My AICC Press Brief dated 11.09.2017 in Hindi

डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि, दुर्भाग्य की बात है कि मोदी जी जिस भारत के निर्माण की बात कर रहे हैं और प्रभावशाली वक्ता तो वो हैं ही, उस प्रभावशाली वक्ता के रुप में जो आपने आज भी सुना और हर वर्ष और बल्कि हर हफ्ते आप सुनते हैं, जिस भारत का वो निर्माण वो कर रहे हैं, ये दुखद प्रसंग है और दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि वो भारत विवेकानंद जी की सोच और विचारों से कोसों दूर था, कोसों मीलों दूर था। महापुरुष विवेकानंद जी का भारत सच, प्रगतिशीलता, उदारवादी सोच, शांति और सद्भावना वाला भारत था, आपसी वैमनस्य से मिलों दूर था।

आज का भारत मोदी जी का भारत या भविष्य का जो भारत बनाना चाह रही है मोदी सरकार, उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है वो संकीर्णता का भारत, वो आडम्बर और झूठ का भारत, वो संकुचित सोच का भारत, घृणा, कट्टरता और हिंसा के वातावरण से ओत-प्रोत भारत और मोदी जी ने आज भी चर्चा की युवा भारत की, नए भारत की, लेकिन युवा भारत, नया भारत सच में बेरोजगारी वाला भारत बन गया है, उसकी चर्चा उन्होंने नहीं की।

हम नतमस्तक हैं ऐसे स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुष के विषय में। हम 1893 वाले उनके शिकागो के address के सामने नतमस्तक हैं, हर भारतीय की छाती गौरव से बढ़ जाती है और भगवत गीता से स्वामी विवेकानंद जी ने quote किया था, उसको मैंने अंग्रेजी में quote किया था।

ये किसी समयकाल का संदेश नहीं है, ये सर्वकालिक है, टाईम न्यूट्रल है। कांग्रेस पार्टी, कांग्रेस अध्यक्ष, कांग्रेस उपाध्यक्ष इस 1893 के वर्ष की शुभता पर नतमस्तक हैं। ये एक बहुत ही जबरदस्त शुभ अवसर है कि एक ही तिथि पर एक ही दिन पर 3 ऐसी चीजें मिल रही हैं, इंटरसेक्शन हो रहा है। पहली बार इस दिन 1906 में महात्मा गाँधी जी ने सत्य पर आग्रह शब्द”सत्याग्रह” का प्रयोग किया Johannesburg में, भारतीयों से बात करते हुए, वार्तालाप करते हुए और आज ही आचार्य VinobhaBhave जी की Birth Anniversary है, जो आप जानते हैं Bhoodan से किस प्रकार से उसका निर्माण किया, उसकी सोच की और जैसा माननीय प्रधानमंत्री जी ने सही कहा कि महापुरुष विवेकानंद जी का भी दिवस आज है, दुर्भाग्य की बात है माननीय प्रधानमंत्री जी आपके शब्दों, कथनी और करनी में जमीन-आसमान, आसमान और पाताल का फर्क है, सच्चाई ये है कि आपकी सरकार स्वामी विवेकानंद जी के शब्दों, उनकी आत्मा, उनके जो शब्दों का Spirit है, उसके ठीक विपरीत काम कर रही है।

आज प्रतिशोध की भावना, आपसी वैमनस्य की भावना, संकीर्णता द्वारा और साम्प्रदायिकवाद और एक सोच के द्वारा, विभाजन की राजनीति के द्वारा, दोषारोपण की राजनीति के द्वारा पूरा माहौल विवेकानंद जी के विचारों के बिल्कुल विपरीत किया जा रहा है, 180 डिग्री विपरीत। सच्चाई ये है कि आज मोदी सरकार, मोदी सरकार के समर्थकों, उनकी संस्थाओं के फलसफे के अंतर्गत हम क्या पहनते हैं, क्या खाते हैं, कहाँ जाते हैं, किससे बातचीत करते हैं, क्या बातचीत करते हैं, कैसे रहते हैं, अपने जीवन को कैसे व्यतीत करते हैं, उस विषय में स्वतंत्र सोच, स्वतंत्र कार्य असंभव है। असहमति, एक खुली सोच, rationalist का पूरा समुदाय, उनको फांसी दी जा रही है दिन-प्रतिदिन और इसके कई सारे उदाहरण – गौ-माता के नाम पर lynching से लेकर, हाल में जो मैंगलोर में हुआ उसका हमने विस्तार से आपके सामने विवरण रखा था, कुछ दिनों पहले इसी मंच से।

