Modi Government misled the Hon’ble Supreme Court

Highlights of Press Briefing                                                                             13 January, 2021

Dr. Abhishek M. Singhvi, MP & Spokesperson AICC addressed the media via video conferencing, today.

डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि मैं आपके समक्ष एक बहुत ही गंभीर उदाहरण लाना चाहता हूं, झूठ बोलने का, असत्य बोलने का, देश को और देश के हर नागरिक को बरगलाने और बहकाने का और इससे माननीय उच्चतम न्यायालय को भी वंचित नहीं रखा, इस प्रकार के गलत कारनामों से। ये इस केन्द्र सरकार ने किया है और जो इस केन्द्र सरकार ने किया है, वो भर्त्सना योग्य है, वो बिल्कुल असत्य है और बिना बातचीत के, बिना किसी विधायिका के कानून के किसी रुप से, पब्लिक डोमेन में वार्तालाप किए बिना उच्चतम न्यायालय में एक एफिडेविट, एक हलफनामा फाइल किया है कि हमने प्री-लेजिस्लेटिव कंसल्टेशन पूरी तरह से किया। हमने विधायिका के कानून के पहले विचारों का आदान-प्रदान किया, विचार-विमर्श किया, जो कि बहुत गंभीर असत्य, झूठ है।

मैं इसके आपको दो-चार उदाहरण संक्षेप में देना चाहता हूं।

एक तो है कि 11 दिसंबर, 2020 को आरटीआई के अंदर याचिका दी गई और एक दूसरी याचिका दी गई, 15 दिसंबर, 2020 को यानि चार दिन बाद। इन दोनों याचिकाओं में इन तीन गलत कानूनों के विषय में जानकारी मांगी गयी कि बताईए कि आपने किनसे विचार-विमर्श किया, कब किया, कौन सा दस्तावेज भेजा, उसका जवाब क्या आया और आपकी मीटिंग्स कब हुई, क्योंकि आप जानते हैं, ऑर्डिनेंस जून का है और कानून सितंबर का है या तो जून के पहले कब किया आपने ये आदान-प्रदान और या सितंबर के पहले कब किया? ये प्रश्न पूछा मिस अंजली भारद्वाज ने, दो अलग-अलग याचिकाओं द्वारा, 11 दिसंबर और 15 दिसंबर को। दोनों के जवाब 22 दिसंबर को इनफोर्मेशन ऑफिस से आ गए। मैं आपको कोट कर दूं, अंग्रेजी में जवाब है – “this CPIO does not hold any record in this matter.” यानि जितने भी व्यापक प्रश्न है कि किससे किया, कब किया, कैसे किया, कौन सा कागज है, कौन सा नोटिस भेजा, कब मिले, कब मीटिंग हुई, मिनट्स कहाँ हैं, कोई रिकॉर्ड नहीं है, कोई दस्तावेज नहीं है, कोई प्रमाण नहीं है। इसके बावजूद 11 जनवरी, आज से दो दिन पहले, आज 13 जनवरी है, उच्चतम न्यायालय जैसी संस्था में एक हलफनामा दिया जाता है, जिसमें 5-6 पैरा ग्राफ हैं, जो कहते हैं कि हम इस हलफनामे को मुख्य रुप से इसलिए पेश कर रहे हैं, क्योंकि हम वो गलतफहमी, जो फैलाई गई है कि हमने कोई भी आदान-प्रदान और विचार-विमर्श नहीं किया, ये झूठ है। हमने किया है विचार-विमर्श और हम इसलिए हलफनामा डाल रहे हैं।

ये आपको उच्चतम न्यायालय के हलफनामा के पैरा 2, 3, 10, 12, 13 और 14 में मिलेगा। ये सभी पैरा का विवरण मेरे नोट में है। आपको वो अभी तुरंत 10 मिनट के अंदर ईमेल पर मिल जाएगा, अभी मिल रहा होगा। मैंने अनुरोध कर दिया है हमारे विभाग से कि आपको भेज दिया जाए।

