This Government is insensitive

ALL INDIA CONGRESS COMMITTEE
24, AKBAR ROAD, NEW DELHI
COMMUNICATION DEPARTMENT

Highlights of Press Briefing     20 Aug, 2020
Dr. Abhishek M Singhvi, RS MP & Spokesperson, AICC addressed the media via video conferencing today.
डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि आज हम आपसे वार्तालाप करेंगे आर्थिक व्यवस्था, रोजगार से संबंधित, एक त्रिकोण -तीन मुद्दे, जो बहुत निकट संबंध रखते हैं एक-दूसरे से – रोजगार, दूसरा आर्थिक ढांचा, जीडीपी, आर्थिक दृष्टिकोण और तीसरा खाद्य सुरक्षा।
हाल में इनके ऊपर विश्वसनीय, स्वतंत्र, निष्पक्ष आंकड़े भी छपे हैं, मुद्दे भी उठाए गए हैं। इनसे प्रश्न ये उठता है, मूल प्रश्न जो उठता है कि भाजपा हमें बताए, सत्तारुढ सरकार हमें बताए कि नौकरियां कहाँ से आएंगी, रोजगार कहाँ से आएगा? ये बताएं कि उनके मुख्यमंत्री कुछ प्रदेशों के और आप जानते हैं मैं किस प्रदेश की बात कर रहा हूं- मध्यप्रदेश की, ये जुमलेबाजी और दावेदारी कब बंद करेंगें और बताएंगे देश को कि नौकरियों में आरक्षण से देश को क्या मिलने वाला है? आरक्षण किस चीज का करेंगे, जो आपके पास नहीं है, उसका आरक्षण करेंगे? जब नौकरियां ही नहीं है तो ये बताइए कि नहायेगा क्या और निचोड़ेगा क्या, ये सरकार आपको देगी क्या, दावा क्या करेगी? जो आज देश की आर्थिक अवस्था है, सुरक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था के जो मुद्दे हैं, उस पर क्या जवाब है? ये हम आपसे संक्षेप में चर्चा करना चाहते हैं।
इस त्रिकोण का पहला जो बिंदु है, वो है – रोजगार और हम बार-बार इस विषय पर इसलिए आते हैं क्योंकि ये सबसे ज्यादा, सीधा निकट संबंध रखता है हमारे जीवन से और अब जो आया है, जो मैंने पिछले आपसे दो-तीन हफ्ते पहले बात की थी, उससे भिन्न है। अब जो आंकड़े आए हैं, वो एक बहुत चिंताजनक मुद्दा इसलिए उठाते हैं कि जो सैलरिड क्लास है, उसके विषय में, ये एक विशेष क्लास है। अपनी आय, अपनी इंकम, जो सैलेरिड होती है, उसके आधार पर जीवित है। उसमें एक जबरदस्त भयानक गिरावट हुई है, आपके देखे-देखे, आपके पिछले 4-5 महीनों के, हर महीने के आंकड़े कि उससे हम जवाबदेही मांगते उस मुद्दे पर, देश से, सरकार से। आंकड़े जो बताते हैं, मैं डिटेल में नहीं जाना चाहता, लेकिन अप्रैल तक सैलरिड क्लास, बात कर रहे हैं सैलरी क्लास की लगभग पौने दो करोड़ रोजगार गंवा दिए गए थे। मैं आपको वो आंकड़ा दे रहा हूं, पौने दो करोड़ का जो आपकी जोब, अगर आप सैलरी क्लास हैं, तो वो चली गई, गायब हो गई, छूट गई नष्ट हो गई, आप बेरोजगार हो गए। वो आंकड़ा अब 1.9 करोड़ हो गया है यानि मैं समझता हूं कि इस आधार पर जब तक अगली प्रेस वार्ता होगी निकट भविष्य में, तब तक 2 करोड़ हो जाएगा। ये जुलाई का आंकड़ा है, अगस्त का आंकड़ा हमारे पास नहीं है, लेकिन भगवान ना करे लगता है कि अभी 2 करोड़ हो चुका होगा, हम अगस्त के 20 तारीख तक पहुंच गए हैं।
