Sick Health Care System of Gujarat

ALL INDIA CONGRESS COMMITTEE
24, AKBAR ROAD, NEW DELHI
COMMUNICATION DEPARTMENT

Highlights of Press Briefing 24 May, 2020
Dr. Abhishek Manu Singhvi, MP & Spokesperson, AICC addressed media via video conferencing today.
Dr. Abhishek Manu Singhvi said- “In Gujarat today we don’t have a health care system, we have a sick system”
“न योग्यता, न प्रभाव – कैसी-कैसी गुजरात सरकार की चाल
देखो! प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था का कैसा हो गया हाल.”
The inefficiency of the Gujarat state government in handling Covid crisis depicts that it is undermining, underconfident, and underachieving
“मोदी-शाह की जोड़ी संकट के समय कैसे-कैसे जुमले गढ़ रहे हैं?
आम आदमी को तो छोड़ो, ये न्यायालय को भी अनदेखा, अनसुना कर रहे हैं”

1 It is my sad duty to bring to the country’s attention the deplorable & indefensible plight of medical and health facilities in Prime Minister Shri Modi’s own home state & in part of Home Minister Amit Shah’s own constituency (4 assembly segments of Ahmadabad fall in Gandhinagar parliamentary constituency).
2 If such powerful people, including leaders and controllers of the central government, themselves are unable to provide medical justice on home ground to the poor and needy common man of their home “illaka”, what Covid justice can the rest of India’s teeming millions expect from them?.
3 It is seldom that, in my legal experience, I have rarely found the words which the Division Bench of the High Court of Gujarat was forced to use for medical conditions in Government hospitals In Ahmedabad in its 143 page order dated 22/5/20. It noted :
a) Gujarat being “one of worst affected states” in the country qua Covid ( para 5).
b) “lack of PPEs, shortage of ventilators, ICU’s and isolating wards…” ( para 6)
c) conditions at Civil Hospital, Ahmedabad as “pathetic” (para 48)
d) “The Civil Hospital, Ahmedabad contributes to 62% of total deaths” ( 62% of total deaths in Ahmedabad with Ahmedabad having 85% plus deaths of all deaths in Gujarat!) ( para 48)
e) The death rate in Civil Hospital is almost double that of two other govt/ municipality run hospitals in Ahmedabad itself ( 13% against 7%) ( para 48)
f) There is complete “lack of critical care” ( para 48)
g) “there is no single command and control structure in Civil Hospital” ( para 48)
h) The Health Minister of Gujarat does not seem to be aware of what is going on nor appears to have ever visited the hospital ( page 96, unnumbered para)
i) The hospital “is as good as a dungeon, maybe even worse than a dungeon”( page 96)
j) Private testing of Covid, even by authorised private institutions has been stopped by Government of Gujarat, which says tests can be conducted only at Government Hospitals ( page 117)
k) Argument of Government of Gujarat was that “more number of tests which lead to 70% of population testing positive for Covid, thereby leading to fear psychosis!” ( page 120) ( argument rejected by High Court).

3A  As reported, the High Court remarks are some of the severest, most scathing & harshest strictures, which High Courts ever pronounced. As reported, references have been made to “sinking of the titanic”, the “extremely bad shape” of the hospital and the state Government’s bizarre intent to “artificially control the data qua the number of cases in the state of Gujarat”.
4) We would respectfully ask the Prime Minister, Home Minister, the Government of India, Chief Minister, Gujarat and Government of Gujarat:
a) Are they even aware of what is happening in their own home state?
b) If so, have they ever intervened, chastised or punished the Gujarat government or Does the latter have Covid immunity vaccine because they belong to BJP?
c) Have they used similar standards, similar adjectives, ‘similar terms of endearment’ and similar inspection teams for Gujarat government as for West Bengal Government?
d) Why has the Hon’ble Gujarat Governor not adopted the same intrusive standards re the Gujarat Government as his West Bengal counterpart did?
e) Is it not true that by such methods of suppressed testing, transparency and the true nature of the problem is critically compromised, distorted and misrepresented for purposes of personal image?