इसी पैरा ग्राफ में, जो हलफनामा है, ये भी कहा गया कि जो विचार-विमर्श और आदान-प्रदान की हम बात कर रहे हैं, पैरा नंबर मैंने दिए हैं आपको अभी, ये क्या है, ये मजाकिया है। ये अगर इतना दुर्भाग्यपूर्ण नहीं होता तो मजाकिया होता।

एक पैरा में कहते हैं कि हमने वर्ष 2000 में गुरु कमेटी बनाई, वो हमारा विधायिका का प्रि कंसल्टेशन है। एक में कहते हैं कि हमने मॉडल एक्ट बनाए 2003 में और 2017 में। बिल्कुल सही है, मॉडल एक्ट बनाना ये प्री-कंसल्टेशन होता है 2020 के ऑर्डिनेंस के विषय में। मैं नहीं समझता कि किंडरगार्टन का कोई कानून का या समझदारी का विद्यार्थी भी ये सोचेगा और वो मॉडल एक्ट जो 2003 और 2017 के, वो एक चीज और प्रमाणित करते हैं। वो प्रमाणित करते हैं कि एक सिर्फ एक अखिल भारतीय स्तर का आम कानून केन्द्र द्वारा इस विषय पर नहीं किया जा सकता। उसके पास अधिकार क्षेत्र नहीं है, इसलिए मॉडल कानून में कहा गया कि प्रादेशिक सरकार को ये विकल्प है, ये ऑप्शन है कि वो चाहें या ना चाहें, ऐसे कानून को अपनाना। जबकि इस बार, जो तीन कानून दिए गए हैं, उसमें ऐसा कोई भी विकल्प या ऑप्शन नहीं दिया गया है।

अंत में एफिडेविट कहता है कि ये हमने बहुत एलोब्रेट कंसल्टेशन किया कि लोग इसके विरुद्ध कह रहे हैं, वो झूठ बोल रहे हैं। ये मजाक की बात है क्योंकि झूठ तो आप हलफनामे में देख रहे हैं। बल्कि जो लोग कह रहे हैं, वो प्रमाणित हो गया है इस हलफनामे से और ये प्रमाणित हो गया है उस आरटीआई के जवाब से कि हमारे पास एक कागज के एक पन्ने का एक पैराग्राफ नहीं है, जो दिखाता है कि ऐसा विचार-विमर्श हुआ। इसका मतलब है कि मिथ्या प्रचार पर आपकी कोई सीमा नहीं है। देश, स्टेक होल्डर, आम आदमी, जनता जनार्दन, आप उच्चतम न्यायालय को भी नहीं छोड़ते। उसके समक्ष अवमानना है, गंभीर अवमानना है। उसके समक्ष गलत प्रोजेक्शन है, गलत तथ्य हैं और देश और आम आदमी के समक्ष भी वही बात है।

इन सबके बाद आप जानते हैं कि जो ऑर्डिनेंस आया जून में, वो सितंबर में, जिसको हम लोकतंत्र का मंदिर मानते हैं, वहाँ पर एक मिनट के भी विचार-विमर्श के बिना लोगों के मुँह में, लोगों के जीवन में, लोगों की आवाजों को तोड़ते हुए, रोकते हुए, खत्म करते हुए ये पारित किए गए।

इसके अलावा मैं अपनी बात का अंत करुंगा एक बात और जोड़कर। ये भी अब करीब-करीब प्रमाणित हो गया है कि इस सरकार के अंदर भी किसी को मालूम नहीं था कि इस प्रकार का कानून अचानक आने वाला है जून में और बाद में कानून बनकर सितंबर में यानि ऑर्डिनेंस जून में और बाद में कानून। आम आदमी और पब्लिक डोमेन की क्या बात करते हैं, सरकार में भी लगता है कि किसी शंहशाह ने एक दिन किसी तुगलकी फरमान के आधार पर इस जून के अध्यादेश को पास कर दिया। इसका प्रमाण ये है। 2003 देखा आपने, 2017 देखा आपने और पिछले वर्ष भी कमेटी और समितियों की रिपोर्ट देखी आपने, तीन देख ली आपने। इन तीनों में क्या था – ये एक समझ थी कि अधिकार क्षेत्र शायद केन्द्र सरकार का कृषि के मामले में इस प्रकार का अखिल भारतीय बाध्य कानून पास करने का संवैधानिक अधिकार क्षेत्र ही नहीं है। इसीलिए बार-बार 2003 में, 2017 में समितियों द्वारा मॉडल एक्ट्स प्रस्तावित किए गए, जिनका मैंने विवरण किया अपने नोट में और अभी बोला मौखिक रुप से। इन मॉडल एक्ट का मुख्य उद्देश्य था कि हम ये आपको प्रस्तावित कर रहे हैं। आप अमुक प्रदेश हैं, आप सोचिए कि अगर आप इसे अडोप्ट करना चाहते हैं, नहीं करना चाहते हैं, नहीं करिए। एक दूसरा प्रदेश है, उसको भी ऐसा विकल्प दिया गया है। ये हुई बात 2019 तक की।