ये कौन लोग हैं – ये बात सही है कि ये प्रवासी श्रमिक नहीं हैं और ये कृषक नहीं है। इनके एक मूल रुप से जो स्वरूप हैं, वो फर्क है और इसलिए ये सबसे भयानक और चिंताजनक है। इनकी गंवाई गई रोजगार आसानी से वापस नहीं आती। आसानी से तो मैं जोड़ रहा हूं, करीब-करीब नहीं आती निकट भविष्य में। ये वो कैटेगरी है। प्रवासी श्रमिक बहुत दयनीय दुख से निकले हैं, लेकिन उनके कुछ ऐसे आवश्यक कार्य होते हैं, जो वापस सीजन के आधार पर, साइकिल के आधार पर, किसी और गतिविधियों के आधार पर वापस आ जाते हैं। ये नहीं है कि उनको 4- 5- 6 महीनों से भयानक पीड़ा नहीं हुई है। कृषक कुछ हद तक बेहतर हैं, क्योंकि वो स्थाई हैं या कृषक श्रमिक जो उस पर आधारित है, लेकिन ये वो क्लास है जो गया, तो एक प्रकार से जीवन गया, परिवार के जीवन पर, बच्चों की शिक्षा पर, खुद के रहन-सहन पर और ये आसानी से वापस नहीं आता। तो इसलिए हमने पूछा कि ये क्या नहाएगी सरकार और क्या निचौडेगी, जब साथ-साथ एक तरफ ये भयानक स्थिति, मैं आपको कॉन्ट्रास्ट दे रहा हूं, ये प्रेस वार्ता मध्यप्रदेश के बारे में नहीं है, ये देश का एक मूल मुद्दा है। लेकिन कॉन्ट्रास्ट दे रहा हूं, लेकिन ये बताइए कि माननीय प्रधानमंत्री कभी आपने देखा है कि रोजगार की बात करते हैं? ये प्रश्न है मेरा आपके जरिए। प्रधानमंत्री जी बताइए हमें कि इतने प्रखर, इतने मुखर, इतने जबरदस्त वक्ता, वो क्यों नहीं बोलते कभी भी? कभी रोजगार की कोई बात सुनी है? क्यों माननीय मुख्यमंत्री और मध्यप्रदेश प्रशासन ये कहता है कि हम आरक्षण करेंगे, क्या ये पॉपुलिस्ट एक प्रकार से लोकप्रियता की चर्म सीमा नहीं है, आस-पास कुछ है ही नहीं रोजगार और आप इस प्रकार के स्लोगन दे रहे हैं या मूर्ख बना रहे हैं लोगों को?
अब ये अपने आप में एक प्रकार से अलग मुद्दा नहीं है, जिसको हम कहते हैं आइसोलेशन में, अलग से नहीं देख सकते, संकीर्ण भावना से नहीं देख सकते, क्योंकि ये मुद्दा है संदर्भ का और वो संदर्भ क्या है- आप जानते हैं कि हमारी गिरावट आर्थिक दृष्टि से और ये आर्थिक दृष्टि एक प्रकार से पूरी तरह सही नहीं, इससे ज्यादा गिरावट हुई है, लेकिन जीडीपी को माना गया है द्योतक। उसमें तीन आंकडे नोट करिए आप 2017-18 में, बहुत हाल की बात कर रहा हूं, उससे पहले तो बहुत बड़े थे फीगर। 2017-18 में भी लगभग 7 प्रतिशत जीडीपी का ग्रोथ रेट थी, मैं फाइनेंशियल ईयर की बात कर रहा हूं। ये गिर गई 1 प्रतिशत से 6.1 प्रतिशत, 2018-19 में, यानि एक साल में करीब-करीब 1 प्रतिशत गिर गया, 1 प्रतिशत करोड़ों-लाखों रुपए की बात होती है, देश के लिए बहुत बड़ी चीज होती है। उसके बाद 2019-20 और याद रहे 2019-20 कोविड़ या कोरोना का साल नहीं है, कोरोना आया है हमारे ये भयानक पैंडेमिक आया है फरवरी या जनवरी से। मैं 2019-20 पूरे फाइनेंशियल ईयर की बात कर रहा हूं, 4.2 का रेट है, यानि 7 से 6, 6 से 4.2, तीन वर्ष में। अब हमें वर्ल्ड बैंक बताता है और ये मान कर चलिए कि वर्ल्ड बैंक के आंकड़े कंजरवेटिव होते हैं, वास्तविकता उससे बुरी होती है। लगभग 3 प्रतिशत या 3.2 प्रतिशत अगर मैं प्रिसाइजली(precisely) बोलूं, 2020-21 में गिरने का हमारी आर्थिक व्यवस्था के छोटे होने की आशंका है। ये वक्तव्य आया है वर्ल्ड बैंक का, वर्ल्ड बैंक एक प्रकार से वक्तव्य का नाम लेती है, लेकिन वो एक चेतावनी होती है कि हम इसका पूरा अवलोकन करेंगे, अक्टूबर वाली रिपोर्ट में। अक्टूबर आने वाला है दो महीने बाद। उससे पहले हम चेतावनी दे रहे हैं कि हमने जो कहा था कि 3.2 प्रतिशत से कम होगी, वो शायद सही नहीं है, उससे ज्यादा से कम होगी। ये चेतावनी वर्ल्ड बैंक की है। आंकड़ों में थोड़ा बहुत फर्क हो, अंतरराष्ट्रीय सभी संस्थाओं की है। कभी आईएमएफ का आंकड़ा ऊपर-नीचे हो सकता है, लेकिन ट्रेंड वही है, मुद्दा वही है, गिरावट वही है, जिसको अंग्रेजी में सेकुलर डिक्लाइन (secular decline) कहते हैं और इस संदर्भ में आप क्या समझते हैं कि रोजगार हवा से पैदा होगें और इस संदर्भ में इस सरकार के पास कोई उत्तर नहीं है, सिवाए जुमलेबाजी के। देश में मचा है हाहाकार कि राम भरोसे है सरकार, लेकिन याद रहे कि भगवान राम उन्हीं की मदद करते हैं, जो अपनी मदद करते हैं।
