Modi Government’s Diplomatic Failures Responsible for Pitiable Condition of Indian Students in USA

ALL INDIA CONGRESS COMMITTEE

24, AKBAR ROAD, NEW DELHI

COMMUNICATION DEPARTMENT

Highlights of Media Bite 08 July, 2020
Dr. Abhishek M Singhvi, RS MP & Spokesperson, AICC addressed the media via video conferencing today.
डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि हम एक व्यापक मुद्दा, बल्कि कई मुद्दे जो एक साथ मिलकर और भी व्यापक हो जाते हैं; आपके जरिए आज वो उठाने का प्रयत्न कर रहे हैं। क्योंकि इसमें जो ज्यादा व्यापकता, लार्जर इशू है, वो ये है कि आप दिनभर हमें सीख देते हैं, उपदेश देते हैं, बड़े-बड़े जुमले देते हैं कि भारत की पैठ ये है, आन ये है, बान ये है, मान ये है, राष्ट्रवाद ये है, छाती 56 इंच की नहीं 65 इंच की है। लेकिन सच्चाई क्या है कि उधर जहां हमें आम जीवन पर, विद्यार्थी के जीवन पर छूता है तो अमेरिका ऐसे ऐंठ कर रहा है, जैसे भारत नाम का कोई देश ही नहीं है। जहाँ हमें आम आदमी के लिए तकलीफ होती है, दर्द होता है, वेदना होती है। वहाँ कुवैत हमारे श्रमिकों के विषय में एक अपने आप निर्णय लेता है, जिसमें कोई कंसल्टेशन नहीं है, कोई आपसी विचार-विमर्श नहीं है। हमारी पैठ कहाँ हैं, हमें पता नहीं है। अमेरिका के H-1B वीज़ा में चार में से तीन भारतीय इन्वोल्वड हैं, वो भी एक तरफा निर्णय ले लेते हैं। हमारी भारत की डिप्लोमेटिक पैठ कहाँ हैं? हमारी आर्थिक शक्ति कहाँ हैं? हमारे सुपर पॉवर के देश की छवि कहाँ है? ये प्रश्न हम आपके जरिए उठाना चाहते हैं। मैंने इसलिए कहा आपसे ना पूर्व, ना पश्चिम मोदी जी दोनों दिशाओं में हमारी पैठ नहीं है। एक तरफ अमेरिका सुनने को तैयार नहीं है, दूसरी तरफ कुवैत सुनने को तैयार नहीं है, सबसे बड़ा और सबसे छोटा देश।
Let me start with this most recent, सबसे हाल में जो हुई चीज है कि विद्यार्थियों को बिना किसी कारण, बिना किसी गलती, बिना किसी स्त्रोत, बिना कुछ किए अगर यूनिवर्सिटी ऑनलाइन कोर्स करती है, तो सैंकड़ों विद्यार्थी त्रिशंकु की तरह बीच में खड़े हो जाएंगे, ना इधर के रहेंगे, ना उधर के रहेंगे, ये सूचना आई है। अब मेरा प्रश्न है अपने आपसे, आपसे, देश से कि ये क्या सरकार का सरकार के स्तर पर, मैं तो समझता हूं क्या आम शिक्षा मंत्रालय के स्तर पर इतनी छोटी चीज सॉर्ट-आउट नहीं हो सकती थी? आपको ध्यान रहे कि मैं एक विद्यार्थी हूं, जिसके पास वीज़ा है। ये नहीं कि मैं वीज़ा के बिना हूं। आज मुझे मझधार में छोड़ दिया जाता है, क्योंकि किसी ने ऑनलाइन कोर्स बदल दिया। ये पूरी स्थिति, नीतिगण निर्णय यूएस की सरकार लेती है जो जानती है की चीन और भारत के, इन दो देशों के विद्यार्थी संख्या में सबसे ज़्यादा हैं। अब आपको इसके बारे में इल्म नहीं है। आपको होने के बाद ये मालूम पड़ता है कि ये कर लेंगे, वो कर लेंगे, बातचीत करेंगे, बातचीत चल रही है। आपको मालूम है कि उस कोर्स का जो वार्षिक समय है, वो कितनी जल्दी शुरु होने वाला है? कितनी जल्दी अंत होने वाला है? लोगों को तैयारियां करनी पड़ती है, लोगों को जाना पड़ता है, लोगों को ट्रैवल करना पड़ता है। उनके माता-पिता के लिए, परिवारों के लिए कितनी ज्यादा अननिश्चितता है, बच्चों के लिए कितनी अनसर्टेनिटी है। ये एक बहुत बड़ा मानवीय इशू है। इसमें भारत सरकार सोती हुई पाई गई है। भारत सरकार को बहुत जबरदस्त, बड़े पैमाने पर हल्ला करना चाहिए था और वो सभी चीजें जो शैक्षिक हों, डिप्लोमेटिक हों, आर्थिक हों, स्ट्रैटेजिक हों, जो भी हों; उसका बहुत पहले इनका हल करना चाहिए था। अब कम से कम तुरंत भविष्य में हमें बता कर अवगत करके करना चाहिए।