2020 में  मई तक माननीय वित्त मंत्री ने प्रेस वार्ता ली हैं कृषकों के ऐसे कानूनों के विषय में। एक प्रेस वार्ता है 15 मई, 2020 की। जून में आप जानते हैं अध्यादेश आ गया था, ऑर्डिनेंस। एक लेशमात्र भी संकेत नहीं है कि इस प्रकार के अखिल भारतीय केन्द्र सरकार के तीन कानून आने वाले हैं कि हमें वाजपेयी जी ने या किसी और ने मॉडल एक्ट बनाए थे 2017 वाले, वो नहीं आ रहे हैं या उनको हम भूल गए हैं, कहीं भी ये संकेत तक नहीं है। अचानक इसलिए सरकार के अंदर भी उतनी ही अचानक बात है, जितनी सरकार के बाहर। बिना किसी कंसल्टेशन के और आप उच्चतम न्यायालय के ठीक 180 डिग्री विपरीत कह रहे हैं। इससे ज्यादा भर्त्सना योग्य कंडक्ट कैसे हो सकता है?

Dr. Abhishek Manu Singhvi said- Friends, This is a serious example of the Central government misleading the Hon’ble Apex Court and misrepresenting to the people of India. The passage of legislations is an act of deception, dupery, and defrauding.

  1. On 11.12.2020, Ms Anjali Bhardawaj applied for RTI seeking the information at Pg 1 of her application, as follows:

“1. As per the decision taken in the meeting of the committee of secretaries (CoS) held on 10th January, 2014 regarding the prelegislative Consultation Policy (PLCP), every Department/Ministry is required to proactively place in the domain all proposed legislations for a minimum period of 30 days. Kindly provide information (indicating the exact website address) where the following were proactively made available as per the PLCP.

a)Farmers Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Ordinance, 2020 the farmers (empowernment and Protection) agreement on price Assurance and Farm services Ordinance, 2020 and the essential commodities (Amendment) Ordinance, 2020.

  1. b) Farmers Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Act, 2020 the farmers (empowernment and Protection) agreement on price Assurance and Farm services Act, 2020 and the essential commodities (Amendment) Act, 2020.

2.The central Informatio n Commission in its decision (CIC/SG/C/2010/0003450004000/8440) dated 7.07.2010, directed that a credible mechanism be put in place for proactive and timely disclosure of draft legislations in the public domain, as required under Section 4(1)(c) of the RTI Act, during the process of their formulation and before finalization. Kindly provide information on procedure adopted to proactively disclose the drafts of the following”

  1. The response to the above on 22.12.2020 was “this CPIO does not hold any record in this matter.”
  2. Another RTI was filed by the same person on 15.12.2020 seeking the information listed at Pg 1 of her application, as follows:

“1.Dates of all consultations held to discuss the proposed laws prior to the promulgation of the Ordinances in June, 2020.

  1. Copy of Minutes of all meetings/Consultations held to discuss the proposed laws prior ro the promulgation of the Ordinances in june, 2020.

3.List of persons who attended each of the meetings/consultations held to discuss the proposed laws prior to the promulgation of the ordinances in june, 2020

4.List of experts and farmer groups with whom consultations were held on the proposed laws prior to the promulgation of the ordinances in june, 2020

5.names of States with whom Consultations were held on the proposed laws prior to the promulgation of the Ordinances in june, 2020.

