इस एक्ट को कार्यांवित करने के लिए, ये जिसे कहते हैं कि यह अपने आप में self operating act नहीं है, किसी भी एक्ट में उसको कार्यांवित करने के लिए उसके अंतर्गत रुल एंड रेगुलेशन बनाने पड़ते हैं, जो आवश्यक होते हैं। उस रुल एंड रेगुलेशन के बिना, उन रुल एंड रेगुलेशन के अंतर्गत जो फॉर्म प्रिसक्राईब्ड होते हैं, उनके बिना एक्ट कार्यांवित हो ही नहीं सकता, जो नागरिकता के लिए अप्लाई करेगा, वो कैसे करेगा, क्या फॉर्म होगा, उसमें किस प्रकार से देखा जाएगा, किसको जाएगा, इत्यादि-इत्यादि। ये सब मुद्दे सिर्फ रुल एंड रेगुलेशन बनने पर आते हैं और हमने ये कोर्ट को बताया कि क्योंकि ये रुल एंड रेगुलेशन अभी तक कार्यांवित नहीं हुए हैं, इसलिए इस संदर्भ में भी जनवरी की तारीख पड़ी है।

 

अब आते हैं, जो मुख्य मुद्दे हमारे मित्र जयराम रमेश जी ने इस याचिका में, जिसको मैं किसी रुप से एक सबज्यूडिस मैटर में अपना मत नहीं दे रहा हूं, मैं सिर्फ अपना मत शेयर कर रहा हूं कि हमारी क्या याचिकाएं हैं, हमारा उच्चतम न्यायालय से क्या अनुरोध है, कनटेंशन्स (contentions) क्या हैं और मैं सिर्फ कनटेंशन के हिसाब से रख रहा हूं, अंततोगत्वा इसका निर्णय उच्चतम न्यायालय करती है।

 

हमारे तीन स्तंभ हैं प्रार्थनाओं के। एक स्तंभ है कि संवैधानिक रुप से ये बिल्कुल गलत है, असंवैधानिक है, गैर कानूनी है, जिसके कारण मैं आपको बताऊंगा।

 

दूसरा स्तंभ- जो अंतर्राष्ट्रीय हमारे उत्तरदायित्व हैं, अंतर्राष्ट्रीय हमारे जो कर्तव्य हैं, कई करारनामों के अंतर्गत, जिनको भारत ने साइन किया है, ये उसके विरुद्ध है।

 

मैं आपको बताना भूल गया था कि हमने दो याचिकाएं, जिनमें मैं खुद पेश हुआ था, एक माननीय रमेश जी की, दूसरी उत्तर – पूर्व के विषय में एक विशेषज्ञ टाईप याचिका है और तीसरा जो हमारा स्तंभ है उससे मेल खाता है।

 

तीसरा किस प्रकार से भारत सरकार ने पुराने भारत सरकार के अत्यंत महत्वपूर्ण करारनामे, प्रादेशिक स्तर पर रिजनल एग्रीमेंट, असम अकोर्ड उनमें से एक है, त्रिपुरा में दूसरा ऐसा अकोर्ड है, उसका उल्लंघन किया। तीन स्तंभ के हमारे क्या ग्राउंड है, क्या यथार्थ है इस पेटिशन का। तो जहाँ तक असंवैधानिकता का सवाल है, मैं आपको सरल रुप से बताना चाहता हूं, किस प्रकार से अनुच्छेद-14 जो बराबरी का अनुच्छेद है, उसका घोर उल्लंघन हुआ है और मैं कानूनी दांव पेंच की बात नहीं करना चाहता हूं।

 