नंबर दो मुद्दा– ये तो भारत से ज्यादा किसी देश से संबंधित नहीं है कि आप चार में से तीन लोग जो भारतीय हैं, उनके लिए अचानक एकपक्षीय नीति द्वारा लगभग 85 हजार लोगों या H-1B वीज़ा होल्डर को दुष्प्रभाव कर लेते हैं। इसमें भी वही हुआ, ये थोड़ा पुरानी है, ये सबसे रिसेंट नहीं है। जिसमें हम पिछले कई हफ्तों, महीनों से कुछ कर नहीं पाए। आपको बताया जाता है कि कितने प्रभावशाली हैं हम, कितना हमारे अंदर जैसा मैंने बताया प्रभाव रखते हैं। लेकिन जमीनी सच क्या है, H-1B वीज़ा वो है जो भारत की मूल लोग जो सबसे प्रज्वलित कर रहे हैं, भारत का नाम रोशन विदेश में कर रहे हैं, वो इस्तेमाल कर रहे हैं। सबसे ज्यादा पैसा भेजते हैं, सबसे ज्यादा फेमस माने जाते हैं, निष्ठावान जिन्होंने अपनी एक छाप अमेरिकन सोसाईटी, समाज में बनाई है, उनके ऊपर आपने ऐसा प्रहार होने दिया? मैं विनम्रता से कहूंगा माननीय मोदी जी ये बड़े-बड़े रोड़ शो अमेरिका में, ये बड़े-बड़े हाथ मिलाकर ताली बजाने वाले, स्टेज पर ह्युस्टन उत्तर अमेरिका में इवेंट मैनेजमेंट का सही जमीनी सच ये है। इसका जवाब देश मांगता है, क्योंकि ये इनके पेट में, इनके परिवारों के पेट पर, भारत की छवि पर यह सीधा आघात है।
तीसरा इसमें पहलू है कि एक तरफ तो पैंडेमिक (महामारी) की हालत चल रहे हैं और उससे ज्यादा पैंडेमिक की आप जानते ही हैं, पैंडेमिक को एक बार आप छोड दीजिए, कोरोना से पहले ही, जनवरी के पहले ही क्या रोजगार की फिगर है, मैं अंत में दूंगा आपको। पैंडेमिक के बाद जो हालत है, वो एक एडिशनल चीज है। लेकिन इसके दौरान कुवैत ने सीधा जिसकी पूरी आर्थिक स्थिति हम पर आश्रित है, जो हम पर निर्भर है, जिस देश को हम उठाए हुए हैं अपने कंधों पर, जहाँ पर 70 प्रतिशत इस प्रकार के श्रमिक भारत से हमारे दक्षिण भारत के दोस्त बहुत हैं वहाँ पर; तमिलनाडु और केरल दो विशेष प्रदेश हैं, लेकिन और भी भारत में हैं, इन सबका आप अचानक एक कोटा बांध देते हैं। कोटा ये है कि 10 लोग हमारे देश में टोटल जनसंख्या है, हम इसमें से 3 लोग से अधिक रखेंगे नहीं बाहर से, तीन लोगों का जो अनुपात होगा, उसके अनुसार आपके 8 लाख बाहर चले जाएंगे। 8 लाख भारतीय, उस देश की पूरी पोपुलेशन है 14.5 लाख। ये आपको याद रहे, पूरी पोपुलेशन।ये आपको याद रहे, पूरी पोपुलेशन। तो उसमें से आधी पोपुलेशन भारतीयों की निष्कासित, डिपोर्टेशन, एक्सट्रैडिशन, निकालना, देश निकालना, जो भी कह दीजिए आप, क्या कर रही थी सरकार? माननीय मोदी जी इतना यूएई जाते हैं, अवार्ड मिलता है, कभी वहाँ से अवार्ड लेते हैं, कभी देते हैं, इतनी बड़ी बातें होती हैं और कुवैत जैसा सिर्फ देश की साइज और उसकी आर्थिक स्थिति नहीं है, वो पूरी तरह से हमारे कारण उन्नति कर रहा है इन लोगों पर, ना पूछ, ना ताछ, ना वेट, एक नीति बनी, कानून पास हुआ, उच्चतम उनकी असेंबली है, वहाँ पर पारित हुआ, संवैधानिक करार किया गया, आप क्या कर रहे थे? ये महत्वपूर्ण प्रश्न हैं, क्योंकि ये हम भारतीयों के प्रश्न हैं? आप पूछिए अपने केरल वाले दोस्त से, अपने तमिलनाडु वाले देश से, उसके पेट पर कैसी लात है? सबसे सिंगल ज्यादा समुदाय जो इससे दुष्प्रभावित हुआ है, वो भारतीय हैं।