आजतक आपने कितने रुपए डाले सीधा आपकी पॉकेट में? आप देखिए अमेरिका में जो सबसे बड़ा कदम उठाया गया, सीधा इतने लाख-करोड़ डॉलर पॉकेट में डाले गए, डायरेक्ट ट्रांसफर। आपका क्या उत्तर है डिमांड नहीं होने का, सिवाए जुमलेबाजी। जब आपके पास डिमांड नहीं है और जेब में पैसा नहीं है और पदार्थ हैं पूरे, ऐसा नहीं है कि पदार्थों का अभाव है, गुड सर्विस काफी मात्रा में है, लेकिन आप उसको सप्लाई साइड में प्रोड्यूस करते रहेंगे, मॉनिटरी पॉलिसी में ऊपर-नीचे करते रहेंगे, पैसा देते रहेंगे लोन पर, लेकिन खरीदार नहीं है, उसके लिए जेब में पैसा चाहिए। इसके लिए आपको कभी कोई उत्तर नहीं मिलता। ये दुर्भाग्य है इस देश का। मैं वापस दोहराऊंगा इसके बारे में क्या कहते हैं माननीय प्रधानमंत्री- चुप्पी।
तीसरा इसका त्रिकोण है वो है – खाद्य सुरक्षा। ये एक मूल बात है, ये आर्थिक दृष्टि से संबंध रखती है, हमारे परिवार, हमारे जीवन, हमारे गरीबों से संबंध रखती है। ये सब जानते हैं कि जिस प्रकार से गरीबी रेखा के नीचे सबसे ज्यादा मात्रा में लोग यूपीए 2 और यूपीए 1 के कार्यकाल में कम हुए थे, सबसे ज्यादा लोग गरीबी रेखा के ऊपर आए थे, यूपीए 1 और यूपीए 2 में गरीबों की संख्या सबसे ज्यादा तेजी से कम हुई थी। उसी प्रकार से सबसे ज्यादा अंडर नौरिश्मेंट, यानि पोषण की जो कमी है, इसका सबसे ज्यादा सुधार हुआ था 2004 से 2016 तक। इसमें दो वर्ष जरुर हैं इस सरकार के, लेकिन सब जानते हैं कि जब ये 22 प्रतिशत से 14 प्रतिशत तक पोषण की कमी, अंडर नौरिश्मेंट का आंकड़ा गिरा, तो उसका करीब-करीब 90 प्रतिशत श्रेय इस सरकार के पहले के समय को जाता है। उसी प्रकार से अगर इन्हीं को आँकड़ो में बदला जाए यानि कि 22 प्रतिशत से 14 प्रतिशत तक गिरना, तो ये हो जाता है 250 मिलियन यानि 25 करोड़ से लेकर 19 करोड़। ये भी उसी पीरियड का है 2004 से 2016 तक।
अब नई रिपोर्ट हुई है प्रकाशित, पैंडेमिक के विषय में, संदर्भ में कि लगभग 5 में से सिर्फ 2 लोगों को जो प्रवासी श्रमिक थे, राशन मिला, खाने को मिला, सिर्फ 40 प्रतिशत को, जो कि वायदा था सरकार का कोर्ट में कहा गया, हलफनामे में कहा गया 60 प्रतिशत को, जो मैं अब बात कर रहा हूं दूसरी कैटेगरी की, श्रमिक प्रवासियों की, नहीं मिला। हमारे माननीय खाद्य पदार्थ के मंत्री कहते हैं कि कोई इस पर डिस्क्रिमिनेशन नहीं है, उनका वक्तव्य आया पासवान जी का। हम जानते हैं कि कितने करोड़ इसके बैनेफिशरी होने चाहिएं। ये प्रकाशित रिपोर्ट जो आपके समक्ष मिलेगी हमारे विभाग से, इसमें लिखा है कि 40 प्रतिशत से ज्यादा लोगों को जो इस कोविड़ के वक्त में अत्यंत पीड़ा में हैं, नहीं मिला ये फायदा, इसकी जवाब देगी, तीसरे त्रिकोण का तीसरा बिंदु वो मांगता है। तो मैं अपनी बात खत्म करना चाहता हूं ये कहकर कि टाईम चला गया है जुमलेबाजी की, स्पष्टता से बात करने का समय आ गया है, because the Government is playing a cruel joke of all of us.
The Government is insensitive. It is a reflective of a crumbling economy and a collapse as far as ideas to restore our concerns with the Government. Three points very briefly of a triangle, all highly interrelated to each other have to be highlighted to you.