मैंने एक उदाहरण दिया है जो हम उच्चतम न्यायालय के सामने पेश करेंगे। यह एक कमरा है, मान लीजिए ये कमरा एक कैंप है, जिसमें 100 लोग मान लीजिए ऐसे हैं जो शरणार्थी हैं, जो कि बाहर से आए हैं। अब आप जो 100 लोग हैं, वो 10 देश से आए हैं और 10 धर्मों के हैं। मैं आपको उदाहरण दे रहा हूं। तो पहली चीज जो ये कानून गलत करता है वो इन 100 में से सीधा 60 हटा देता है क्योंकि सिर्फ इस कमरे में जो तीन देश से आए हैं, उनको देखता है, अफगानिस्तान, बंगलादेश और पाकिस्तान से सिर्फ ये लोग आए हैं, तो आपने पहले तो 60 लोगों को हटा दिया, 40 बचे। मैं सिर्फ उदाहरण दे रहा हूं। तो ये बराबरी के पहले स्तंभ का उल्लंघन हुआ। आपने तीन देश क्यों चुने इन 10 देशों में से, बाकी भी पड़ोसी देश हैं, आप चुन सकते हैं, लेकिन उसका आपने कोई सीधा औचित्य नहीं दिया। ये तो शुरुआत है कहानी की, दूसरा जो 40 बचे, इनमें से मैंने बाकी जो 5 धर्मों के नहीं हैं, उनको 40 से हटा दिया, तो सिर्फ 25 बचे, ये 25 इस तरफ वाले, आप लोग हट गए। मैंने 5 धर्म चुने, तो आंकड़ा 100 से 25 तक पहुंच गया।

 

तीसरा, मैंने ये करार कर दिया, जिसे कानून में कहते हैं डीमिंग फिक्शन, कि ये जो बैलेंस 75 बचे हैं, 25 हट गए, 25 हैं तीन देश से और 5 धर्मों वाले, जो बैलेंस 75 बचे हैं, वो 75 मान कर चलिए कि उनका परसिक्यूशन नहीं हुआ, उनकी प्रताड़ना नहीं हुई है, कानून ने डीमिंग फिक्शन दे दिया कि वो प्रताड़ना वाले नहीं हैं।

 

चौथा, जो ये 25 बचे हैं, उनके बारे में कहीं ये नहीं लिखा है कि हम किस तरह से मालूम करेंगे कि ये व्यक्ति जो आखिर में बैठा है, इसके ऊपर प्रताड़ना हुई। कोई जांच का प्रावधान नहीं है, कोई डिटेल नहीं है, ये डीम कर दिया कि ये व्यक्ति जो सामने बैठे हैं, ये प्रताड़ित हैं, यानि 25 लोग प्रताड़ित हैं। जांच का, मैकेनिज्म का, प्रक्रिया का कोई स्तंभ या ढांचा नहीं दिया गया है।

 

पांचवा, ये जो प्रताड़ना का शब्द है, जिसे बार-बार माननीय गृह मंत्री भी बोलते हैं, ये वैसे एक्ट में कहीं नहीं है, ये बड़ी विचित्र बात है। Statement of objects, जो उद्देश्य देता है किसी कानून का, उसमें एक शब्द इस्तेमाल किया गया, लेकिन उसको एक्ट में कार्यांवित कैसे किया, ये नहीं बताया।

 

छठा- आपने नागरिकता को एक तरफ लिया, प्रताड़ना को एक तरफ लिया और दोनों को जोड़ने का प्रयत्न किया है। ये दो चीजें हैं, सीधा संबंध नहीं रखती और ये प्रयत्न आपने किया है बिना एक्ट में प्रताड़ना के विषय में कुछ भी लिखे बगैर। कुछ लिखा नहीं है आपने।

 

ये हुआ आपके एक कैंप का उदाहरण। तो ये हुआ स्तंभ संवैधानिक। बाकी आप जानते हैं टेलीविजन वगैरह में बातचीत हुई है कि बाकी स्तंभ बहुत है अनुच्छेद 14 के कि आपने जिस प्रकार से इन 25 को अलग किया, उस प्रकार से आपने जो तमिल हैं श्रीलंका के, उनको अलग क्यों नहीं किया, उन 25 में क्यों नहीं डाला? जो बुद्धिस्ट है चीन और तिब्बत के, उनको क्यों नहीं डाला, जो म्यामांर के ईसाई हैं, उनको इन 25 में शामिल क्यों नहीं किया? बाकी आप जानते हैं दलील सुन चुके हैं आप, अहमदियास को, हजारास को, शिया को, बलूच को पाकिस्तान से या बंगलादेश से क्यों नहीं चुना, इत्यादि-इत्यादि।