अंतिम बात, आप जानते हैं, लेकिन उसको परिप्रेक्ष्य और संदर्भ में डालना आवश्यक है। ये सब कब हो रहा है- ये सब हो रहा है एक संदर्भ में। उसका संदर्भ है एक जनवरी से पहले, एक जनवरी के बाद। अभी आप कोरोना का बहाना नहीं बना सकते, इसलिए मैं जनवरी के पहले की बात करता हूं, नहीं तो आप शुरुआत कर देते हैं कोरोना का बहाना बनाने की। बिना कोरोना के आपको मालूम है कि कितने रोजगार इस देश में सीएमआईई का आंकड़ा आपके पास है; सबसे ज्यादा गिरावट रोजगार की हमारे देश में अब हुई है और आज भी जो आंकड़ा ऐब्सलूट रोजगार का है 2020 में, वो ऐब्सलूट आंकड़ा 2019 से कम है। मैं आपको बता देता हूं, ये आंकड़ा पिछले वर्ष में था 40.4 करोड़ रोजगार, पिछले फाइनेंशियल वर्ष में, इस वर्ष में है 37.4 करोड़। हम रेट ऑफ ग्रोथ अनइम्पलोयमेंट की बात नहीं कर रहे हैं। हम रेट ऑफ ग्रोथ अनइम्पलोयमेंट कम होने की बात नहीं कर रहे हैं। अब ऐब्सलूट फिगर में रोजगार गिर रहा है, तो एक तरफ तो ये हो रहा है। दूसरी तरफ अप्रैल में कोरोना के बाद 12 करोड़ एक महीने में नुकसान हुआ है। अब ये बात एक महीने में है 12 करोड़ रोजगार की। अब ये बात सही है कि मई और जून में बहुत जबरदस्त फायदा हुआ है रोजगार का, 7 करोड़ का और ये मैं बताना चाहता हूं आपको। मोदी जी चाहें तो हमें प्रणाम करें, देश को प्रणाम करें कि मनरेगा है। ये 7-8 करोड़ 12 में से 90 प्रतिशत कृषक मनरेगा पर आधारित, डेली वेजर इत्यादि लोग हैं। 12 करोड़ जो लात पड़ी है देश पर वो पड़ी है अर्बन लोगों पर, शहर वाले लोगों पर, ऐसे रोजगार जो वापस नहीं आए हैं, एमएसएमई को, सेल्फ इम्पल्योड को, इंडिविजुअल को, वो वापस नहीं आए हैं। जो वापस 7-8 करोड़ आए हैं, वो मनरेगा की वजह से आए हैं, जिसकी वजह से आप हमें गालियां और जुमले सुना रहे थे कुछ वर्ष पहले।
तो ये 4 पक्ष हैं, इनको अगर आप जोड़िए तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की मानहानि हो रही है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आप चुन-चुन कर भारत के उन वर्गों पर दुष्प्रभाव कर रहे हैं, प्रहार कर रहे हैं, आघात कर रहे हैं, जो अपने श्रम से, अपने हुनर से भारत का नाम रोशन करते हैं और कई दशकों से करते आए हैं। डोमेस्टिकली, लोकली आज रोजगार पर लात एक के बाद एक पड़ रही है। उसके दौरान ये हो रहा है कि आपके देश में जो हाई वेल्यू, वाईट कॉलर अर्नर हैं, जो ब्लू कॉलर अर्नर हैं, दोनों पर अत्यंत दुष्प्रभाव हो रहा है। इन सबके बीच में आपके पास कोई हल नहीं है। आपने कोई नीति नहीं बनाई। प्रधानमंत्री जी सब काम को छोड़कर अमेरिका और कुवैत इसके लिए जाना चाहिए। आपने एक भी कोई ठोस चीज क्या की, जिससे कि ये नीतियां वापस ली जाएं? करोड़ों-लाखों भारतीय एक आवाज में ये प्रश्न का उत्तर मांग रहे हैं, लेकिन जवाब की जगह सन्नाटा मिल रहा है।
Dr. Abishek Mani Singhvi said-
ना पूरब ना पश्चिम, मोदी जी की कहीं नहीं है पैठ,
ना सुनने को तैयार अमेरिका, और ना ही कुवैत।

तुम भूखे-प्यासे जब चले सडक-सडक हज़ारों कोस,
जब तुम माँग रहे साधन, वो बतला रहे Corona का दोष ।

Pitiable Condition of Indian Students in USA
The Department of Immigration and Custom Enforcement(ICE) told the states department that students, whose classes are going completely online, will not be issued visas for the next semester nor will such students be allowed entry.
The ruling applies to specific types of visa issued for academic study.
According to the ICE, F-1 students participate in academic course work, while M-1 students are students of ‘vocational coursework’.
The US had more than one million international students doing various graduate and undergraduate programmes in 2018-19, according to the Institute of International Education (IIE). That’s about 5.5% of the total student community in the country.