The first is the extremely alarming new trend and I am now talking of unemployment in a very specific sense about a segment. Note, the previous briefing we took some weeks ago. Unemployment, not generally, which is of course a very major, painful figure and you have those figures. I am not even giving it to you now, but, unemployment of the salaried classes and why it is extremely worrying is, because these once lost are not restored virtually at all or with great length of time, elapsing or with great difficulty, these jobs gone are gone. These children, these families, these ladies, who cannot run their houses, afford education are dependent on these salaried jobs. The figure has been consistently on a secular increase. I am not talking of one month, one day, one week; this trend is known to the Government for 6 clear months from March-April to today. What have they done about it- one big zero? It is known since as early as April, the total figure of salaried class job loss was 1.7 crores, 17.7, million. Today that figures is just under two crores, it is 1.9 crores and remember this is a figure I am giving of July, I can bet with you that when the figure for August is published, we would have crossed 2 crores, we are already on 20th August, but, I don’t want to give you figure because it is not published. These are published official figures.
Now, you tell me if you have lost almost 2 crores in salaried class employment, 2 crores- 20 million, you have any plan first of all, you are not answering the nation, why you lost, how you lost, you did not create a safety net.  You had no remedial measure to minimise, make it one crores not two crores.
Second is, are you ever talking in your ramparts of Red Fort speech, in your daily addresses, about how you will do something to partially restore, I know you cannot restore.
Thirdly, are you chastising your state Governments, because they have also got the Jumlebazi disease, the sloganeering disease from you, because, in Madhya Pradesh, I find it very funny apart from the fact that is highly doubtful, whether it is legal, if each state said that we will give jobs only to people of our own state. India would cease to be a federal country, our constitution may be violated, but, that is a larger issue, I am not into that. I am very happy, if Madhya Pradesh people get jobs, if it is reserved for them. My question to myself is that does common sense tell you that when we are losing two crore jobs, you are going to give what? You are going to give something, you don’t have. आप आरक्षण करेंगे, रिजर्व करेंगे वो चीजें जो आपके पास हैं ही नहीं? Which job, will you reserve?
The other aspect, the second point of this triangle, as I said to you is that this is not in isolation, you have to see it in a holistic prospective and the holistic prospective arises from the context of the economy. Employment does not function outside of the economy.
In the previous point of unemployment, there was a secular increase of the unemployment for salaried class from 1 to 1-1/2 crore, so now, close to two crores. Now, you come to a secular decline of GDP and I am giving you at the peak of this Government figures, 7% in 2017-18 is the GDP for 2017-18 financial year, actually GDP which is the best indicator of how the economy is doing, that becomes 6.1% in 2018-19 and that plummets, mind you 2019-20 at least 6 months before Covid, the estimate was it would be 4.2%, that is for the 2019-20 figure.
Now, a body like the World Bank itself had predicted that 2021, which you can say April 20 to March 21, which is after Covid or after the start of Covid, the economy would contract by 3.2%. Economy was already at 4.2% and further contracting by 3.2%. Now, they have given a warning that we will come out with our report in October, but, this is a warning that our 3.2%, which we said- there will be a reduction, may be too optimistic reduction, little more. So, we are looking at possibly zero percent and we should be very happy and clapping if we don’t have (-) minus percent, if the World Bank is correct. The World Bank may not be too much of the mark because other institutions, all converge, the figures may vary, but, IMF or other institution’s experts converge, whether it is 0% or 1%, is a matter of detail, but, there is a warning published by the World Bank which takes you in that direction.
Again my question is, are you clueless? Do you have any idea of the direction, momentum, pace, content? Does the Hon’ble Prime Minister ever speak on these issues, whether from Red Fort or on TV? When he has these long meetings with their officials, does anything come out which is shared with the nation, regarding tackling this scourge, the combined scourge of a secular decline in GDP likely very likely to be 0%, if it is not minus coupled with a humongous, exponential increase, secular increase in unemployment of the salaried class, which jobs once lost will never be regained.
My third point of this triangle is, malnourishment, under-nourishment, not enough nourishment. As you all know and I am not repeating the figures, the maximum number of people came out of the poverty line during UPA-1 and UPA-2. The numbers were humongous. 12- 13% decline or rather coming out from below to above the poverty line. The absolute numbers were crores, but, also along with that the maximum number of people, who came out of malnourishment and under-nourishment was during that period. The period includes 2004 to 2016, no doubt in two years of this Government, but, the figures will show that the remarkable improvement was 2004 to 2016 and just not two figures for under nourishment or malnourishment. 22% figure of 2004 became roughly 14%, I am giving you rough figures in 2016 and the numbers were, which improved from 253 million, which when they were down improvements here means going down, that is 25 crores to 19 crores on the same period, 2004-06 to this period.