दूसरा उदाहरण महिलाओं का आदर, जो माननीय प्रधानमंत्री जी ने जिक्र किया, मैं नहीं समझता कि इस मुद्दे पर कोई दो राय हो सकती है, लेकिन आज जो भय का वातावरण है। आज आप बाहर जाईए, सैर कीजिए तो आपको अंजाने लोग आकर कहेंगे कि हम घबरा रहे हैं, अपने बच्चों को स्कूल भेजने से। दिल्ली को छोडिए, अभी आपने पढ़ लिया, इतनी भयानक भर्त्सना वाली चीज है कि बोलने में तकलीफ होती है, आपके कैमरों और सब चैलन पर देखने में, हमें तो तकलीफ होती है देखने में, हम तो चैनल बदल लेते हैं, इतनी ज्यादा तकलीफ की बात है। अभी दुमका, झारखंड में क्या हुआ – एक बहुत छोटी लड़की का 12 व्यक्तियों द्वारा बलात्कार किया गया, इन चीजों का आपके सामने विवरण करना पड़ता है, लेकिन दुख होता है और देश विचलित है इससे, देश प्रश्न कर रहा है, पूछ रहा है।

तीसरा उदाहरण “मेक इन इंडिया”, मैं समझता हूं आपके और हमारे कान पक गए ये phrase सुन-सुन कर। 3 वर्ष में ये और 3-4 ऐसे phrase बार-बार सुने। “मेक इन इंडिया” का अगर पर्यायवाची शब्द दूं तो मैं रोजगार होगा। दो चीज तो है ही नहीं, एक ही चीज है। अब “मेक इन इंडिया” हमने तो, हम इतने अच्छे नहीं है जुमलों में, वास्तविकता है ये, मैं सही कह रहा हूं, हमें तो लगता है कि हमारी रोजगार की वृद्धि इनसे कई गुना ज्यादा थी, हमें तो “मेक इन इंडिया” के पार करना चाहिए था। तो हमारे पास तो टेलेंट नहीं है, उसके लिए मैं आपके सामने गलती मान रहा हूं, लेकिन माननीय मोदी जी ने इतना सुनाया आपको “मेक इन इंडिया” के बारे में, CMIE के published डाटा, एक क्वार्टर में जनवरी से मार्च के बीच में 15 लाख रोजगार गए हैं। सबसे पुरानी एक संस्था है जो सिर्फ आंकड़ों पर जाती है, जिसे राजनीति से मतलब नहीं। 1 लाख पिछले क्वार्टर में रोजगार बढ़ा है और 15 लाख पहले क्वार्टर में कम हुआ और मैं अभी समझता हूं कि आपने पूरी कहानी देखी नहीं है, ट्रैलर से भी कम देखा है देश में।

स्वच्छ भारत मिशन एक और जबरदस्त जुमला है, आपको बताया गया कितना और कितना अभियान किया और सही अभियान होना चाहिए टॉयलेट के विषय में, लेकिन क्या ये बताया गया कि 51% से ज्यादा जो टॉयलेट के नाम पर अभियान चलाया गया है, वहाँ पर Sanitation नहीं है, ‘dry-pit’ है। ‘dry-pit’ का मतलब कि बीमारी, अब सबसे ज्यादा जिसकी हमने भर्त्सना की है, जिसके बारे में हमने मृत्यु देखी हैं manual scavenging जिसमें होती हैं, वो ऐसे टॉयलेट हैं। तो सिर्फ आपको मोदी जी को प्रसन्न करना है, बीजेपी सरकार का आंकड़ा Full-Fill करना है और black board पर लिख दें कि मैंने इतने टॉयलेट बनाए हैं और टॉयलेट की सत्य अगर ये है तो ये कैसा स्वच्छ भारत अभियान है? स्वच्छता भारत की बहुत अहमियत है और हम उसके लिए प्रधानमंत्री जी का समर्थन करते हैं, लेकिन किसी फोटो कैमरे के सामने झाडू लेकर सफाई करने से भारत स्वच्छ थोड़े होता है?