Out of these, nearly three-quarters are from Asia – 48% Chinese and 26% Indians.
The IIE says that, according to the US Department of Commerce, international students contributed $45bn (£36bn) to the country’s economy.
The US embassy said in an official alert issued on its website that the US mission has been canceling all types of appointments involving immigrant and non-immigrant visas since March 16 in light of the global Covid-19 epidemic.
According to the Institute of International Education (IIE), there are more than 1 million international students in the US for the 2018-2019 academic year. Which includes a large number of countries like China, India, South Korea, Saudi Arabia and Canada.
Failure of Indian Foreign Policy on H1B Visa
US government figures show that last year, more than 373,000 of these visas were granted.

The US issues 85,000 H1-B visas every year out of which Indians reportedly get about 60,000 visas ie 70% of total H-1B visas issued, annually.
The move will impact nearly 85,000 workers who were issued H-1B visas this year out of 2,25,000 applicants.
What is the government strategy on this issue?
Is It the failure of Indian Diplomacy?
Why hasn’t the govt settled the issue with their so called friend Donald Trump?
What will happen to all those money coming in from USA?
Kuwait Approves Draft of Migrant Quota Bill, 8 lakh Indians may have to leave the Kuwait-
3.1 According to the bill, Indians should not exceed 15% of the population.

3.2 Ministry of External Affairs of India estimates that as of December 2018, the six countries of the GCC are home to more than 8.5 million Indians.
3.3 The Indian community is the largest expatriate community in Kuwait, with a total population of about 1.45 million (14.5 lakhs). Kuwait has a population of 4.3 million.
3.4 Kuwait has a population of 4.3 million. Significantly, after the coming out of the Corona epidemic, a period of rhetoric between MPs and government officials has been gaining momentum in Kuwait to reduce the number of foreigners.
120 million jobs lost in April due to lockdown- More than 12 crore people lost their jobs across the country due to the lockdown imposed
4.1 According to data from the Center for Monitoring Indian Economy, CMIE, more than 2 Crore jobs have been received in May and 7 crore in June. Accordingly, of the 12.2 Crore jobs lost due to the lockdown in April, 9.1 crore jobs have come back.
4.2 In the lockdown, when jobs were going out from all sectors, jobs were increasing in farming, in May-June it brought more than 1.14 crore jobs.
4.3 The condition of salaried class people who lost jobs in lockdown was very bad, 3.5 Crore jobs were lost in two months, but only 39 lakh jobs were received in June.
A study by Indira Gandhi Institute of Development Research says that at the time of Lockdown-1 and Lockdown-2, 19.5 crore workers were threatened.