f) Why is the Government of Gujarat, close on the heels of the “non existent ventilator scam” elaborated by my colleague yesterday ( AICC press release 23/5/20), selling N95 masks admittedly at Rs 65/ per mask as against the admitted procurement cost to it of Rs 49.61 per mask ie at a straight profit arbitrage of 31% ?
g) why is Government of Gujarat, on the one hand profiteering from an essential item like N95 mask, secondly levying steep penalty on those who do not wear mask in public, thirdly making public hospital spaces like City Hospitals a death trap (worse than “dungeons”) and fourthly having a ventilator scam under its nose during Covid?
h) can such a quadruple whammy be tolerated by the common man of Gujarat and of India?

Sadly we and the Nation seek answers which we are confident we will never get.

डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि दोस्तों, ये मेरा दुखद कर्तव्य है कि मैं आपके समक्ष कुछ ऐसे तथ्य रखूं, जो ऑब्जेक्टिव रूप से न्यायपालिका ने लिखे हैं और उसके बाद राष्ट्रहित, गुजरात हित और जनहित के 8-9 प्रश्नों को मैं आपके जरिए पूछता हूँ, जो सीधा सम्पर्क रखते हैं। उस प्रदेश की आज जो स्थिति है, जिसको प्रधानमंत्री का प्रदेश कहा जाता है; उस इलाके, उस कॉन्स्टीट्यूएंसी की, जो अधिकतर माननीय गृहमंत्री के संसदीय क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा है। याद रहे कि कई चीजों के लिए गृह मंत्रालय कोविड-19 की इम्पिमेंटिंग एजेंसी भी है।
ये मेरा दुखद कर्तव्य है कि मैं आपके समक्ष नहीं सोचने वाली एक ऐसे तथ्य रखूंगा, जिसका सम्बंध प्रधानमंत्री के गुजरात प्रदेश के विषय में और गृहमंत्री अमित शाह जी के संसदीय क्षेत्र की चार कॉन्स्टीट्यूएंसी जिस क्षेत्र में पड़ती हैं, अहमदाबाद के विषय में है। इस विषय का समर्थन कोई अपने स्वप्नलोक में भी नहीं कर सकता। आपसे जो ज्यादा व्यापक प्रश्न पूछना चाहता हूँ, आपके जरिए वो ये है कि क्या जब इतने बड़े लीडर्स, इतने सशक्त सरकार के सभी येन-केन प्रकारेण यंत्र, सभी यंत्र को कंट्रोल करने वाले गुजरात सरकार और केन्द्र सरकार के भी महानुभाव अपने खुद के प्रदेश में, अपने खुद के इलाके में कोविड के समय इस प्रकार का अन्याय कर सकते हैं, “मेडिकल इनजस्टिस”, तो क्या वो देश का मदद करेंगे, सहायता करेंगे, सहानुभूति देंगे? मेरा कुछ अनुभव है, कानून में भी और पब्लिक लाइफ में भी मैंने इतने कड़े, स्पष्ट शब्द और सीधे समझता हूँ, भर्त्सना से भरे शब्द, न्यायपालिका द्वारा नहीं सुने और सुने भी होंगे, तो 10 वर्ष में कभी एक बार। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने कल 143, लगभग 150 पेज के निर्णय में जो निर्णय दिया, मैं आपसे 5-7 प्रसंग इसमें सिर्फ कोट करूँगा और फिर आपके सामने अपनी टिप्पणियाँ करूँगा।
एक जगह उन्होंने कहा कि देश के जो तीन सबसे ज्यादा पीड़ित स्टेट हैं, देश का सबसे ज्यादा पीड़ित स्टेट, उनमें गुजरात आता है। जहाँ तक कोविड का सवाल है, जो आपको एआईसीसी के दस्तावेज मिलेंगे, उसमें सब पैरामीटर्स, तथ्य डीटेल दिए गए हैं, मैं उसके साथ आपको अभी बर्डन नहीं करना चाहता। फिर उच्च न्यायालय ने पीपीई किट के उपलब्ध नहीं होने, वेंटिलेटर्स के बहुत गंभीर रुप से उपलब्ध नहीं होने, आईसीयू और आईसोलेटिंग वार्ड बहुत कम पड़ना और उसके बारे में बात की है। उसके बाद उन्होंने अपना ध्यान बहुत महत्वपूर्ण सिविल अस्पताल अहमदाबाद की तरफ घुमाया है और सिविल अस्पताल अहमदाबाद उस शहर का सबसे महत्वपूर्ण मेडिकल संस्था है और कहा है कि वहाँ की स्थिति “पैथेटिक है”, मैं कोट अनकोट कर रहा हूँ, “पैथेटिक” और ये आपको कहा है उच्च न्यायालय ने मैं नहीं कह रहा हूँ कि अहमदाबाद में लगभग 62 प्रतिशत जो मृत्यु हुई हैं, वो इस अस्पताल में हुई हैं और अलग से एक आंकड़ा दिया है कि 85 प्रतिशत से ज्यादा गुजरात की मृत्यु अहमदाबाद में हुई हैं।