अंत में वही रोजगार, मेक इन इंडिया से संबंधित एक और जुमला, Skill India, Start-up India, Stand up India मैं नहीं समझता कि कितने सारे जुमले हैं इसमें। अब मैं नहीं चाहता भारत के बारे में बोलना लेकिन आंकड़ों पर जाएं तो Skill India, Start up India, Stand up India, fall flat India हो गया है। अगर जुमलों के आधार पर चलिए, Manufacturing यानि उद्योग की ग्रोथ 9 साल में न्यूनतम है। 9.2 और अधिकतम साढे 8% से 7% हो गई है और इस क्वार्टर में नहीं, कई क्वार्टर में और लगभग पिछले 6 क्वार्टर में न्यूनतम ग्रोथ है। अगर ग्रोथ नहीं होगी तो रोजगार कहाँ होगा और अभी इसका पूरा प्रकोप कृषि में नहीं जोड़ा है। कृषि की हालत आप जानते हैं, कुछ मंत्री बदले गए हैं लेकिन जुमलेबाजी वैसी ही चलती है, भाषणबाजी वैसी ही चल रही है। तो मैं हाथ जोड़ कर निवेदन करुंगा कि ऐसे विवेकानंद जी जैसे महापुरुष के शब्दों का, शब्दों का नहीं तो अंतरआत्मा का पालन करें, ना कि ऐसे जुमलों का।

राजनाथ सिंह जी द्वारा दिए बयान पर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में डॉ. सिंघवी ने कहा कि देखिए माननीय गृहमंत्री एक बहुत बड़े संवैधानिक पद पर हैं और मैं निजी रुप से उनके बारे में कुछ नहीं बोलना चाहता। लेकिन 2-3 पहलूओं पर मैं टिप्पणी करना चाहता हूं- पहला ये कि आज पालिवाला का एक बड़ा प्रसिद्ध वाक्य है कि जब आपके घर में आग लगी हो तो ये औचित्य नहीं होता है कि आप बैठकर ये निर्णय लें कि आपको बेडरुम को ड्राईंग रुम बनाना है या ड्रांईग रुम को कीचन बनाना है, आप पहले आग से लड़िए। आज जो कश्मीर में नाजूक हालात है, उस दौरान क्या आपने देश के समक्ष कोई भी व्यापक, दूरगामी हल रखा है, तो हम आपके साथ खड़े हैं, पूरी तरह से समर्थन करते हैं। आप हल का विपरीत कर रहे हैं। इससे आप सहमति बना रहे हैं,इससे आप लोगों को जोड़ रहे हैं, इससे आप लोगों को पास ला रहे हैं और इससे क्या आप कोई भी लगी हुई आग को बुझा रहे हैं, अगर ये है तो हमारा पूरा समर्थन हैं। हम समझते हैं विनम्रता से कहेंगे कि इसका विपरीत हो रहा है। ऐसे मुद्दों की बात करना इस वक्त जब आपकी केन्द्र सरकार और प्रदेश सरकार में कोई तालमेल नहीं हैं, coalition के दलों में कोई तालमेल नहीं है और जब जम्मू-कश्मीर में 3 वर्षों में तुलनात्मक रुप से उससे पहले 10 वर्षों के हिसाब से सबसे खराब आंकड़े प्रकाशित हे। चाहे वो मृत्यु के हों, आतंकवाद के हों, चाहें civilian casualties हों, आर्मी और सेना के हों, उस दौरान आपके पास ठोस हल शब्द नहीं सुनते हैं हम और हम 35-A की बात सुनते हैं, क्या ये जिम्मेवारी की चीज है?