On two questions about the exploitation of girls by mining mafia in Chitrakoot and MHA setting up an inter-ministerial investigations committee for Indira Gandhi & Rajiv Gandhi foundations, Dr. Singhvi said- I compliment you on the combination from the divine to the comic. First question is surely divine because you have raised excellent social issue. You have raised an excellent social issue, I have only briefly seen it, I was shocked and if your investigative journalism is even fractionally correct, which I am sure it is, it is the most reprehensible, disgusting thing and in your own thing, which I saw cursorily, the powers that be seem to be have no idea of what is happening, they are blissed in their ignorance. I think this should be followed up, this should be persisted, I would compliment you in having done it, but, It should not be left mid way, because it again shows the UP Government, India’s largest state government in a very-very hypocritical and poor light. Here is a Government which into homilies, if they had spent 1/10 of the time in not harassing anti-CAA protesters, not trying to confiscate their property and have paid attention to normal Government issues, at least, this might not have been cured, but, it might have been revealed and exposed much earlier. Today, there is a Government of tough talk, Rambo talk, no Governance and self praise and self congratulatory, chest thumping. I think your expose is one clear aspect of all these failures.
On second question, I will say that first of all, the Rajiv Gandhi foundation has nothing to add, nothing to fear, because you have all the Yantras and the Tantras and you ask every question in every enquiry, because we are here as law abiding persons to answer, but, you need to be exposed fully that you don’t even ask these questions of many holy cows, you please ask us, please enquire all that you like, you are harassing each opposition segment, individual or institutional and if you are not do it, people would believe this is not your ‘Chal, Chehra and Pehchan’, but, due to that ….(inaudible) questions like 9th schedule exemptions, like blue eyed, sanctified holy cows, don’t get asked of Vivekananda foundation, don’t get asked of Overseas Friends of BJP foundation; don’t get asked of India foundation, for that matter, don’t get asked in much larger quantum’s of money from the RSS. I have given only four examples, I can multiply them.
Whose favourite blued eyed boys and girls are there, whose special arc of protection they enjoy. The country exposes you each time you ask this question of RGF and RGF answers by giving you truck loads of audited papers, taxed papers and RGF continues with sterling NGO work without cowed down to your pressure, each time you do it, the nation asks you, have you asked single similar question to any of the entity, I have asked the names of?