उसमें ये तुलनात्मक रुप से देखा है कि अहमदाबाद के बाकी सरकारी अस्पताल, (निजी अस्पतालों से तुलना नहीं की है), सरकारी अस्पतालों से दोगुनी, लगभग दोगुनी से थोड़ी कम रेट है, सिविल अस्पताल में मृत्यु की, वहाँ 7 प्रतिशत है, म्यूनिसिपिलिटी द्वारा जो अस्पताल चलते हैं, यहाँ 13 प्रतिशत है।
‘Complete lack of critical care’, ‘no single command and control structure in hospital’. ये सब मैं लिखित कोटेशन कर रहा हूँ, मेरे शब्द नहीं है। ‘स्वास्थ्य मंत्री गुजरात के लगता है मालूम नहीं कि क्या हो रहा है’, उच्च न्यायालय कहता है और ये साफ लगता है कि ‘वो कभी सिविल अस्पताल के आसपास नहीं गए’ और फिर से अंग्रेजी में कोट करना आवश्यक है, Civil hospital “is as good as a dungeon, maybe even worse than a dungeon” अहमदाबाद में तहखाने से ज्यादा गया गुजरा मुख्य अस्पताल अहमदाबाद का, जहाँ 62 प्रतिशत मृत्यु होती हैं ।
उसके बाद दो रोचक टिप्पणियाँ की हैं उच्च न्यायालय ने कि जो निजी संस्थाएं, सरकार और गुजरात सरकार द्वारा नोटिफाइड भी हैं, वहाँ भी प्राईवेट टैस्टिंग, यानी सरकारी टैस्टिंग के बाहर जो टैस्टिंग हो सकती है, उसको गुजरात सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया है और कहा है कि जब तक पहले आप सरकारी अस्पताल से करवाएंगे और वहाँ से फाइंडिंग लाएंगे कि सरकारी अस्पताल नहीं कर सकता, तब शायद हम आपको एक निजी अस्पताल जाने देंगे। ये एक विचित्र चीज है और इसका क्या दुष्प्रभाव है। उसके बारे में मैं टिप्पणी करने वाला हूँ, पर आपको याद रहे कि देश का, जो राष्ट्रीय सरकार का और जो अधिकतर प्रदेशों का रवैया रहा है, उन्होंने प्राइवेट टैस्टिंग अलाऊ(allow) की है। दिल्ली में 20-25 जगह अनुमति दी है, इसका कारण बताऊँगा मैं आपको उद्देश्य और उच्च न्यायालय ने ये भी नोट किया है कि इसका साफ उद्देश्य मालूम पड़ जाता है, इस वाक्य से कि प्रदेश सरकार ने लिखित रुप से जो हलफनामा दिया है, उसमें कहा है कि “more number of tests which lead to 70% of population testing positive for Covid, thereby leading to fear psychosis!” तो आपको उद्देश्य मालूम पड़ गया। कई और शब्द इस्तेमाल किए उच्च न्यायालय ने। उसमें मैं अभी नहीं जाऊँगा, “sinking of titanic” कहा है, “बहुत ही बूरी हालत है”, कहा है और ये कहा है टैस्टिंग के विषय में “artificially control the data qua the number of Cases in the state of Gujarat” वो गलत रुप से आंकड़ों को निंयत्रित करना चाहती है। जिससे कि पारदर्शिता न हो, आंकड़े आपके समक्ष नहीं आएं। अब इस संदर्भ में मेरे बड़े सीधे प्रश्न हैं, राजनीतिक पार्टी की हैसियत से, जनता जनार्दन के जरिए, नागरिक के जरिए, गुजरात के भी और भारत के भी, मुख्यमंत्री से भी, प्रधानमंत्री से भी, गृहमंत्री से भी, केन्द्र और प्रदेश के सभी मंत्रिमंडल के महानुभावों से।
क्या उनको मालूम है कि प्रधानमंत्री औऱ गृहमंत्री के खुद के प्रदेश में क्या हो रहा है?