एक अन्य प्रश्न पर कि जिस तरह से एक बच्चे की हत्या कर दी गई, अभिभावकों पर लाठी चार्ज किया गया और जो हालात पैदा हुए, उसको कैसे देखते हैं आप, डॉ. सिंघवी ने कहा कि मैंने तो कह दिया है कि ये ऐसा माहौल है कि सुबह उठकर हम चाय नहीं पी सकते हैं, अखबार पढ़कर। आपके चैनलों के माध्यम से व्यापक रुप से आपने जांच की है, हम चैनल नहीं देख पाते, क्या बच्चों के माता-पिता की हालत हुई है, कोई सोच नहीं सकता। ये क्या हो रहा है भारत की राजधानी के करीब? गुरुग्राम राजधानी के करीब ही है। मैं इस पर राजनीतिक दोषारोपण की बात नहीं कर रहा हूं लेकिन बात सही है कि असुरक्षा का जो माहौल है। आप सैर पर जाईए बाहर, कई लोग आते हैं और कहते हैं कि आप लोग सरकार में है, शासन में हैं, राजनीति में हैं, तो हमको भय है कि हमारे बच्चे स्कूल कैसे जाएंगे? दुमका, झारखंड में क्या हुआ, आप जानते हैं, दिन-दहाड़े एक ऐसी घटना हुई उस लड़की के साथ, तो ये प्रश्न है जिस पर प्रधानमंत्री जी की चुप्पी है। एकजुट होकर वातावरण बदलना, जोड़ना लोगों को, साथ लाना सहिष्णुता की तरफ वो बात नहीं हो रही है और मैं समझता हूं कि दुर्भाग्य है इस देश का कि एक तरफ इतनी बड़ी बातें होती हैं विवेकानंद जी जैसे महापुरुष के बारे में और दूसरी और सच्चाई में स्थिति दयनीय है, इतनी दुखद है और इतनी दर्दनाक है।

एक अन्य प्रश्न पर कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हरियाणा सरकार, केन्द्र सरकार, प्रशासन सबको नोटिस जारी किया है, डॉ. सिंघवी ने कहा कि वो एक अलग प्रक्रिया है और ये एक अलग प्रक्रिया है। उच्चतम न्यायालय की कुछ सीमाएँ होती हैं, कोर्ट-कचहरी की सीमाएं हैं, वो जांच कर सकते हैं, तथ्य ला सकते हैं, Supervision कर सकते हैं, भय भी कर सकते हैं, प्रशासनिय यंत्र-तंत्र को, लेकिन पहली बात तो ये है कि तुंरत दिनों में, घंटों में जो सही कुसुरवार है और जो सही मल्टीपल कुसुरवार है, उनको पकड़ कर दंड करने की प्रक्रिया की शुरुआत और उसका 6 महीने में अंत। इससे कोई शांति नहीं होने वाली है उन मृत बच्चों के माता-पिता को लेकिन कम से कम ये तो न्यूनतम है और दूसरा उससे ज्यादा, बहुत ही महत्वपूर्ण है preventive, आज हर माता-पिता, राजनीतिक रंग का कोई मायने नहीं है इसमें, हर माता-पिता को भय लगा हुआ है आज, बड़े लोगों को सुरक्षा मिल जाती है, लेकिन आम आदमी को भय लगा हुआ है इसमें तुरंत दिखा कर एक्शन लेना होगा और जो भी मांगे हैं पूरी करनी चाहिए इसमें।

तीन तलाक पर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में डॉ. सिंघवी ने कहा कि देखिए अब इस मामले का अंत होना चाहिए। इसमें अब कोई विवाद का स्कोप नहीं है। जो उच्चतम न्यायालय ने विषय किया है, जो विषय है -सीमित ट्रीपल तलाक एक तरीके से, ट्रीपल तलाक के और तरीके की बात नहीं हुई है जो मुख्य रुप से केस है, वो सीमित है, Focussed है और व्यापक है एक मुद्दे पर। उस मुद्दे पर मैं समझता हूं कि विवाद, जिरह बंद हो गई है। वो असंवैधानिक है, हमारे कानून के अंतर्गत है, संविधान के अंदर असंवैधानिक है और उसमें आपकी और मेरी कोई निजी राय मायने नहीं रखती। आप विवाद करते रहें, मैं समझता हूं लोग आपके साथ नहीं हो सकते हाँ ये आवश्यक है कि उच्चतम न्यायालय के निर्णय को जमीन पर परिवर्तित करना है क्योंकि कई चीजें आपकी पीठ के पीछे होती हैं, आपको मालूम ही नहीं पड़ती हैं और वही एक चुनौति हैं, हमें वहाँ देखना चाहिए, भविष्य में देखना चाहिए।