 

अभी दो रोचक चीजें देकर मैं मेरी बात खत्म करुंगा, हमारे अतंर्राष्ट्रीय करारनामे में, ये बात हमारी जयराम रमेश जी वाली याचिका की विशेषता भी है कि ये सिर्फ संवैधानिक अनुच्छेद 14 की बराबरी वाले स्तंभ के आगे जाता है। करारनामे में कहा जाता है कि हमने रिफ्यूजी कनवेंशन हस्ताक्षर नहीं किए, बात सही है, ये अमित शाह साहब कहते हैं, लेकिन वो आपको ये नहीं बताते हैं कि जो एक प्रावधान है प्रताड़ित लोगों के आने के लिए स्वीकारिता देने के लिए जो प्रावधान है, जो रिफ्यूजी कनवेंशन में है, करीब-करीब वैसा ही एक प्रावधान टॉर्चर कनवेंशन में भी है। टॉर्चर कनवेंशन, टॉर्चर एक प्रताड़ना का तीव्र तरीका है, परसिक्यूशन तीव्र से भी ज्यादा टॉर्चर है। उस कनवेंशन पर हस्ताक्षर भारत ने कई दशकों पहले किए हैं।

 

दूसरी बात जो जयराम रमेश जी की याचिका में कही है कि अगर आप कनवेंशन के बाहर भी निकलें तो अंतर्राष्ट्रीय कानून में एक प्रिंसिपल होता है, जिसको अंग्रेजी में कहते हैं यूस कोजस (Jus cogens), जो लेटिन का एक शब्द है, जिसका मतलब है कि कई चीजें मानवीय अधिकार, मानवता के स्तंभ, मानवता के मील पत्थर, मानवता की जो भी कसौटियां होती हैं, वो इतनी विस्तृत रुप से फैली हैं अतर्राष्ट्रीय कानून में कि वो एक स्तंभ बन गई हैं कस्टमरी इंटरनेशनल लॉ की, उनको लागू करने के लिए कोई करारनामे की जरुरत नहीं है, उसको कहा जाता है यूस कोजस तो जब आप उस कस्टमरी अंतर्राष्ट्रीय कानून का एक हिस्सा बन जाते हैं, यानि यूस कोजस बन जाते हैं तो आपको हर देश को जो इस विश्व में रहता है, उसका, उत्तरदायित्व, कर्तव्य हो जाता है कि आप उन मापदंडों को कार्याविंत करें, लागू करें, ना कि ये कहें कि मैंने हस्ताक्षर नहीं किए। तो इस आधार पर भी टॉर्चर कनवेंशन एक यूस कोजस बन गया है, ये निर्णय आ गए हैं, जो यूरोपियन कमीशन ने निर्णय दे दिया है कि टॉर्चर कनवेंशन जिस पर भारत का हस्ताक्षर भी है या जो टॉर्चर कनवेंशन के आधार हैं, नियम हैं, मानवीय अधिकार हैं, वो बन गया है अब एक यूस कोजस, इसलिए उससे भी भारत बाध्य है।

 

तीसरा, जो हमने स्तंभ उठाया है और वो विशेष संबंध रखता है उत्तर – पूर्व की याचिका से, जो आप जानते हैं एक पूर्व महाराजा त्रिपुरा के, उनके नाम से हुई है, उस में भी मैं पेश हो रहा हूं कि उत्तर-पूर्व में ये जो आपने आधार बनाए हैं, उसमें कम से कम दो और शायद दो से कहीं और ज्यादा, जो बहुत सोच –समझ के केन्द्र सरकार ने वायदे किए थे, प्रादेशिक और रिजनल स्तर पर, उनका उल्लंघन हो रहा है। एक है असम अकोर्ड, अनुच्छेद क्लोज 5.8, एक है ऑल त्रिपुरा ट्राईबल फोर्स ATTF, उसके क्लोजिस। मुख्य रुप से इनमें कहा गया है कि आप जो कट ऑफ लाइन रखेंगे उत्तर-पूर्व के प्रदेशों के लिए, वो मुख्य रुप से 1971 होगी। तो वो उस याचिका में पूछ रहे हैं कि 71 को आपने 2014 कैसे बना दिया, 40-50 वर्ष आगे कैसे खींच दिया एक सैकेंड में? अभी खींचा नहीं है, इसका वायदा नहीं है कि ये 2014 ही रहेगी, ये 2019 भी हो सकती है। ये भविष्य की तारीख में लकीर खिंच सकती है।