निश्चित है कि या तो मालूम नहीं है और अगर मालूम है तो सीधा प्रश्न उठता है कि क्या आपने हस्तक्षेप किया है, क्या आपने दंड दिया है, क्या आपने इन मामलों में कोई भी ठोस एक्शन जुमले छोड़कर किया है? और या एक ही उत्तर हो सकता है कि गुजरात के हर व्यक्ति जो सरकार में है, जो मिसमैनेज कर रहा है, उसके पास एक कोविड इम्यूनिटी वैक्सीन है, जो अभी तक इजाद नहीं हुई, क्योंकि आप बीजेपी के अधिकार क्षेत्र वाली सरकार है, सत्तारूढ़ सरकार।
ऐसी स्थिति में उन प्रदेशों में जो आपने इंस्पेक्शन टीम भेजी थी, एक उदाहरण है, पश्चिम बंगाल, जो आपने शब्दों का प्रयोग किया, जो रिपोर्टें आईं। आपने केन्द्र सरकार की हैसियत से कहा- क्या आपने कभी भी गुजरात के विषय में ये आंशिक रुप से भी कहा है? सुनी को अनसुनी और देखी को अनदेखी किया है या नहीं?
माननीय गुजरात के राज्यपाल ने अपनी सरकार के बारे में शायद उनको इंस्ट्रक्शन नहीं आए, ऐसी स्थिति, ऐसे उच्च न्यायालय की टिप्पणियों में कभी वो प्रश्न पूछे हैं, वो हस्तक्षेप किया है, जो माननीय राज्यपाल पश्चिम बंगाल ने पश्चिम बंगाल में किया है। ये पक्षपात है, दोगली आवाज है, आडंबर है कि जनता जनार्दन प्रेस के जरिए निश्चित करेगी। लेकिन हम एक राजनीतिक पार्टी की हैसियत से ये प्रश्न पूछ रहे हैं कि यह व्यवहार कैसा है? हम उस इंस्पेक्शन टीम की स्तुति नहीं कर रहे हैं, अगर कही गलती हो तो करिए, लेकिन समान रुप से देश में क्या कर रहे हैं आप? राजनीति खेल रहे हैं क्या?