In that context there is a third report published today, which is why we are adding it to this press conference, for the specific segment and I remember we have food surpluses, remember the Government of India policies that we are giving free rations to all traveling migrants, that is the policy, that is the Halafnama, the affidavit in the courts. Report, there has been published that cheques have shown that the migrants say that 2 out of 5, 40% and less are getting these rations. I am not saying, I am not the preparer of the report, I am not the publisher, I am only got the figures, but, where the refutation by the Government? On the contrary Mr. Paswan says that there is no wrong identification or discrimination. Question to myself is, question through you is then why is this pitiable even assume it is less than 50%. 50% of people are not getting proper nourishment with extreme pain, extreme distress and your warehouses over flowing, there is some clear fundamental mismatch in your Governance structures. So friends, I will end by again asking this question. why does Mr. Modi not speak about it? Why is there no blue print? Why is this Government clueless? These are all important questions, they may fail or succeed, why don’t they share this with you and why does Government’s  like MP do Jumlabazi by saying we will reserve jobs. You will reserve something, which you don’t have apart from being a big legal question mark, whether you can do it in a country like India by denying jobs.
So, friends, as I said, these are burning questions of the day, but, unfortunately, what excites this Government? This Government cannot be a ‘Ram Bharose’ Government, because even Ram helps only those, who help themselves. This Government cannot be clueless about vital issues affecting you and me and that is the thrust of what we are saying.
Thank You!
एक प्रश्न पर कि एक तरफ चीन के निवेश के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है, दूसरी तरफ बीसीसीआई का जो आईपीएल होता है, उसकी स्पॉन्सरशिप एक ऐसी कंपनी को दी गई है ड्रिम- 11, जिसमें चीन का इनवेस्टमेंट बड़े पैमाने पर बताया गया है, क्या ये दोहरा मापदंड नहीं है? डॉ. सिंघवी ने कहा कि आपका मुद्दा शायद उससे भी ज्यादा व्यापक और महत्वपूर्ण है, जो आप समझते हैं। ये मुद्दा कोई हल्का मुद्दा नहीं है और मैं आपको तीन बातें कहना चाहता हूं जो शायद आपक चौंका दे, शॉक कर दे। पहला, इतना हाहाकार मचाया है सरकार ने, इस देश में अलग-अलग सैंटिमेंट्स होते हैं, कुछ चीन हों, कुछ एंटी चीन हों, कुछ न्यूट्रल हों, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। आज हम सरकार की नीति से बात कर रहे हैं। दूसरा, ये सरकार राष्ट्रवाद की दुहाई आपको हर सैंकड देती है। तीसरा, सरकारी जो नीति होती है, वो निजी, प्राईवेट कंपनी पर भी लागू होती है। जब आपने कहा कि श्री प्रणव झा इम्पोर्ट नहीं कर सकते कुछ चीजें, तो वो प्राईवेट आदमी हैं, उनको तकलीफ है, उसको सस्ता मिलता है चीनी माल, लेकिन फिर भी नहीं कर सकता है वो। इन 3 चीजों को मद्देनजर रखते हुए जो घोषणाएं की हैं आपने, उसमें एक प्रश्न उठता है कि आईपीएल एक विशेष एग्जंप्टेड़ (exempted) कैटेगरी है क्या? आपको चौंका देगा ये जानकर कि आपने ड्रिम 11 का नाम लिया, उसको छोड़ दीजिए एक मिनट, जो मुख्य स्पॉन्सर था वो विवो था, वो पूरी चीनी कंपनी है, पूरी। विवो, Vivo, दूसरा आज आपने बताया, इसमें मैं आरोप लगा रहा हूं, इसमें एक भेदभाव है, आज बताया जा रहा है कि विवो तो हट गई है। विवो कहा जाता है कि पूरी तरह से ये बात है कि वो हटी चीन के मुद्दे पर नहीं है, क्योंकि वो चाहते थे कि जो उनका ओब्लिगेशन है, उसके स्थगित किया जाए, उनके पास पैसे की कुछ कमी हो रही थी। तो जिस व्यक्ति को आपने कॉन्ट्रैक्ट दे दिया, ऊपर से उसकी मदद कर दी आपने, क्योंकि उसके पास पैसे नहीं है, उससे कुछ स्थगित समय मांगा, तो आपने कहा कि विवो नहीं ड्रिम 11 हो जाएगा। अब जो ड्रिम 11 है, मैं भारतीयों की बात नहीं कर रहा हूं, उसमें 100 मिलियन, 100 मिलियन कितना होता है, 10 करोड़ डॉलर, यूएस डॉलर। चीन के हैं, डॉयरेक्ट उस कंपनी में मना नहीं है, ये स्वीकार है।
अब आप आत्मनिर्भरता की बात करते हैं, मैं सीधा सरकार पर आरोप लगा रहा हूं, मैं किसी निजी कंपनी से बॉदर नहीं करता, मैं चीन से भी बॉदर नहीं करता, इस सरकार की नीति के लिए क्या इतने नंपुसक ये सरकार है, ये चुप रहती है कि क्या विशेषता है इसमें कि 100 मिलियन यूएस डॉलर वाली की कंपनी में आप चुप हैं, कोई नीतिगत स्टेंड नहीं है, आत्मनिर्भरता को हमें लैक्चर देते हैं और ऐसे कई और उदाहरण हैं, मैंने आपके सामने 2 नाम लिए हैं। ऐसे कोई और उदाहरण हैं, जहाँ पर अवहेलना की गई है, जहाँ पर आँख मिची गई है, आप जानते हैं कि आईपीएल और पूरे क्षेत्र में जो एक-दो बहुत विशेष नाम हैं, वो नाम कहाँ से शुरु होते हैं, एक हमारे पश्चिमी स्टेट से, गुजरात से, वो कार्यकारिणी में एवं और जगहों पर मुख्य स्थान रखते हैं, उनके निकट लोगों का कितना जबरदस्त अधिकार क्षेत्र है। क्रिकेट में आखिर जो ये लोग हैं, जो समिति में हैं, जहाँ तक पॉवर का, निर्णय का सवाल है, ये निश्चित रुप से एक मुद्दा है। अब जब आप ये कर रहे हैं कि सबको भाषण दे रहे हैं चीन के बारे में, तो कम से कम इसमें जवाबदेही तो मांगिए।