 

तो ये तीन स्तंभ हैं हमारे, ये हमारी प्रार्थना है, जो हमारी प्रार्थना है उच्चतम न्यायालय में, उसके आधार हैं, ग्राउंड हैं। मैं समझता हूं ये महत्वपूर्ण हैं, ये मजबूत हैं, ये व्यापक हैं, ये संविधान से संबंध रखते हैं, ये अंतर्राष्ट्रीय करारनामों से संबंध रखते हैं, जो भारत सरकार के जो सोलम प्रोमिसिस हैं, किए गए हैं, उनसे संबंध रखते हैं।

 

ये मैं आपको आश्वासन देना चाहता हूं राजनीतिक स्तर पर कि कांग्रेस पार्टी जो अग्रिम पंक्ति में खडी है इस पूरे अभियान में, इसमें पीछे नहीं हटेगी। आपको पता है चाहे माननीय राष्ट्रपति हों, चाहे देश के साथ आपके जरिए हम मुखातिब हों, चाहे कोर्ट कचहरी में हों, चाहे संसद में हों, चाहे सिविल सोसाईटी में हों, हम मानते हैं कि ये भारत के पूरे मतलब को, भारत के होने के अभिप्राय को, उसके फाउंडेशन को हटाता है, इसलिए हम खड़े रहेंगे, जूझेंगे अंत तक।

 

एनआरसी को लेकर गृहमंत्री के दिए बयान से संबंधित एक प्रश्न के उत्तर में डॉ. सिंघवी ने कहा कि ये बात नहीं हो रही है, दो, इसमें एक तो बड़ा सरल उत्तर है कि साथ-साथ एक बुद्धिज्म रिपब्लिक है, नीचें, जहाँ के हिंदूस हैं। तमिल तो हिंदू है न! एक दूसरा, देश है पड़ोस में, वहाँ इसाई हैं, म्यामांर में। हिंदूस अपने नेपाल में भी हैं, भूटान में, स्टेट रिलीजन उनके संविधान में लिखा है कि इसाई उदाहरण के तौर पर नहीं हो सकता, एक बात तो सरल बात हुई, लेकिन आप अमित शाह जी के इस वक्तव्य में देखिए ध्यान से, आपने ये कहा कि इस कमरे में जो आ गया, आपको लगता है कि उन्होने करार किया तीन देशों को, नहीं, इस कमरे में आए हुए सौ लोग हैं, वो दस देशों से हैं, आपने किस आधार पर सिर्फ तीन देशों को चुना? इसका उत्तर नहीं दे रहे हैं वो, आपने चुना इस आधार पर कि वो सिर्फ इस्लामिक हैं, तो आपने दूसरी-तीसरी जो गलती की वो ये है कि आपने ये डीमड फिक्शन दे दिया कि हर इस्लामिक देश में, डीमड फिक्शन नंबर एक, हर नॉन मुस्लिम, डीमड फिक्शन नंबर दो, प्रताड़ित है।