एक अन्य प्रश्न पर कि राहुल गाँधी जी यूएस के दौर पर हैं, क्या ये 2019 के चुनावों की तैयारी है, डॉ.सिंघवी ने कहा कि आपको इसका जवाब तब दिया जाएगा जब आप ये calculate करेंगे कि माननीय प्रधानमंत्री की तुलना में विपक्ष के उपाध्यक्ष .000 % से भी कम बाहर जाते हैं, लेकिन जैसे क्योंकि ये आदत हो गई है कुछ लोगों की इस पर टिप्पणी करना, मजाक उड़ाना, तो मैं आवश्यकता नहीं समझता इस पर जवाब देने की। प्रधानमंत्री जी तो लगता है दौरे पर ही रहते हैं। अगर एक बहुत उच्चस्तरीय चर्चा पर कोई व्यक्ति स्वतंत्रता अपनी जता कर पार्टी का पक्ष रखना, भारत का आईडिया बताना, विपक्ष की तरफ से भारत की क्या सच्चाई है, उसको प्रकाशित करने जाता है, तो मैं समझता हूं कि इस प्रकार से खिल्ली उडाना, टिप्पणी करना, बीजेपी वाले माहिर है इसमें। लेकिन हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के बयान पर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में डॉ. सिंघवी ने कहा कि उनका ये निजी मत हो सकता है, आप उनसे पूछिए क्या इसका अभिप्राय है। संवैधानिक पदाधिकारी हैं, उन्होंने सोच समझ कर कुछ कहा होगा, इसमें दो राय नहीं कि जो अलग-अलग विषयों में हम सुधार ला सकते हैं और कोई सकारात्मक सुझाव है तो हम बिल्कुल तैयार हैं, लेकिन आप जो पूरा नकारात्मक रुप से निकाल रहे हैं, वो आप पूछ कर आएं कि क्या है।

एक अन्य प्रश्न पर कि चुनाव से पहले अगर कोई मुख्यमंत्री सामूहिक तौर पर कुछ कहता है, तो इसका क्या मायने हैं, डॉ. सिंघवी ने कहा कि इन मुद्दों पर पार्टी ने बहुत गंभीरता से और बहुत गहराई में अभी हाल में उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में ये चर्चा हो चुकी है और सब मामले शिंदे जी की रिपोर्ट के आधार पर भी चर्चित हो चुके हैं और निर्णय ले चुके हैं।

नीतीश कुमार जी के खिलाफ जनहीत याचिका दायर हुई है, क्या कहेंगे, डॉ.सिंघवी ने कहा कि मैं कोई विस्तार से टिप्पणी नहीं करुंगा क्योंकि ये कोर्ट के अंदर है और अभी हाल में नोटिस हुआ है और एक्टिव है। निश्चित रुप से जो मापदंड सब पर लागू होता है, वो बाकि सब पर भी लागू होना चाहिए। ये अलग बात है कि उत्तर प्रदेश और गुजरात में सैंकड़ों रैली के बाद हमने आज तक कोई आईटी नोटिस नहीं देखा, बीजेपी पर और ये अलग बात है कि लालू जी की रैली के एक हफ्ते बाद एक आईटी नोटिस आ गया। लेकिन जहाँ तक उच्चतम न्यायालय का सवाल है, सबका समान अधिकार है आरोप लगाने का और सबका समान अधिकार है परिणाम पाने का। और उच्चतम न्यायालय के अंतर्गत एक प्रक्रिया है और इस पर हमें कोई टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।

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