On a question about BCCI IPL sponsorship given to Dream 11, which has a large investment of China, Dr. Singhvi said- I think, it is an important question raised, you have underestimated perhaps the importance of your own question, because it has much larger ramifications. We are not concerned with individual sectors, individual subjects, individual companies, we are concerned with the Government of India as the supposed protector of our national ethos. This is the Government, this is the Prime Minister, and this is the Home Minister, who give us lectures every second about nationalism, patriotism. It purportedly tests it. We all know that sentiments about China may be wary in this country, but, we have a national endeavour to do. We also know that this ‘Atmanirbhar slogan’ may cause a lot of peeda, a lot of distress to people, who might have got things cheaper, temporarily at least from China, but, they are all contributing, they are all sacrificing, why this exemption to IPL and Cricket? The main principal sponsor till now, was the Chinese company, VIVO, till recently, a few days ago, after the Government policy, after Ladakh, after Pangong Tso, after the transgressions, thereafter it is changed, not because of China, it is changed because a lot of reports which have been published and which you have and which the AICC has. They are apparently asking for a better set of terms by postponing their obligations to pay, because they don’t have immediate money. Now, you get them off the hook by not only first having a principal sponsor, who is Chinese, but, also letting off a Chinese company that is a fully Chinese company and giving it to another company which admittedly has hundred million US dollars, mark my words, hundred million US dollars, ten crores US dollar, not Indian Rupees investment of the Chinese entities. Is it a double standard for the poor sufferers here about whom you preach Atmanirbharta or is it favoritism because there are some very powerful people from Gujarat in IPL, which one is it? I hope the Government will answer, I hope the Government will satisfy the conscious for the national wealth, for nationalism and patriotism, which you falsely wear on your sleeve, this is an important answer.
On another question relating to issue of Contempt of Court and Shri Prashant Bhushan, Dr. Singhvi said- let me make it very clear, we have no hesitation individually, not only as members of the bar, who spent a lifetime otherwise commenting about what we have spoken, some have written, I don’t think it would be right to associate a political party, as a full political party with a statement, I may put forward, but, I have no hesitation having giving that clarification to you to speak from this podium to say that the law has to be applied in an even handed, fair, balanced manner. The concerns raised by those after the judgments are certainly not in any manners false, frivolous or vexatious. They cannot be dismissed off hand. They deserve a lot of careful thinking because they include former judges of that very Court. They include precedents and they include the basic spirit of the Supreme Court chest being larger than any other chest in India. Shoulders be wider than any other shoulder in India, I think these are all issues which I would not like to officially associate by party, because the party would require a resolution or something like that, so it should not be said tomorrow, that I committed the party, but, the sentiment is very clear and I have articulated it from the podium especially as a person, who spent a lifetime in law. Now, there is today, itself in a continuing series of statements by a fourth facet, there it should be considered by larger bench. Although, there are technical issues which should be considered, there is no hurry and the speed also, I would say with greatest humility, is very worrying. The speed creates part of the problem. The right thing done in the wrong way, the wrong thing done in the wrong way, these are all facets to be seen.