इस देश में कोई ना कोई बराबरी, इस देश में कोई ना कोई समतल जमीन है, क्या उसके लिए बीजेपी की सदस्यता लेना, क्या भक्त का बैज पहनना आवश्यक है? भक्त का बैज पहनना या सदस्यता लेना है, तब तो आप एग्जंप्ट हों, चाहे आप विवेकानंद फाउंडेशन हो, उत्तर तो दूर की बात है, उत्तर की बात नहीं कर रहा हूं, प्रश्न भी नहीं पूछते हैं आपसे। इंडिया फाउंडेशन हो, आरएसएस हो, आप जिन रुपयों की, आयात की बात कर रहे हैं क्वांटम की, उससे 100 गुना ज्यादा फिगर की बात मैं कर रहा हूं, 5-10 गुना नहीं, 100 गुना, लेकिन आप प्रश्न नहीं पूछेंगे, क्योंकि ये एक विशेष सुरक्षा चक्र है, एक विशेष स्नेह है, ये एक विशेष संबंध है, ये एक विशेष भय है कि ऐसे भक्तों से हम ऐसे प्रश्न नहीं पूछ सकते हैं। मैंने चार नाम बताए आपको – आरएसएस, विवेकानंद, ओवरसीज फ्रैंड्स ऑफ बीजेपी एंड इंडिया फाउंडेशन। अगर हिम्मत है, हमसे जरुर लीजिए, हम तो आ गए हैं, हम तो ट्रक लोड भेजने वाले हैं, लेकिन हिम्मत है, अगर आप उनसे आंख से आंख मिलाकर बात कर सकते हैं, इन लोगों को जिनको आप संविधान के ऊपर समझते हैं, सिर्फ उनसे आंशिक 5 प्रतिशत वही प्रश्न पूछ कर देखिए और उत्तर देश के साथ शेयर करिए।
एक अन्य प्रश्न पर कि बीजेपी कह रही है कि हम राजनीति नहीं कर रहे हैं, दूसरा कांग्रेस पर गैर जिम्मेदार विपक्ष का आरोप लगा रही है कि जब आपदा आती है तो विपक्ष सरकार के साथ खड़ी नहीं होती है? डॉ. सिंघवी ने कहा कि मैं ऐसे आरोप और टिप्पणीयों को भद्दा समझता हूं। अगर आप नहीं पूछ रहे होते तो जवाब भी नहीं देता। मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं, मेरे पास एक नहीं हजारों उदाहरण हैं, पूरी लिस्ट आपको भेज सकते हैं, एक उदाहरण कल दिया था, आपको याद है माननीय मोदी जी के प्रश्न…. सबसे बड़े राष्ट्र विरोधी तो मोदी जी थे, कल ही हमने आपको बताया वो ट्वीट, अगर आपको याद है, वो एग्जेक्ट ट्वीट हमने आपको कल दिया है। कौन बोल रहे थे, मोदी जी, तो मुख्यमंत्री मोदी अलग हैं, प्रधानमंत्री मोदी अलग हैं, विपक्ष में मोदी अलग हैं, ये दुभांत, ये दोगली आवाज, इस हिपोक्रेसी का सीधा उदाहरण हैं। हमने बहुत पहले आपसे राष्ट्रवाद के सबक सीखना बंद कर दिए हैं, हमने बहुत पहले आपके तौर तरीके हैं, जिससे आप अपने घपलों को छुपाना चाहते हैं, अपने मिथ्या प्रचार को कंट्रोल करना चाहते हैं, ऐसे वाक्य बोलकर हम उनके इम्यून हैं, हम परवाह नहीं करते, ना हम डरते हैं, इसलिए अपना तौर तरीका, अपना तर्क बदलिए, देश को तर्क पर या तथ्य पर जवाब दीजिए। हम आपसे पूरी जिरह कर लेंगे, मान भी लेंगे, लेकिन आपका जिरह एक ही है कि प्रश्न क्यों पूछते हैं। आपका जिरह ये नहीं है कि तथ्य क्या है, लेकिन प्रश्न क्यों पूछा, आपकी हिम्मत कैसे हुई, क्योंकि मैं, me,  I, उनसे प्रश्न नहीं पूछ सकते, वो प्रश्नों से ऊपर हैं, गणतंत्र के ऊपर हैं, संविधान के ऊपर हैं। जहाँ तक आपका दूसरा सवाल था, आप ये समझ लीजिए कि 6 वर्ष में आपने कौन सी संस्था, कौन से व्यक्ति या कौन से राजनीतिक व्यक्ति को छोड़ा है, अगर आपने 100 में से 95 किए, 95 से 100 तक पहुंचने के जो 5 बचे हैं, उसके छठे साल तक पहुंच गए तो उसका जवाब है कि आपने कुछ नहीं किया। आपने तो पहले दिन से 2014 से उद्घाटन किया है प्रतिशोध की राजनीति का। इस देश की गौरवशाली गणतंत्र में प्रतिशोध की राजनीति की केन्द्र सरकार में कोई जगह नहीं थी और जब – जब कोई अपवाद हुआ कुछ महीनों के लिए उसका खंडन हुआ और बाद में अंत हुआ। तो प्रतिशोध की राजनीति आप समझते हैं कि सैंट्रल हाल में बैठते हैं, कोई अंधा या बहरा हो उसका पता नहीं, हम तो सांसद हैं 13-14 साल से, आप जरा बात कीजिए, किस दुनिया में रहते हैं आपके दोस्त? ऐसे वातावरण में आप कहते हैं कि प्रतिशोध की राजनीति नहीं है, ये समतल राजनीति है, आज जो आंकड़े हैं, जो क्वांटम है, जो अमाउंट है, वो एक तरफ ऊंट और एक तरफ जीरा के बराबरी नहीं है और आप प्रश्न भी नहीं पूछते और हमें सबक सिखाते हैं बराबरी का, द्वेष का नहीं।
Referring to the tweet by Shri Modi, Shri Pranav Jha added that नरेन्द्र मोदी जी ने कहा कि “China withdraws its forces but I wonder why Indian forces are withdrawing from Indian territory? Why did we retreat?”