6.copy of comments/communications sent by the states with whom consultations were held on the proposed laws prior to the promulgation of the Ordinances in june, 2020.”

  1. On 22.12.2020 this was also disposed of in the same words

“this CPIO does not hold any record in this matter.”

  1. An affidavit verified on 11.01.2021 and attested by the Secretary in the Govt of India in the Ministry of Agriculture and Farmer welfare was filed in the Hon’ble Supreme Court. .
  2. In Para 2 of this Affidavit, the Modi Government stated that the Affidavit is being filed “for the purpose of dispelling the erroneous notion that the protestors have peddled that the Central Government and the Parliament never had any consultative process or examination of issues by any Committee before passing of the laws in question
  3. A similar statement is repeated in Para 3.
  4. The only details given in this regard in the same government affidavit are
  5. In Para 10, reference is made to setting up of the so called Guru Committee in Dec, 2000.
  6. Reference is made in para 12 to the Model APMC Act in 2003 and Rules thereafter.
  7. Reference is made again in para 12 to the Report of Empowered Committee of some state ministers in 2013.
  8. Reference is made in para 13 to the Working Group on agricultural production in 2010.
  9. Reference is made in para 14 to the Draft Model Act of 2017 circulated to all states for adoption titled “The State Agricultural and Livestock Marketing (Facility and Development) Act, 2017”
  1. Thereafter the Affidavit straight away jumps to the following quoted conclusions in Para’s 17 and 20 as quoted below:

“17. It is submitted that Government of India has been, thus, actively and intensively with the States for about two decades to achieve objectives of reforms to provide accessible and barrier free market system for better price realization but states either showed reluctance to adopt the reforms in true spirit or made partial or cosmetic reforms.”

“20. The above referred would show that there had been an elaborate consultative process and procurement of views of various programs faces by the farmers through the committee and no harried decision is taken.”

  1. No other information or details are given in the affidavit regarding pre-legislative consultations.
  1. The following averments in Para’s 38, 39 and 40 (i) are also relevant:

“38. That the facts stated in this affidavit are true and correct to my knowledge based on record maintained by the office of the deponent.

  1. The above referred Affidavit is filed only to remove a deliberate wrong perception created systematically by non-farmer elements present at the protest site and using media/social media and to apprise this Hon’ble Court with true facts.

“40 (i)            The legislations are not hurriedly made but is a result of two decades of deliberations.”

  1. It is thus clear that there are serious attempts at prevarication, distortion, misrepresentation and misleading of the nation, the Hon’ble Apex court and all relevant stakeholders, apart from indulging in blatantly contumacious conduct. Not even perfunctory, much less any meaningful pre legislative consultation was attempted, much less done by the Modi government.
  1. Subsequently, these evil laws were rammed down the throat of Parliament and all discussion, analysis and interaction was guillotined in the temple of democracy.
  1. It is thus clear that the government has attempted to fool all the people of India all the time by practising falsehoods on stilts. Unfortunately, they have not even spared the Hon’ble Supreme Court.
  1. These developments show that there is no coherence in what the government says and what it does.
  1. Furthermore, the following illustrates how there was in-fact a volte-face and somersault by the government in suddenly proposing the three evil farm laws, without any pre consultation whatsoever and in complete and stark variance from the intention of the governmentitself prior to the sudden presentation of these bills in Parliament.
  1. Well aware of the serious lack of legislative competence in the Central Government in passing uniform all India Acts like the three evil Acts presently under discussion, the government, both in 2003 and  on December, 23, 2017 was content in proposing Model Acts, leaving it to the respective state governments to choose or not to choose to adopt such model law. The content of such model laws was also different from the current three enactments as passed without discussion in Parliament.
  1. The Hon’ble Finance Minister’s press conferences on 15.05.2020 and other Government statements thereafter, also gave no indication or suggestion of the content and contours of the three evil laws introduced in Lok Sabha in September 14, 2020, passed in Lok Sabha on September 17, 2020, passed in Rajya Sabha on September 20, 2020 with presidential assent accorded on September 24, 2020.
  1. It is thus clear that the three evil laws were a surprise to all, both within and outside the government and there could be no possible pre legislative consultation in this regard.
  1. The Acts highlight the government’s mastery in flimflam, fabrication and fraudulence.