ये आप अंतर्राष्ट्रीय घोषणा नहीं कर रहे हैं, ये आप नहीं कह रहे हैं कि पाकिस्तान में प्रताड़ना होती है। मैं मानकर चलता हूँ कि पाकिस्तान में प्रताड़ना होती है। आप कह रहे हैं कि जो देश में आया हुआ बैठा है, आदमी उसमें से सौ में से तीस लोग ऐसे हैं, उनको छोड़ दीजिए, बाकी सबको हम डीम कर रहे हैं कि एक तो उनका देश प्रताड़ना करने वाला है, साथ-साथ मैं आपको और बता दूँ एक बात। आज कई ऐसे पड़ोसी और पड़ोस से दूर भी देश हैं, जो आपको कह रहे हैं कि भाई, हमको गाली क्यों दे रहे हो? क्या ये एक मजाक है? International relations, is a phrase being used in the Constitution of India. We have to take care of our international relations, I can’t abuse him.  ये अगर मेरे नेबरिंग कंट्री हैं, तो मैं इनको गाली नहीं दे सकता, तो आप तो कह रहे हैं कि पाकिस्तान को छोड़ दीजिए, बांग्लादेश भी पूछ रहा है, अफगानिस्तान भी बेचारा पूछ रहा है, कि हमको डीमड फिक्शन दे दिया आपने कि हम प्रताड़ना करने वाले देश हैं, कोई इंक्वायरी तो नहीं की आपने।

दूसरा, ये भी मान लिया कि वहाँ पर हर जो मुसलमान है, वो प्रताड़ित नहीं है, इसका क्या आधार है आपके पास? मैंने आपको चार नाम लिए अभी, अहमदिया, हजारा, बलूच, शिया, इसका कोई जवाब दिया उन्होंने? और ये डीमड फिक्शन जो है, ये ब्लैंकेट अपरोच है। ब्लैंकेट अपरोच कानून में हमेशा गलत माना गया है। आप ये कह सकते हैं कि ये तीन व्यक्ति जरुर प्रताड़ित हैं और बेशक ये उस देश से आए हों या इस देश से आए हों, लेकिन ऐसी इंक्वायरी का कोई प्रावधान नहीं है।

एक अन्य प्रश्न के उत्तर में डॉ. सिंघवी ने कहा कि हर स्वाभाविक संबंध को आप कानून नहीं बना सकते न, आर्टिकल 14 में। कई ऑबियस लिंक्स हैं, हमारा लिंक कोई श्रीलंका से कम नहीं है, मैं मानता हूँ बात, लेकिन आपको अभी कसौटी जिसका ये प्रश्न पूछ रहे हैं, वो कसौटी पार कर रही है 14 की। 14 नहीं कहता आपको कि आप एक ही देश में इस कमरे में जो सौ लोग बैठे हैं, उनको आप 10 प्रकार की नागरिकता देंगे। आपने 3-4 प्रकार की नागरिकता तो बना दी इसके अंतर्गत और पार्टीशन के बाद हमने, हमारे में और उनमें एक फर्क ये है कि हमारे यहाँ एक जबरद्स्त, व्यापक, विश्वभर में माना जाना गया एक संविधान है। मैंने अभी तक सबसे मुख्य बात तो बोली नहीं, सब लोग जानते हैं, इसलिए नहीं बोली। कि वो संविधान सही या गलत की बात नहीं है, हमारे निर्माताओं में इतना विवेक था कि उन्होंने कहा कि इसमें जो भेद है, उस भेद को कर सकते हैं आप, लेकिन भेद का आधार धर्म नहीं होगा। इसका एक स्तम्भ है, हमारे संविधान पर।

एक अन्य प्रश्न पर कि राज्यों ने कहा है कि हम इसे लागू नहीं करेंगे, कल अमित शाह जी ने कहा है कि हर हाल में लागू करना होगा, डॉ. सिंघवी ने कहा कि मैं उस पर टिप्पणी नहीं करना चाहूँगा, बस ये एक कानून है, इसमें कांग्रेस पार्टी कुछ नहीं कहना चाहती, ये बातें अलग-अलग प्रदेशों से आई हैं, वहाँ से पूछना पड़ेगा आपको। सिंपल बात ये है कि आज इस कार्यान्वित करने का कोई ढांचा नहीं है, भारत में नहीं है, कोई स्टेट में नहीं है। जब तक वो स्टेज नहीं आती, इसकी बातचीत करने की आवश्यकता नहीं है। हम आपको आज बता रहे हैं, कांग्रेस पार्टी का सैद्धांतिक विरोध है इस एक्ट के साथ।