डॉ. सिंघवी ने कहा कि ये राष्ट्रविरोधी प्रधानमंत्री कैसे बन गए, ये राष्ट्रविरोधी प्रधानमंत्री कैसे बनाए आपने, क्योंकि ये गलत है, क्योंकि मैं प्रश्न पूछता हूं तो मैं राष्ट्रविरोधी हूं। तो किस आधार पर कोई व्यक्ति जो प्रश्न पूछे गणतंत्र में, वो क्लेम कर सकता है प्रधानमंत्री बनना। आपका उत्तर सामने है, स्पष्ट है।
एक अन्य प्रश्न पर कि आप सरकार से क्यों नहीं चाहते कि सभी फाउंडेशन जो पैसा लेते हैं विदेशों से, उनकी जांच एक साथ हो जाए? डॉ. सिंघवी ने कहा कि आप समझते है कि जो सुरक्षा चक्र वाले फाउंडेशन हैं, जो स्नेह वाले हैं, जो आपके घर के हैं, जो आपके बैकयार्ड के हैं, जो स्पेशल नाइन्थ शेड्यल प्रोटेक्शन वाले एग्जम्पट है, उनकी मांग करने से जांच हो जाएगी? आप या तो बहुत इनोसेंट होंगे या बहुत सरल होंगे। ये तो मैंने आपके सामने 10 बार मांग की, आप समझते हैं कि इससे कुछ होने वाला है। याद रहे कि इस देश में दो कानून हैं, यहाँ तक इस सरकार का सवाल है, दो तो स्पष्ट हैं, कई बार तो 3-4 भी कानून हैं और हम बात कर रहे हैं उस कैटेगरी की, आप बात कर रहे है उस कैटेगरी की, तो किसी स्वप्न लोक में रहकर ऐसा नहीं सोचते।
एक अन्य प्रश्न पर कि ये जो बच्चे विदेशों में जाते हैं, खास तौर से अमेरिका, उसमें 90 प्रतिशत बैंकों से ऋण लेकर जाते हैं, अमेरिकी सरकार की जो नई नीति है, उसको देखते हुए भारत सरकार को इस ऋण पर से ब्याज की छूट होनी चाहिए, जिससे उनके माता-पिता को राहत मिल सके? डॉ. सिंघवी ने कहा कि आपने अच्छा प्रश्न पूछा है, सोच-समझ कर पूछा है, लेकिन जो सरकार इस नीति को नहीं रोक सकी, आप सोचते हैं कि वो ऋण की बात करेगी। अभी तो इनको बचाना है, ये विद्यार्थी हमारे ऐसे हैं, जिनको बचाना आवश्यक है, ऋण की बात तो बाद में आएगी। ये लोग ऋण वाले भी हैं और बिना ऋण वाले भी हैं, लेकिन इन्होंने पूरा वर्ष प्लान किया था, एडमिशन लिया था और ये चीज मैं लेता हूँ तो और चीजें छोड़ता हूँ। तो इनको बचाने की बात पहले आवश्यक है। दूसरा, अगर वो असफल रहते हैं, जो कि मैं बता दूँ आपको, ये करीब 3 महीने से कोरोना हमारे साथ 5 महीने से है, लेकिन 3 महीने से ऑनलाइन कोर्स की बात कोरोना के कारण से चल रही है, ये नहीं कि आज आपने और मैंने पहली बार सुना है अचानक। तो हमारे मूल प्रश्न ये होना चाहिए कि आपको मालूम है कि 4-5 महीने से कोरोना है, आपको मालूम है कि ऑनलाइन की बात हो, यूनिवर्सिटी हैं वहाँ की, सरकार नहीं है वहाँ, पिछले 4 महीने से घोषणा कर रही है, आपको मालूम है कि चीन और भारत दो सबसे बड़े देश हैं इस समुदाय में, आप सो रहे थे क्या? ये आपको नहीं बताते कि आपने इन 4 महीनों मे क्या किया, मैं तो यहाँ तक कहूंगा कि इसका एक कर्तव्य बनता था भारत सरकार का कि वो सीधा अमेरिका यूनिवर्सिटी से बात करें, सरकार तो छोड़ो, आप ऑनलाइन ही तो कर रहे हैं अभी, या तो आप ऑनलाइन तब करें जब आप सरकार माने, आप इस व्यक्ति को रख सकते हैं और उसके बाद अंत में प्रश्न आता है, जब आप असफल हो जाएं कि अंत में ऋण तो करना ही चाहिए माफ, ऋण पर इंट्रस्ट का सवाल कैसे उठता है। इनकी कोई नीति ही नहीं है, सोच नहीं है, कोई अवेयरनेस नहीं है, आभास नहीं है तो आप तो बहुत आगे की बात कर रहे हैं।