प्रशांत भूषण केस से सम्बंधित एक अन्य प्रश्न के उत्तर में डॉ. सिंघवी ने कहा कि मैं एक स्पष्टीकरण से शुरु करूंगा, हम लोगों को और विशेष रुप से मेरे जैसे लोग जिन्होंने सैगमेंट में, इस सेक्टर में कानून कह लीजिए, न्यायपालिका कह लीजिए, एक जीवन बिताया है, विधायिका में भी कानून बनते हैं, अभी काफी समय बिताया है, हमने कोई झिझक नहीं पाई है इसमें टिप्पणी देने में, लिखने में, बोलने में। बड़े स्वंतत्र रुप से बोले हैं। मैं ये जरुर कहूंगा कि एक औपचारिक रुप से एक पार्टी को उससे जोड़ना, कमिट करना सही नहीं होगा, क्योंकि उसके लिए एक रेजोल्यूशन चाहिए या उसके लिए ऐसा कोई दस्तावेज चाहिए, लेकिन मुझे कोई झिझक नहीं ये बोलने के लिए एआईसीसी के मंच से। ऐसी प्रक्रियाएं बहुत-बहुत आवश्यक है, अति आवश्यक है, उसको एंफेसाइस पूरा नहीं कर सकते हम कि संतुलित हो, उसकी दिशा उससे ज्यादा उनकी स्पीड, उनका स्तर, उनकी गति बहुत ध्यान से देखी जाए और इसी रुप से ये प्रश्न चिन्ह जो आता है कि उच्चतम न्यायालय से ज्यादा बड़े कंधे नहीं होने चाहिए किसी के, उच्चतम न्यायालय से बड़ी छाती नहीं होनी चाहिए उस संदर्भ में और आखिरी बिंदू है जो पुराने प्रिसिडेंट हैं उच्चतम न्यायालय से उसी विषय में। उनको सबको मद्देनजर रखते हुए जिस गति से चीजें हो रही हैं औऱ लगभग सैंकड़ों लोगों ने ये कहा है जिसमें में कि कई वरिष्ठ सेवानिवृत व्यक्ति हैं इसी न्यायपालिका के। आज भी उस श्रृंखला में जुडते हुए कहा गया है कि पांचवा बिंदु है कि क्यों उसको आप ये नहीं सोचते कि बड़ी खंडपीठ, संविधान वाली खंडपीठ 5 जजिस की या उससे बड़ी इसका निर्णय करे। तो मैं समझता हूं ये सब मुद्दे हैं जिनको आप सिर्फ नकार नहीं सकते, इनको आप मानें या ना मानें इनको ध्यान से, समय बिताकर कंसिडर करना आवश्यक है और जल्दबाजी में ऐसा कोई संदेश नहीं है, जिससे संदेश गलत हो और इस संस्था पर बिना मतलब से आघात हो या प्रश्न चिन्ह हो।
On another question about Rainfall in Gurugram, Dr. Singhvi said- I think, you are first of all asking the question of the wrong person. This question has to be vigorously, persistently, tenaciously asked for the Karta-Dhartas of Delhi and Haryana, which I consider to be one continuity, that we can not consider Delhi separate and Gurugram separate. You and I both know the number of people, relatives, friends, who treat it as one city. We also know the concept of NCR, so the first point of answer to you is that this is something, where there is a complete abdication and failure which must be answered and obviously your question, through your question I am answering it, asking that question again of the two entities, namely Union Government and the Haryana Government. Number two, I wish as much time had been spent by these Karta-Dhartas in issues which were of civic amenities. You are giving a Jumla everyday by both these entities; I am squarely making the point about Dream City, Millennium City, and Foreign Investment that is the context you have to see it. Latest facilities what is that- Smart City. Now, with that you have to compare, this Jumlabazi and reality. I wish, 1/10th time had been spent and this is now recurring for so many years with this, whereas you are trying to create a whole ‘Hauva’ (हौवा) about what you have done about investment, the Haryana Government says it every day and the Union Government that is not the Delhi Government or the National Capital Territory Government says it every day. There is no Javabdehi, there is no heads have fallen, no penalties have been approved and everybody is being made a fool of.