आपने इस टैस्टिंग को सप्रेस करके, दबाकर, झूठलाकर, यानि जहाँ पर निजी संस्थाएं जो नोटिफाइड हैं, वहां भी प्रतिबंध लगा दिया है। आप पारदर्शिता का क्या कर रहे हैं? क्या आप जानबूझकर प्रधानमंत्री की, गृहमंत्री की, महानुभावों की पर्सनल इमेज को बचाने के लिए एक झूठा चित्रण करना चाहते हैं, क्योंकि आपके दस्तावेज, हलफनामें ने स्पष्ट कह दिया है कि “fear psychosis” हो जाएगा। अगर सही आंकड़े टैस्टिंग के आगे के आ जाएं तो, उच्च न्यायालय ने उसको निरस्त किया है, नकारा है, रिजेक्ट किया है। तो अपने खुद की निजी इमेज के लिए आप देश और गुजरात की जनता से खिलवाड़ कर रहे हैं।
मेरा छठा प्रश्न, उसी शृंखला का है, अगली उसकी एक कड़ी है, जिसके बारे में कल आपसे बात हुई, जिसको हम नॉन एग्जिस्टेंट वेंटिलेंटर स्कैम कहते हैं। उसके स्कैम के बारे में कल एआईसीसी में चर्चा हुई थी, तो मैं आज एक और स्कैम की बात कर रहा हूँ। कृपया आप उसको बताएँ देश को कि N-95 मास्क को स्वीकार किया है कि गुजरात सरकार एडमिटेडली(admittedly), 65 रुपए प्रति मास्क बेच रही है और साथ-साथ ये भी स्वीकार किया है कि इस मास्क को लाने और बेचने के लिए जो उनको कोस्ट पड़ रही है, कीमत, वो है, 50 रुपए में 40 पैसे कम। 49.60 रुपए। ये होता है सीधा मुनाफाखोरी, प्रोफिटियरिंग, 31 प्रतिशत की, किस विषय में, कोविड के विषय में, मास्क के विषय में !
अब आप देखें, वैसे तो बात मजाकिया होती, लेकिन दुखद है, ट्रैजिक है, आम समय में मजाकिया होती। एक तरफ आप बहुत जबरदस्त पैनल्टी लगाते हैं, उनके ऊपर जो बिना मास्क के बाहर निकल आते हैं, दूसरी तरफ आप 49 रुपए की चीज को 65 रुपए में बेचते हैं, मुनाफाखोरी करते हैं। सरकार की बात कर रहा हूँ, मैं व्यापारी की नहीं, पर ये सब स्वीकार है, आंकड़े स्वीकारित हैं।
तीसरा, आपके जो सरकारी जगह हैं, सिटी अस्पताल जैसे, उनको ठीक करने के अस्पताल से आपने मृत्यु दंड देने वाली संस्थाएं बना दिया है। वो मृत्यु दंड करार करती हैं, कल का उच्च न्यायालय का सीधा निर्णय है।
और चौथा आपने वेंटिलेटर स्कैम भी किया है, जिसके बारे में विस्तार से बात कल हुई थी, तो इन चार चीजों को मैंने क्वोड्रूपल वैमी (quadruple whammy) कहा है। चारों दिशाओं से, चारों तरफ से आप आम आदमी को, गुजरात के आम आदमी को, भारत के आम आदमी को इस प्रकार से डंडा चला रहे हैं, पीड़ित कर रहे हैं, दंडित कर रहे हैं, शोषित कर रहे हैं। कोई जवाब तो दीजिए। ये पूरा देश जवाब मांग रहा है, गुजरात की जनता जवाब मांग रही है। लेकिन दुर्भाग्य से हमें विश्वास है कि जवाब आने वाला नहीं है।