एक प्रश्न पर कि आपने कहा कि इस केस में अवमानना का मामला भी बनता हैक्या आपको लगता है कि इस तथ्य के आधार पर इस मामले की सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती हैडॉ. सिंघवी ने कहा कि देखिए, सबसे बड़ा सुप्रीम कोर्ट है, कचहरी और कोर्ट जनादेश का। जहाँ पर सॉवरैन्टी होती है, जहाँ पर मूल अधिकार होता है, वहाँ से बात शुरु होती है देश की। तो हमने तो उसके सामने खुलासा किया, वो आप लोग हैं, आपके जरिए उस जनादेश पर संदेश जाना चाहिए, प्वाइंट नंबर वन।

प्वाइंट नंबर दो, आप बिल्कुल सही कह रहे हैं कि आपने सीपीआईओ में कहा कि मेरे पास कुछ नहीं है, लेकिन आपके पास तो अधिकार क्षेत्र था कि जो आप हलफनामा सोमवार को फाइल कर रहे हैं, उस पर दे देते आप। पहली बात तो सीपीआईओ गलत नहीं कह सकता। क्योंकि सब मंत्रियों का, सब मंत्रिमंडल की उसको सूचना होनी अनिवार्य है, लेकिन अगर कुछ रह गया होता, अगर कुछ सच्चा होता तो उस हलफनामे का, जिसका मैंने विवरण किया 7 पैरा ग्राफ का, उसमें एक शब्द तो लिखा होता कि जून में ये अध्यादेश पास हुआ 15 मई को, श्री रमन के साथ और उनके बाकी कृषकों के साथ ये मीटिंग हुई। सिंगल वाक्य, कहानी शुरु करते हैं 2000 से, 20 वर्ष पहले और 2 और कहानियां हैं, 2003 और 2017 बस। नंबर तीन, निश्चित रुप से जो याचक हैं, उनको भी ये बात मालूम पड़ेगी हमारी इस आज की प्रेस वार्ता से वैसे भी और उनको पूरी तरह से अधिकार क्षेत्र है कि वो उठा सकते हैं इस बात को। ये अलग बात है कि उच्चतम न्यायालय ने इस वक्त एक सीमा डाल दी है ऐसे कानूनों पर। लेकिन ये तो बहुत गंभीर एक देश के साथ मजाक है और उच्चतम न्यायालय के साथ भी मजाक है। तो निश्चित रुप से कोई भी याचक है, वहाँ पर जो पार्टियां हैं, जो कर रही हैं दलील, उसको उठा सकती हैं।

एक अन्य प्रश्न पर कि लगातार सरकार कह रही है कि हम बातचीत कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट ने भी कमेटी बनाने का एलान कियाहालांकि किसान संगठन वहाँ जाना ही नहीं चाहतेतो उस कमेटी की लीगल और मोरल सेंक्टिटी कितनी रह जाएगीडॉ. सिंघवी ने कहा कि मैं उच्चतम न्यायालय के ऑर्डर के विषय में कहना आवश्यक नहीं समझता, क्योंकि वो ऑर्डर जो है, वो हो गया है। मैं सिर्फ आपको याद दिलाना चाहता हूं कांग्रेस के पुराने स्टैंड का, जो हमने सार्वजनिक रुप से रखा है आपके समक्ष कि कानून एक अलग दायरा होता है और जनहित एक अलग होता है। कानून एक अलग दायरा होता है और नैतिक रुप से सही होना कोई कानून, एक अलग दायरा होता है। मैं इस कानून की बात बिल्कुल नहीं कर रहा हूं, मैं एक उदाहरण दे रहा हूं आपको, कई कानून वैध हो सकते हैं, लेकिन जरुरी नहीं कि जनहित के हों। वैधता बहुमत पर भी निर्भर करती है। कई कानून अवैध हो सकते है, क्योंकि कानून में कुछ रह गया हो, त्रुटि रह गई हो, लेकिन वो जनहित भी हो सकते हैं। तो पहली बात तो मैं ये कहना चाहूंगा कि ये दोनों चीजें मिक्स नहीं होनी चाहिए।