एक अन्य प्रश्न पर कि गुरुग्राम में जिस तरह से हालत हुई है, बच्चे पानी में तैर रहे हैं, मकान ढह रहे हैं, आम जनमानस को तकलीफों का सामना करना पड़ रहा है, इस पर क्या कहेंगे? डॉ. सिंघवी ने कहा कि मैं आपके प्रश्न को बहुत महत्वपूर्ण समझता हूं और मैं समझता हूं कि पहला बिंदू है कि आप ये प्रश्न गलत लोगों से पूछ रहे हैं। राष्ट्रीय सरकार और हरियाणा सरकार एक कंटिन्यूटी है, जहाँ तक गुरुग्राम का सवाल है, कुछ लोग मानते हैं कि चण्डीगढ़ तक कंटिन्यूटी है, लेकिन वो छोड़ दीजिए, गुरुग्राम तो निश्चित रुप से दिल्ली माना जाता है, एनसीआर है, वहाँ के लोग दिल्ली को मानते हैं, दिल्ली के लोग गुरुग्राम को मानते हैं, एक शहर है। यहाँ के दो जो कर्ताधर्ता हैं, उनसे आपको क्या जवाब मिला? मैं आपको चुनौती देता हूं कि आप प्रधानमंत्री जी से पूछिए, पहली बात तो आपको पूछने नहीं देगें क्योंकि आपसे वार्तालाप नहीं होगा, शायद आप उस कैटेगरी में नहीं आते, जिनसे आप वार्तालाप करते हैं, वो भी कभी-कभी साल में एक बार। दूसरा तुक्के से आपको मिल गया तो जवाब आपको मिलेगा, किसी विदेशी निवेश का, किसी स्लोगन का, किसी जुमले का। इस पर जवाब नहीं मिलेगा वहाँ के आम आदमी की जिनको सिविक एमेनिटीज (civic amenties) कहते हैं, यही चीज आप ट्राय कर लीजिए तो वहाँ के मुख्यमंत्री आपको जवाब देंगे, किसी धार्मिक फंक्शन का जवाब भी मिल सकता है, तो मैंने कहा कि हाहाकार मचा है सब जगह, राम भरोसे है सरकार, जो मैंने आर्थिक स्थिति के लिए अपनाया था, वो तो इसमें तो 100 प्रतिशत अप्लाई करता है और चौथा बिंदू, ये सब तब हो रहा है, जब आप बड़े-बड़े जुमलों में क्या कह रहे हैं कि ये पूरा रीजन है, इलाका है। अगर आपकी राजधानी में ये हालत है, तो ड्रीम सिटी कहिए, स्मार्ट सिटी कहिए, सबसे ज़्यादा विदेशी निवेश कहिए, टॉप कॉर्पोरेट्स, हम जानते हैं वहां पर टॉप कॉर्पोरेट्स पहले ही बुलावे में आ गए हैं, कोरियन से लेकर जापानी, अंग्रेज से लेकर अमेरिकन, काफ़ी मात्रा में थे पहले वहाँ पर, तो आपने उनका क्या ज़वाब दिया है, सिवाय ये सब जुमले बनाने के और मूल स्थिति पर कोई ध्यान नहीं दिया और एक आदमी बता दीजिए, जो महत्व का हो, जिसकी कुर्सी गई है, इसके लिए।
अब मैं आपके सामने कहूँ कि मुख्यमंत्री की कुर्सी जानी चाहिए उसका क्या फायदा होगा। मुख्यमंत्री को छोड़ दीजिए, मुख्यमंत्री से तीन लेवल नीचे कोई तो होगा। ये शर्मनाक है, अविवादित है और इसकी जितनी भर्त्सना की जाए, मेरे पास शब्द नहीं है।
एक अन्य प्रश्न पर कि आईटी मामलों की संसदीय समिति के अध्यक्ष डॉ शशि थरूर ने फेसबुक विवाद पर फेसबुक को समन करने की बात कही और उसके बाद पूरी बीजेपी हमलावर है, क्या कहेंगे, डॉ. सिंघवी ने कहा कि ये भी बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है और उसके पहलू आपके प्रश्न से भी ज़्यादा व्यापक हैं, क्यों और मुझे भी कुछ अनुभव है मैं भी एक संसदीय समिति का अध्यक्ष रह चुका हूँ।
1. इसका मूल मुद्दा जो आपके प्रश्न से भी ज्यादा आगे जाता है, वो ये है कि ये बीजेपी की प्रवृत्ति है। उसका चाल, चरित्र और पहचान है कि जैसे ही हो आप सप्रेशन में लग जाओ, दबाने में। ये पहली बार नहीं है, आप जानते हैं कितने ही मुद्दों पर ये हुआ है, कि मुद्दा उठाओ नहीं, मौखिक रुप से लाओ नहीं दबा दो उसको।
2. आपको उनका क्यों भय है कि आप मुद्दे को नहीं देख रहे हैं, आप प्रोसीजर को देख रहे हैं।
3. ये आपको किस क्लास में पढ़ाया गया कि एग्जेक्ट मुद्दा एजेंडा में लिखने से पहले अध्यक्ष संसदीय समिति का अनुमति लेता है सब मेम्बरान से। मैं जानना चाहूँगा कि आपकी बीजेपी की समस्या है, आप किसी और चेयरमैन से बुलवाइए ये। संसदीय समिति न आपके लिए बनी थी, न हमारे लिए बनी थी और मैं एक पूर्व अध्यक्ष होने के आधार पर ये कह सकता हूँ आपको कि जो काम संसदीय समिति में होता है, आपने राजनीतिक लकीरों से ऊपर उठकर वो इतना ज़्यादा प्रशंसनीय है और मैं समझता हूँ कि वो मूल आधार है हमारी संसदीय प्रणाली का, उसको कमजोर कौन कर रहा है- बीजेपी। पिछली बार भी हुआ था दूसरी समिति में। आपने दो-तीन लोगों को काम सौंप दिया है कि समिति का काम हो या न हो, आपका काम है कि समिति का काम चले नहीं। आपको मेम्बर इसलिए बनाया गया है।
तो ये मुद्दे जो हैं, ये आवश्यक हैं समझने के लिए, अभी हम इसके मैरिट पर कुछ नहीं बोलेंगे क्योंकि ये संसदीय समिति तय करेगी प्रिविलेजेस वाली, लेकिन मैं आपने सैद्धांतिक नियमों के आधार पर बोल रहा हूँ कि ये कहना कि अध्यक्ष को ये अधिकार क्षेत्र नहीं है ये मुझे सही नहीं लगता। हाँ, ये बात जरुर है कि अध्यक्ष महोदय ने बहुत बड़ा उल्लंघन किया प्रिविलेजेस का और उसी तरह से दुबे साहब ने अगर किया है, तो संसदीय समिति निर्णय करेगी लेकिन ये प्रवृत्ति जो है कि शुरुआत से रोकना इस प्रवृत्ति पर एक रोक लगानी चाहिए।
Sd/-
(Dr. Vineet Punia)
Secretary
Communication Deptt,
AICC

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