एक प्रश्न पर कि आज भी हमने देखा है कि नेशनल लेवल पर भी जो केसेस बताए गए हैं वो 24 घंटे में लगभग 6,700 के आस पास हैं, कल भी 6,700 के आस पास कोरोना वायरस के केसेज 24 घंटे के अंदर रिपोर्ट किए गए थे, लॉकडाउन खोलने की बात हो रही है, लॉकडाउन के बारे में कहा जा रहा है कि एक हफ्ते बाद खुल सकता है। तो आप किस तरह देखते हैं इस पूरी सिचुएशन को, क्योंकि एक तरफ विपक्ष कह रहा है, टैस्टिंग ज्यादा नहीं हो रही है, केसेस बढ़ते जा रहे हैं और हमने बहुत जगह पर सिस्टमैटिकली लॉकडाउन खोल दिया है, डॉ सिंघवी ने कहा कि ये ट्रिपल वैमी है औऱ ये संबंध रखता है मेरे पिछले हफ्ते की ब्रीफिंग से उस पर मैंने लिखित दस्तावेज दिया है आपको। मैं अगर आपकी अनुमति हो तो ट्रिपल वैमी शब्द का इस्तेमाल करता हूँ। आज वाली ब्रीफिंग के विषय में मैंने क्वाड्रूपल वैमी कहा था, ये ट्रिपल वैमी है।
1. चार लॉकडाउन किए, इनकी तिथियाँ आपको मालूम है, सबसे ज्यादा केसेस बढ़ें हैं उन चार लॉकडाउन के दौरान। मृत्यु बढ़ी हैं, जिनके आंकड़े मैंने आपको खुद को मैंने ही ब्रीफिंग की थी, पिछले हफ्ते ही दिए हैं लॉकडाउन के दौरान और अब आप लॉकडाउन को सो कॉल्ड रिलेक्स कर रहे हैं, जब वो पीक पर पहुँच गया है।
2. ये छह हजार का आप अंक एकदम सही दे रही हैं, लेकिन ये दो दिन तो एक साथ हुआ है, लेकिन करीब-करीब आठ दिन, आठ बार ऐसा हुआ है या छह बार ऐसा हुआ है कि छह हजार से ज्यादा कोरोना के केस मिले हों।
3. इसका मतलब ये नहीं कि हम लॉकडाउन को अटैक कर रहे हैं, हम बिना सोच समझ के, अनजाने में किए हुए, अचानक लॉकडाउन की बात कर रहे हैं। इसका मतलब है कि लॉकडाउन से आपके आंकड़े कम नहीं हो सकते थे। आपको उस लॉकडाउन को फोकस रखना है।
मैं एक उदाहरण दूँ, अगर आपने शुरुआत से लॉकडाउन ऐसा किया होता कि प्रतिबिल्डिंग होता, प्रति सूक्ष्म इलाका होता, नहीं तो आपने 4 लॉक डाउन में सिर्फ तीन चीजें की, तीन रंग बना दिए, कभी इस रंगे से इस रंग पर डाल दिया आपको, आपका रंग बदल दिया, कभी उस रंग से हरा डाल दिया। दूसरा जो रिलेक्सेशन अनुमतियों की सूची है, उनमें से 5-10-15-20 प्रतिशत वृद्धि कर दी। ये एक ब्लैंकेट अप्रोच है। बिना प्लानिंग की अप्रोच है। तो इसलिए शायद हमें, जिसे कहते हैं कि न यहाँ के रहे, न वहाँ के रहे। लॉकडाउन से, जिसको आप स्वप्न लोक में सोच नहीं सकते, उतना आर्थिक नुकसान हुआ, ये भी मेरे दस्तावेज में लिखा था, आपको आंकड़े दिए। लॉकडाउन से आंकड़े मृत्युओं के, और केसेस के बढ़े, आज चरम सीमा पर है और लॉकडाउन से इनमें कोई फायदा नहीं हुआ ये अलग बात है कि आप स्पेकुलेट करें कि लॉकडाउन नहीं होता तो इससे दस गुना ज्यादा होते। मैं तो उन आंकड़ों की बात कर सकता हूँ, जो आपके सामने हैं। और अंत करूँगा मैं एक बात से और मैंने ब्रीफिंग में आपके समक्ष उस ग्राफ की चर्चा की थी, जो गलत टास्क फोर्स की तरफ से रखा गया था। मैंने उसके बाद ट्वीट भी किया और हर्ष प्रकट किया है कि उस गलती को माननीय अध्यक्ष टास्क फोर्स ने माना है। चलों उनकी गलती नहीं मानते, जो गलती मान लेता है, उसकी गलती नहीं मानते लेकिन लॉकडाउन का मुझको लगता है, उद्देश्य उस वक्त था कि 16 मई तक जीरो केस हो जाएंगे। जो 16 मई के बाद सबसे ज्यादा अधिकतम चरम सीमा पर पहुंच गए हैं।
Sd/-
(Vineet Punia)
Secretary
Communication Deptt,
AICC

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