On a question about Kulbhushan Jadhav, the Pakistan Media has just announced that the Pakistan Administration is maintaining that Kulbhushan Jadhav has decided not to file review petition, Is Pakistan thereby blocking the chance of review petition of Kulbhushan Jadhav to take the matter on the lines of the case of Sarabjit Singh, Dr. Singhvi said- I think, you should have no expectation and hopes of Pakistan. Even to talk about Pakistan hopefully doing this and hopefully not doing that, is a futile exercise. Pakistan is a completely predictable, gone case as far as such issues of India are concerned. We have to put our faith in the Indian Government and the Government of India’s international blitzkrieg about adverse public opinion. If the Government of India, which must go flat out to see anything so ridiculous to suppose (slightly inaudible) that he could not be given his legal rights, they should move heaven and earth, they should make applications in the ICJ, the matter has not ended. They should create an adverse public opinion globally that how can a man who is defenceless not been allowed to exercise these rights, but, I don’t find the Government saying much on this at the moment. You have raised it, I can understand that it needs some time to act, but, I hope and trust that there is in next few weeks, all of these 3 or 4 things are done without relying on Pakistan.
एक अन्य प्रश्न पर कि सीबीएसई से फेडरलिज्म (Federalism), सेक्युलरिज्म (Secularism), नेशनलिज्म, सिटीजनशिप जैसे विषय सलेब्स से हटा दिए हैं, इस पर कांग्रेस पार्टी का क्या कहना है? डॉ. सिंघवी ने कहा कि ये भद्दा मजाक है, मैं निकट भविष्य में आपके साथ आमुख होना चाहूंगा इसके ऊपर, ये बहुत बड़ा मुद्दा है। हमें अभी मालूम पड़ा है, ये गलत है, भद्दा है, भर्त्सना योग्य है। मैं कुछ संवैधानिक रुप से और मैंने इस पर कुछ दो हफ्ते पहले लिखा है, आपको ये बता दूं कि संघीय फेडरलिज्म ऐसा अजीबों-गरीब शख्स है हमारे संविधान में, जो मूल नैतिक प्रखरता, अभिन्न अंग माना गया है। यानि संघीय ढांचा मूल ढांचे का अभिन्न अंग है, बोमई केस के आगे से इसको होल्ड किया गया है। सेक्युलरिज्म माननीय श्रीमती गांधी, इंदिरा गांधी जी ने प्रिएंबल में डलवाया। ये स्तंभ हैं हमारे संविधान के, सब संस्थापक और नोन संस्थापित स्तंभ हैं, Institutional and Non-institutional Pillars of Indian Democracy. आप क्या संदेश भेज रहे हैं, हमारे बच्चों को आप ये पढ़ा रहे हैं कि ये सब कोई खास मायने नहीं रखते आपकी किताबों में? अरे इनको तो सुशोभित आगे होना चाहिए, इनको तो किताबों के पन्ने के पहले कवर पर, फेडरलिज्म, संघीय ढांचा, धर्म निरपेक्षता, फेटरनिटी, भातृ भाव, ये तो स्तंभ हैं हमारे। तो मैं समझता हूं, मैं बड़े स्पष्ट रुप से भर्त्सना करता है, मैं आपको ये भी शेयर करुं कि निजी रुप से मैं इसे चुनौती देना चाहूंगा, मैं निजी रुप से बोल रहा हूं, कांग्रेस की तरफ से नहीं बोल रहा हूं और आपको ये भी बता रहा हूं कि ये असंवैधानिक है, गलत है, भद्दा है और एक लार्जर षडंयत्र का हिस्सा भी हो सकता है और अंतिम सबसे मुख्य प्वाइंट इसके पहले क्या चर्चा हुआ, क्या वार्तालाप हुई, क्या आदान-प्रदान हुआ, क्या बातचीत नहीं, किसी को कॉन्फिडेंस में लिया ही नहीं गया, ये कोई मजाक है क्या?

Sd/-
(Vineet Punia)
Secretary
Communication Deptt,
AICC

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