एक अन्य प्रश्न पर कि गृहमंत्री ने कहा है कि एनआरसी को लेकर किसी को डरने की जरुरत नहीं है, सरकार अल्पसंख्यक वर्ग के लिए अलग से कार्यक्रम चलाएगी, विपक्ष उन्हें डरा रहा है, क्या कहेंगे, डॉ. सिंघवी ने कहा कि इसका क्या जवाब दे सकते हैं हम। कानून आप लाते हो, एनआरसी की बात आप करते हो, आप 75 लोगों को इस कमरे से एक्सक्लूड करते हो, और गलती हमारी है? अब इसका तो कोई जवाब नहीं है। आज क्या आप समझते हैं कि देशभर के जितने लोग और कोने-कोने से, जहाँ से आपको आवाज आ रही है, अगर कोई समझता है कि वो ऑर्कस्ट्रेटिड है, तो मैं समझता हूँ कि वो एक मुंगेरी लाल के स्वप्न लोक में है या उस चिड़िया जैसा है, जिसने अपना माथा जमीन के नीचे गाड़ दिया है। ये वास्तव में लोगों के अंदर एक आक्रोश है, भय तो बाद की बात है, आक्रोश है। साथ-साथ भय, साथ-साथ बिल्कुल अविश्वास है और उसका कारण आपने दिया है, आपकी कथनी से और आपकी करनी से।

On the question that entire opposition yesterday petitioned the President demanding repeal of this Law, why did you legally not ask for a stay, Dr. Singhvi said- how we can ask for a stay to the President, he is not the judiciary. We don’t want things to be done in a hurry without understanding the whole thing. Today, there is a notice – please understand a notice means Show Cause as to why we should not grant a stay – Show Cause as to why this petition should not be allowed. That is the exact legal language since you have asked me. Now the court is requiring the powers that be to Show Cause on 22nd January. On that day if they do not show sufficient proper cause, then both the stay can be granted and something can be done to the Act. Between now and then, there appears to be no structure, no system. I agree with you it can happen but the Act has not even yet been operationalised on the ground. So I think we should require a sober approach, analytical approach which will be done by the Court on that day and the Court clarified and I am very surprised to find how the media is repeating it. It said in my presence twice, we are issuing notice on both and yet I find large section of media reporting ‘stay declined’, ‘no stay’. That is very unfortunate because it is a signal which is wrong.

On another question Dr. Singhvi said- I think the real answer is that we do not have a Prime Minister for Hindus or Muslims. We do not have a Prime Minister for Christians and Buddhists. We have a Prime Minister for India and India as a country or at least a large sections are losing faith and India is a country where large sections are losing faith because of the very-very divisive comment which are made by very senior BJP people, it is the Prime Minister – the most eloquent Prime Minister does not seek to address – people are losing faith because equally divisive comments are made by senior Ministers and then people are losing faith because concrete action like the NRC – now threatened for the whole country – and the CAA are done. So it is both not merely words, not merely act, everything taken together.

एक अन्य प्रश्न पर कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के विधायक ने कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार में बिना कमीशन कोई काम नहीं होता, अगर अधिकारियों की पत्नियों के एनजीओ की जांच कराई जाए, तो सारी सच्चाई सामने आ जाएगी, क्या कहेंगे, डॉ. सिंघवी ने कहा कि मैं इसमें क्या कह सकता हूँ, मैं सिर्फ ये कह सकता हूँ कि हम जानते हैं कि बड़े-बड़े लैक्चर, जुमले और कथनी और करनी में कितना बड़ा फर्क है। हम जानते हैं वो सब मापदंड राजस्थान में पहले बीजेपी सरकार द्वारा स्थापित हुए हैं, हम जानते हैं छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सरकार के संदर्भ में और उसका एक और उदाहरण आप उत्तर प्रदेश से दे रहे हैं, तो इसमें कोई ज्यादा आश्चर्य की बात नहीं है। आश्चर्य की बात तो ये है कि किस प्रकार ऐसे कई उदाहरण आने के बाद, पीठ ठोंककर, छाती ठोंककर कहा जाता है बार-बार कि हम भ्रष्टाचार विहीन या भ्रष्टाचार रिक्त सरकार हैं।