दूसरा, हमारा ये मानना था शुरुआत से कि ये चीज एक जनहित की है, एक कृषि हित की है, एक नैतिकता की है, ना कि कानून की। ये हमने उच्चतम न्यायालय के आदेश के पहले भी कहा है और मैं उसको दोहरा रहा हूं।

नंबर तीन, उच्चतम न्यायालय के आदेश में निश्चित रुप से ज्यादा मजबूती होती, दम होता और एक प्रभाव होता अगर ये चौंकाने वाली खबर नहीं आई होती कि जो चारों नाम हैं, मैं नामों की बात कर रहा हूं, समिति की बात नहीं कर रहा हूं, समिति तो एक अलग चीज बनी है। मैं व्यक्ति विशेष की बात कर रहा हूं या व्यक्तियों की बात कर रहा हूं। अगर इतने सार्वजनिक रुप से, जिन्होंने अपना मत रख दिया है लिखित रुप से, जो आपको और हमें कहीं भी मिल जाए देखने और पढ़ने में, तो निश्चित रुप से उस समिति का जो नैतिक प्रभाव है और जो उसका वास्तविक प्रभाव है, दोनों, ये तो कॉमन सैंस से भी कम होंगे ही होंगे।

नंबर चार, ये इस पर मुझे टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ये निर्णय सिर्फ उन पार्टी का होगा कि हम जाएंगे ही नहीं उस कमेटी के सामने। ना कांग्रेस उसमें पार्टी है, ना कांग्रेस पार्टी बनना चाहती है। लेकिन निश्चित रुप से आप किसी को भी किसी के सामने जाने के लिए बाध्य नहीं कर सकते, आपके ऊपर विकल्प होता है, ऑप्शन होता है और किसी भी कारण से, उनमें से बिल्कुल एक कारण ये रहा होगा, जो मैंने आपको नैतिकता का कहा। अगर आप नहीं जाना चाहते किसी समिति के सामने, तो ये आपका अधिकार क्षेत्र है। ये चार बिंदु आपको ध्यान रखने चाहिए उत्तर में।

On a question about a committee constituted by the Supreme Court, Dr. Singhvi said- Let me just clarify that it is not necessary now for me to comment on the Supreme Court orders which has already stands passed. I only want to remind you of our stand taken publically from this forum, well, prior to the Supreme Court order of Yesterday, which was that law and public interest or law and morality can do operate in different spheres in many cases.

A law may be valid, but, not necessarily in public interest, it may be legally valid, it may be technically valid, it may be constitutionally valid, that does not automatically become a proof of public interest. Indeed, I would go to the extent of saying that a law, when become invalid on a technical ground, on a lack of procedure, on a lack of competence, but, it may be usually in public interest, there have been examples like that.

So, the second point we had made was and according to us from inception firstly, the way these laws were passed, secondly the way completely any interaction with the nation was abdicated, which I have proved today again and thirdly, the fact that there is no competence according to us in the Central Government to take up this issue at all.

These three things from inception we have felt, were matters of both morality, of public interest, of emotion, which is totally separate from law and an addition to law.

Thirdly, coming now to the court order yesterday, there can be no doubt that any efficacy, strength, effect of any court’s order including the Apex Court, would be much higher and much stronger in comparison to the startling revelation, which came yesterday itself, that the names of the individual concerned appeared to have declared their pre-existing support in writing for these laws. Nobody is saying that you are not entitled to have a view. Certainly, I can have, you can have argued in favour of the view which can be totally opposite. It is a free country, certainly the Supreme Court would have a bona-fide thought of it, but, ultimately the bottom line is, if the individuals concerned have pre stated, pre existing views on a sensitive subject like this, then obviously the efficacy of the strength of those individual views, or the stature of those individuals would be diminished in the context like this and lastly, as far as attendance or participation is concerned, it is not for the Congress to contest, it is not a party in these proceedings. The Congress only wants to say that it is entirely open to those, who find lack of faith in the committee, or lack of interest in their pre-existing stands to join or not to join and that is not something which I can either prohibit or compile.

Sd/-

(Dr. Vineet Punia)

 Secretary

Communication Deptt,

AICC

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