On the question that Jamia Students Association has also condemned the action of violence, the Congress party has been demanding judicial enquiry, Dr. Singhvi said– I think you are right, it requires an immediate enquiry, and the scene has shifted to the High court which will take a little bit of time but I think the immediate nearest counterpart to this is the so-called Sirpurkar Enquiry Committee – we have a semi-judicial appointment in terms of a Retired Judge and that too of the Hon’ble Supreme Court. I think my own personal views the High court should emulate Judge and immediately give a two-week time bound enquiry because there is a lot of dissatisfaction, there is a lot of material and we all have it on social media platform about who did what, who entered the University, who went to the Library, how were some buses torched etc. etc. I am not making any definitive comment on the funding but                       certainly it requires an immediate enquiry and also requires that report to be sent in letter and message to people who might try it again in terms of mischief.

एक अन्य प्रश्न पर कि प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं कि ये प्रोटेस्ट अर्बन नक्सल करा रहे हैं, साथ ही साथ उनके कंधे पर बंदूक रखकर अपोजीशन बंदूक चला रही है और एक केन्द्रीय मंत्री ने विरोध करने वालों को सीधी गोली मारने के आदेश दिए हैं, डॉ. सिंघवी ने कहा कि मैं इसकी ज्यादा कड़े शब्दों में, मैं शब्द नहीं पा सकता हूँ, मैं भर्त्सना करुं। ये निंदनीय है, भर्त्सना योग्य है, चाहे प्रधानमंत्री ने कहा हो, चाहे मंत्री ने कहा हो। इसलिए गनीमत है कि जयराम रमेश और अभिषेक मनु सिंघवी लुटियन्स को दिल्ली गैंग वाले नहीं कहा गया कि हम भी यही कर रहे हैं। गनीमत है कि झोलावाला नाम लेकर नहीं कहा गया कि हम कर रहे हैं ये काम। आज दिल्ली शहर में इतनी विविध स्थानों पर, इतने विविध वर्गों में, देशभर के पूर्व से लेकर, उत्तर से लेकर दक्षिण तक ये वारदातें हो रही हैं, और आपको एक शब्द मिला है, अर्बन नक्सल शब्द. या कल झोलावाला मिलेगा, परसों लूटियन्स दिल्ली वाला मिलेगा। ये दुर्भाग्य है इस देश का कि आप विरोध को अपने सही संदर्भ और परिपेक्ष में समझ नहीं सकते, जान नहीं सकते, संज्ञान नहीं ले सकते और कुछ हद तक एक विनम्रता से नतमस्तक नहीं हो सकते, इसलिए आप सुधार नहीं ला सकते। सुधार करने के लिए स्वीकार्यता आवश्यक है। जब स्वीकार्यता नहीं तो सुधार कहाँ से होगा।

On the question of reaction on the comments of BJP leader Hemant Biswa Sarma that he has electronic evidence to suggest that Youth Congress Chief of Assam has planned the entire arson, Dr. Singhvi said- so a Congress defector makes an allegation that he knows just like I know that you did something and you accepted a gospel truth. Shri Sarma is not likely, it is not at all surprising if he said what he said what would be surprising me said anything other than what he said and I think such matter, if he has an evidence, why is he sending you, he should produce the evidence and somebody will see but certainly nobody is prepared to accept just because you are in the habit of abusing Congressmen, we steer to accept what is happening. He should produce evidence.

On the related question about the ongoing agitation, Dr. Singhvi said I don’t agree, I think it is a very nature the diversity, the extent, the geography, the geographical point and the nature of the protestor shows that it is completely spontaneous. Now obviously if this is happening across the length and breadth of the country, political parties will not stand by, close the eyes and go in an ostrich mode. Otherwise, you will be asking the opposite question, why the opposition parties sleeping? So, I think the fact that political parties have also joined is a part of our vibrant democracy but certainly they are not to be decried and denied by use of words like Urban Naxal and ‘Jholawallas’ and Lutyen’s Delhi gang.

 Sd/-

(Vineet Punia)

Secretary

Communication Deptt.

AICC

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